Friday, May 1, 2009

शादी में दहेज नहीं, पेड़ लगाने की परंपरा हो

ग्लोबल वार्मिग के चलते पूरी दुनिया चिंतित है। जंगलों के आग के जलने से करोड़ों रुपयों की वन संपदा जलकर राख हो गई है। पर्यावरण सुरक्षा के लिए पहाड़ की हरीतिमा को पुन: लौटाने के लिए मैती नामक रचनात्मक आंदोलन को और अधिक प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। मैती आंदोलन शादी-ब्याह के साथ भावनात्मक रूप से शादी ब्याह से जुड़ा है। मैती आंदोलन के प्रणेता शिक्षक कल्याण सिंह रावत कहते है कि पहाड़ नंगे होते जा रहे है व पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है जिससे विश्व चिंतित है पर्यावरण को बचाना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। कहते है कि शादी ब्याह में जूते छिपाने व दहेज देने की परंपरा के बजाय प्रत्येक शादी में दूल्हा-दुल्हन द्वारा पेड़ लगाने व उसकी रक्षा करने को परंपरा से जोड़ना होगा। पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित श्री रावत के अनुसार मैती शब्द लड़की के मायके से जुड़ा है क्योंकि विवाहोपरांत भी लड़की ससुराल की उन्नति के साथ ही मायके की स्मृद्धि की भी आकांक्षी होती है। पर्यावरण सुरक्षा के लिए मैती संगठन बनाए गए है। संगठन से जुड़ी किसी भी कन्या के विवाह के अवसर पर कन्या द्वारा बताए गए स्थान में दूल्हे द्वारा पौधे का रोपण किया जाता है व उसकी सुरक्षा के लिए संगठन की बहनों को धनराशि दी जाती है। यह धनराशि पौधे की सुरक्षा के साथ ही गांव के जरूरत मंदों को भी उपलब्ध कराई जाती है। गढ़वाल मंडल में मैती का यह आंदोलन व्यापक स्तर पर चलन रहा है। वहां पर आमंत्रण पत्रों में भी मैती वृक्षारोपण कार्यक्रम लिखा होता है। श्री रावत बताते है कि अगर प्रत्येक नव विवाहित जोड़ा अपनी शादी में पेड़ लगाने की परम्परा डाले तो आने वाले समय में विश्व को पर्यावरण संकट से उबारा जा सकता है।

सोजन्य से जागरण न्यूज़

1 comments:

Shashi Mohan Rawat said...

सुभाष भाई बहुत अच्‍छा प्रयास है. आपने जो उत्‍तराखंड की भाषा-बोली, रीति रिवाज एवं वहां की धरोहर को लोगों के सामने लाने का जो प्रयास किया है वह वाकई तारिफे काबिल है. मैं आशा करता हूं कि आप ऐसे ही इस देवभूमि की संस्‍कृति को जिंदा रखें.

आपाका
रावत शशिमोहन पहाड़ी