Friday, October 17, 2008

प्रकृति के सुन्दर नजारों का लुत्फ उठा रहे पर्यटक

इन दिनों पर्यटन सीजन में बंगाली पर्यटकों की तादात बढ़ने लगी है। दूर-दराज से आए सैलानी जाड़ों के मौसम में जमकर लुत्फ उठाया। इन दिनों देशी-विदेशी सैलानी पहाड़ों की ओर रुख कर रहे है।

नगर के मुख्य पर्यटक स्थलों गोल्फ मैदान, चौबटिया गार्डन, हैड़ाखान मंदिर, बिनसर महादेव आदि स्थानों में सैलानियों की भीड़ आसानी से देखी जा सकती है। पश्चिम बंगाल से आए पर्यटक संदीप चटर्जी ने बताया कि पहाड़ों में हम बर्फ से लदे पहाड़ देखने आते है। यहां से दिखने वाली हिमालय की विहंगम चोटियां मंत्रमुग्ध कर देती हैं। इन चोटियों को देखने हर साल पहाड़ों पर आते है। ऐसी ही कहना अन्य पर्यटकों का भी था। इन दिनों बंगाली पर्यटक सीजन अपने पीक पर है। इनके अलावा हरियाणा, गुजरात, बिहार आदि स्थानों से ही नही विदेशों से भी बड़ी संख्या में पर्यटक प्रकृति के खूबसूरत नजारों का आनंद उठाने यहां पहुंच रहे है।

सोजन्य से जागरण न्यूज़

Friday, October 10, 2008

जादुई सम्मोहन है हरसिल के सौंदर्य मे

गढवाल के अधिकांश सौंदर्य स्थल दुर्गम पर्वतों में स्थित हैं जहां पहुंचना सबके लिए आसान नहीं है। यही वजह है कि प्रकृति प्रेमी पर्यटक इन जगहों पर पहुंच नहीं पाते हैं। लेकिन ऐसे भी अनेक पर्यटक स्थल हैं जहां सभी प्राकृतिक विषमता और दुरुहता खत्म हो जाती है। वहां पहुंचना सहज और सुगम है। यही कारण है कि इन सुविधापूर्ण प्राकृतिक स्थलों पर ज्यादा पर्यटक पहुंचते हैं। प्रकृति की एक ऐसा ही एक खूबसूरत उपत्यका है हरसिल।

उत्तरकाशी-गंगोत्री मार्ग के मध्य स्थित हरसिल समुद्री सतह से 7860 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। हरसिल उत्तरकाशी से 73 किलोमीटर आगे और गंगोत्री से 25 किलोमीटर पीछे सघन हरियाली से आच्छादित है। घाटी के सीने पर भागीरथी का शांत और अविरल प्रवाह हर किसी को आनंदित करता है। पूरी घाटी में नदी-नालों और जल प्रपातों की भरमार है। जहां देखिए दूधिया जल धाराएं इस घाटी का मौन तोडने में डटी हैं। नदी झरनों के सौंदर्य के साथ-साथ इस घाटी के सघन देवदार के जंगल मन को मोहते हैं। जहां निगाह डालिए इन पेडों का जमघट लगा है। यहां पहुंचकर पर्यटक इन पेडों की छांव तले अपनी थकान को मिटाता है। जंगलों से थोडा ऊपर निगाह पडते ही आंखें खुली की खुली रह जाती है। हिमाच्छादित पर्वतों का आकर्षण तो कहने ही क्या। ढलानों पर फैले ग्लेशियरों की छटा तो दिलकश है ही।

इस स्थान की खूबसूरती का जादू अपने जमाने की सुपरहिट फिल्म राम तेरी गंगा मैली में देखा जा सकता है। बॉलीवुड के सबसे बडे शोमैन रहे राजकपूर एक बार जब गंगोत्री घूमने आए थे तो हरसिल का जादुई आकर्षण उन्हें ऐसा भाया कि उन्होंने यहां की वादियों में फिल्म ही बना डाली-राम तेरी गंगा मैली। इस फिल्म में हरसिल की वादियों का जिस सजीवता से दिखाया गया है वो देखते ही बनता है। यहीं के एक झरने में फिल्म की नायिका मंदाकिनी को नहाते हुए दिखाया गया है। तब से इस झरने का नाम मंदाकिनी फॉल है पड गया। इस घाटी से इतिहास के रोचक पहलू भी जुडे हैं। एक गोरे साहब थे फेडरिक विल्सन जो ईस्ट इंडिया कंपनी में कर्मचारी थे। वह थे तो इंग्लैंड वासी लेकिन एक बार जब वह मसूरी घूमने आए तो हरसिल की वादियों में पहुंच गए। उन्हें यह जगह इतनी भायी कि उन्होंने सरकारी नौकरी तक छोड दी और यहीं बसने का मन बना लिया। स्थानीय लोगों के साथ वह जल्द ही घुल-मिल गए और गढवाली बोली भी सीख ली। उन्होंने अपने रहने के लिए यहां एक बंगला भी बनाया। नजदीक के मुखबा गांव के एक लडकी से उन्होंने शादी भी कर डाली। विल्सन ने यहां इंग्लैंड से सेब के पौधे मंगाकर लगाए जो खूब फले-फूले। आज भी यहां सेब की एक प्रजाति विल्सन के नाम से प्रसिद्ध है।

ऋषिकेश से हरसिल की लंबी यात्रा के बाद हरसिल की वादियों का बसेरा किसी के लिए भी अविस्मरणीय यादगार बन जाता है। भोजपत्र के पेड और देवदार के खूबसूरत जंगलों की तलहटी में बसे हरसिल की सुंदरता पर बगल में बहती भागीरथी और आसपास के झरने चार चांद लगा देते हैं। गंगोत्री जाने वाले ज्यादातर तीर्थ यात्री हरसिल की इस खूबसूरती का लुत्फ उठाने के लिए यहां रुकते हैं। अप्रैल से अक्टूबर तक हरसिल आना आसान है लेकिन बर्फबारी के चलते नवंबर से मार्च तक यहां इक्के-दुक्के सैलानी ही पहुंच पाते हैं। हरसिल की वादियों का सौंदर्य इन्हीं महीनों में खिलता है। जब यहां की पहाडियां और पेड बर्फ से लकदक रहते हैं, गोमुख से निकलने वाली भागीरथी का शांत स्वभाव यहां देखने लायक है। यहां से कुछ ही दूरी पर डोडीताल है इस ताल में रंगीन मछलियां ट्राडा भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं। इन ट्राडा मछलियों को लाने का श्रेय भी विल्सन को ही जाता है। बगोरी, घराली, मुखबा, झाला और पुराली गांव इस इलाके की समृद्ध संस्कृति और इतिहास को समेटे हैं। हरसिल देश की सुरक्षा के नाम पर खींची गई इनर लाइन में रखा गया है जहां विदेशी पर्यटकों के ठहरने पर प्रतिबंध है। विदेशी पर्यटक हरसिल होकर गंगोत्री, गोमुख और तपोवन सहित हिमालय की चोटियो में तो जा सकते हैं लेकिन हरसिल में नहीं ठहर सकते हैं। हरसिल से सात किलोमीटर की दूरी पर सात तालों का दृश्य विस्मयकारी है। इन्हें साताल कहा जाता है। हिमालय की गोद मे एक श्रृखंला पर पंक्तिबद्ध फैली इन झीलों के दमकते दर्पण में पर्वत, आसमान और बादलों की परछाइयां कंपकपाती सी दिखती हैं। ये झील 9000 फीट की ऊंचाई पर फैली हैं। इन झीलों तक पहुंचने के रास्ते मे प्रकृति का आप नया ही रूप देख सकते है। यहां पहुंचकर आप प्रकृति का संगीत सुनते हुए झील के विस्तृत सुनहरे किनारों पर घूम सकते हैं।

कैसे पहुंचे

हरसिल की खूबसूरत वादियों तक पहुंचने के लिए सैलानियों को सबसे पहले ऋषिकेश पहुंचना होता है। ऋषिकेश देश के हर कोने से रेल और बस मार्ग से जुडा है। ऋषिकेश पहुंचने के बाद आप बस या टैक्सी द्वारा 218 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद यहां पहुंच सकते हैं।

अगर आप हवाई मार्ग से आना चाहें तो नजदीकी हवाईअड्डा जौलीग्रांट है। जौलीग्रांट से बस या टैक्सी द्वारा 235 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद यहां पहुंचा जा सकता है

समय और सीजन

यूं तो बरसात के बाद जब प्रकृति अपने नये रूप में खिली होती है तब यहां का लुत्फ उठाया जा सकता है। लेकिन नवंबर-दिसंबर के महीने में जब यहां बर्फ की चादर जमी होती है तो यहां का सौंदर्य और भी खिल उठता है। बर्फबारी के शौकीन इन दिनों यहां पहुंचते हैं।

पर्यटकों को यात्रा के दौरान इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि समय और जो भी हो, हरदम गरम कपडे साथ होने चाहिए। यहां पर खाने-पीने के लिए साफ और सस्ते होटल आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं जो आपके बजट के अनुरूप होते हैं।

हरसिल में ठहरने के लिए लोकनिर्माण विभाग का एक बंगला, पर्यटक आवास गृह और स्थानीय निजी होटल हैं। यहां खाने-पीने की पर्याप्त सुविधाएं हैं। गंगोत्री जाने वाले यात्री कुछ देर यहां रुककर अपनी थकान मिटाते हैं और हरसिल के सौंदर्य का लुत्फ लेते हैं।

सोजन्य से जागरण न्यूज़

Tuesday, October 7, 2008

उत्तराखंड की प्रमुख झीलें

पृथ्वी पर सबसे अधिक मात्रा में पाया जाने वाला पदार्थ जल है, जिससे पृथ्वी का 70 प्रतिशत् भाग ढका है। कुल जल की मात्रा का 97.3 प्रतिशत (135 करोड़ घन किमी0) सागर और महासागर के रूप में तथा 2.7 प्रतिशत (2.8 करोड़ घन किमी0) बर्फ से ढका है। इसके अतिरिक्त 7.7 घन किमी0 जल भूमिगत है।

पर्वतीय क्षेत्रों में भूगर्भ स्थिति के अनुसार, पर्वतों से भू-जल स्रोत बहते हैं। ऐसे स्रोत मौसमी या लगातार बहने वाले होते हैं। ऐसे ही स्रोतों में से एक झील है।

झील- एक जलाशय है जो भूमि से घिरा तथा विशालाकार होता है ।

बदानी ताल झील- यह झील पृथ्वी की सतह में श्रेणी-बद्ध दोष के कारण बनी है। यह गढ़वाल में मयाली के पास ऊपरी लक्ष्तर गाड नदी की घाटी के ढालों के बीच स्थित है।

भीमताल-- कुमाऊँ क्षेत्र की यह दूसरी बड़ी झील है।

देवरी ताल-- यह झील गढ़वाल के चमोली जिले में चोप्ता के पास हिमखण्ड के खिसकने से बनी है।

डोडीताल-- यह झील गढ़वाल में उत्तरकाशी के पास स्थित है।

गोहनाताल-- यह गढ़वाल के चमोली जिले में अलकनन्दा नदी की एक सहायक नदी में 1970 में आयी बड़ी बाढ़ के कारण भूस्खंलन से बनी है।

हेमकुण्ड लोकपाल-- यह गढ़वाल के चमोली जिले में पानी के स्रोत से बनी शुद्ध पानी की झील है।

कागभुसण्ड ताल-- यह गढ़वाल के उत्तर-पूर्वी चमोली जिले में कंकुल खाल चोटी के ढाल से निकली प्रदुषण-रहित झील है।

खुर्पाताल-- यह नैनीताल शहर के पास चट्टान खिसकने से बने गड्ढे में बनी झील है।

नैनीताल- - यह पृथ्वी की सतह के खिसकने से बने दोष के कारण बनी झील है। इसके किनारे बने नैना देवी के मंदिर के कारण इस झील का नाम नैनीताल पड़ा।

नन्दीकुण्ड-- यह गढ़वाल की चौखम्भा चोटी के दक्षिणी ढाल पर बनी झील है जो जाड़ों में जम जाती है।

नौकुचियाताल-- यह कुमाऊँ क्षेत्र में एक छोटी झील है।

रूपकुण्ड- यह गढ़वाल के चमोली जिले के उत्तर-पूर्वी भाग में बनी एक प्रदुषण रहित बड़ी झील है।

सागरियाताल -- यह भी नैनीताल क्षेत्र में एक छोटी झील है।

शास्त्रुताल-- यह गढ़वाल में घनसाली क्षेत्र के ऊपर खतलिंग हिमखण्ड के पास एक झीलों का समूह है।

सूखाताल -- यह नैनीताल के पास बनी झील है, जिसमें काफी मात्रा में अवसाद भरा है, तथा इसमें केवल वर्षा के मौसम में ही पानी एकत्र होता है।

वसूकी ताल-- यह गढ़वाल में मंदाकिनी नदी के स्रोत के पास चोर बामक हिमखण्ड के पूर्व में स्थित एक छोटी झील है।

सोजन्य से : हिन्दी वाटर पोर्टल