Thursday, July 31, 2008

कठिन यात्रा है रुद्रनाथ की

समुद्रतल से 2290 मीटर की ऊंचाई पर स्थित रुद्रनाथ मंदिर भव्य प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण है। रुद्रनाथ मंदिर में भगवान शंकर के एकानन यानि मुख की पूजा की जाती है, जबकि संपूर्ण शरीर की पूजा नेपाल की राजधानी काठमांडू के पशुपतिनाथ में की जाती है। रुद्रनाथ मंदिर के सामने से दिखाई देती नंदा देवी और त्रिशूल की हिमाच्छादित चोटियां यहां का आकर्षण बढाती हैं। इस स्थान की यात्रा के लिए सबसे पहले गोपेश्वर पहुंचना होता है जो कि चमोली जिले का मुख्यालय है। गोपेश्वर एक आकर्षक हिल स्टेशन है जहां पर ऐतिहासिक गोपीनाथ मंदिर है। इस मंदिर का ऐतिहासिक लौह त्रिशूल भी आकर्षण का केंद्र है। गोपेश्वर पहुंचने वाले यात्री गोपीनाथ मंदिर और लौह त्रिशूल के दर्शन करना नहीं भूलते। गोपेश्वर से करीब पांच किलोमीटर दूर है सगर गांव। बस द्वारा रुद्रनाथ यात्रा का यही अंतिम पडाव है। इसके बाद जिस दुरूह चढाई से यात्रियों और सैलानियों का सामना होता है वो अकल्पनीय है। सगर गांव से करीब चार किलोमीटर चढने के बाद यात्री पहुंचता है पुंग बुग्याल। यह लंबा चौडा घास का मैदान है जिसके ठीक सामने पहाडों की ऊंची चोटियों को देखने पर सर पर रखी टोपी गिर जाती है। गर्मियों में अपने पशुओं के साथ आस-पास के गांव के लोग यहां डेरा डालते हैं, जिन्हें पालसी कहा जाता है। अपनी थकान मिटाने के लिए थोडी देर यात्री यहां विश्राम करते हैं। ये पालसी थके हारे यात्रियों को चाय आदि उपलब्ध कराते हैं। आगे की कठिन चढाई में जगह-जगह मिलने वाली चाय की यही चुस्की अमृत का काम करती है। पुंग बुग्याल में कुछ देर आराम करने के बाद कलचात बुग्याल और फिर चक्रघनी की आठ किलोमीटर की खडी चढाई ही असली परीक्षा होती है। चक्रघनी जैसे कि नाम से प्रतीत होता है कि चक्र के सामान गोल। इस दुरूह चढाई को चढते-चढते यात्रियों का दम निकलने लगता है। चढते हुए मार्ग पर बांज, बुरांश, खर्सू, मोरु, फायनिट और थुनार के दुर्लभ वृक्षों की घनी छाया यात्रियों को राहत देती रहती है। रास्ते में कहीं कहीं पर मिलने वाले मीठे पानी की जलधाराएं यात्रियों के गले को तर करती हैं। इस घुमावदार चढाई के बाद थका-हारा यात्री ल्वीटी बुग्याल पहुंचता है जो समुद्र तल से करीब 3000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। ल्वीटी बुग्याल से गापेश्वर और सगर का दृश्य तो देखने लायक है ही, साथ ही रात में दिखाई देती दूर पौडी नगर की टिमटिमाती लाइटों का आकर्षण भी कमतर नहीं। ल्वीटी बुग्याल में सगर और आसपास के गांव के लोग अपनी भेड-बकरियों के साथ छह महीने तक डेरा डालते हैं। अगर पूरी चढाई एक दिन में चढना कठिन लगे तो यहां इन पालसियों के साथ एक रात गुजारी जा सकती है। यहां की चट्टानों पर उगी घास और उस पर चरती बकरियों का दृश्य पर्यटकों को अलग ही दुनिया का अहसास कराता है। यहां पर कई दुर्लभ जडी-बूटियां भी मिलती हैं। ल्वीटी बुग्याल के बाद करीब तीन किलोमीटर की चढाई के बाद आता है पनार बुग्याल। दस हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित पनार रुद्रनाथ यात्रा मार्ग का मध्य द्वार है जहां से रुद्रनाथ की दूरी करीब ग्यारह किलोमीटर रह जाती है। यह ऐसा स्थान है जहां पर वृक्ष रेखा समाप्त हो जाती है और मखमली घास के मैदान यकायक सारे दृश्य को परिवर्तित कर देते हैं। अलग-अलग किस्म की घास और फूलों से लकदक घाटियों के नजारे यात्रियों को मोहपाश में बांधते चले जाते हैं। जैसे-जैसे यात्री ऊपर चढता रहता है प्रकृति का उतना ही खिला रूप उसे देखने को मिलता है। इतनी ऊंचाई पर इस सौंदर्य को देखकर हर कोई आश्चर्यचकित रह जाता है। पनार में डुमुक और कठगोट गांव के लोग अपने पशुओं के साथ डेरा डाले रहते हैं। यहां पर ये लोग यात्रियों को चाय आदि उपलब्ध कराते हैं। पनार से हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों का जो विस्मयकारी दृश्य दिखाई देता है वो दूसरी जगह से शायद ही दिखाई दे। नंदादेवी, कामेट, त्रिशूली, नंदाघुंटी आदि शिखरों का यहां बडा नजदीकी नजारा होता है। पनार के आगे पित्रधार नामक स्थान है पित्रधार में शिव, पार्वती और नारायण मंदिर हैं। यहां पर यात्री अपने पितरों के नाम के पत्थर रखते हैं। यहां पर वन देवी के मंदिर भी हैं जहां पर यात्री श्रृंगार सामग्री के रूप में चूडी, बिंदी और चुनरी चढाते हैं। रुद्रनाथ की चढाई पित्रधार में खत्म हो जाती है और यहां से हल्की उतराई शुरू हो जाती है। रास्ते में तरह-तरह के फूलों की खुशबू यात्री को मदहोश करती रहती है। यह भी फूलों की घाटी सा आभास देती है। पनार से पित्रधार होते हुए करीब दस-ग्यारह किलोमीटर के सफर के बाद यात्री पहुंचता है पंचकेदारों में चौथे केदार रुद्रनाथ में। यहां विशाल प्राकृतिक गुफा में बने मंदिर में शिव की दुर्लभ पाषाण मूर्ति है। यहां शिवजी गर्दन टेढे किए हुए हैं। माना जाता है कि शिवजी की यह दुर्लभ मूर्ति स्वयंभू है यानी अपने आप प्रकट हुई है। इसकी गहराई का भी पता नहीं है। मंदिर के पास वैतरणी कुंड में शक्ति के रूप में पूजी जाने वाली शेषशायी विष्णु जी की मूर्ति भी है। मंदिर के एक ओर पांच पांडव, कुंती, द्रौपदी के साथ ही छोटे-छोटे मंदिर मौजूद हैं। मंदिर में प्रवेश करने से पहले नारद कुंड है जिसमें यात्री स्नान करके अपनी थकान मिटाता है और उसी के बाद मंदिर के दर्शन करने पहुंचता है। रुद्रनाथ का समूचा परिवेश इतना अलौकिक है कि यहां के सौदर्य को शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। शायद ही ऐसी कोई जगह हो जहां हरियाली न हो, फूल न खिले हों। रास्ते में हिमालयी मोर, मोनाल से लेकर थार, थुनार और मृग जैसे जंगली जानवरों के दर्शन तो होते ही हैं, बिना पूंछ वाले शाकाहारी चूहे भी आपको रास्ते में फुदकते मिल जाएंगे। भोज पत्र के वृक्षों के अलावा ब्रह्मकमल भी यहां की ऊंचाइयों में बहुतायत में मिलते हैं। यूं तो मंदिर समिति के पुजारी यात्रियों की हर संभव मदद की कोशिश करते हैं। लेकिन यहां खाने-पीने और रहने की व्यवस्था स्वयं करनी पडती है। जैसे कि रात में रुकने के लिए टेंट हो और खाने के लिए डिब्बाबंद भोजन या अन्य चीजें। रुद्रनाथ के कपाट परंपरा के अनुसार खुलते-बंद होते हैं। शीतकाल में छह माह के लिए रुद्रनाथ की गद्दी गोपेश्वर के गोपीनाथ मंदिर में लाई जाती है जहां पर शीतकाल के दौरान रुद्रनाथ की पूजा होती है। आप जिस हद तक प्रकृति की खूबसूरती का अंदाजा लगा सकते है, यकीन मानिए यह जगह उससे ज्यादा खूबसूरत है।

रविशंकर जुगरान

रुद्रनाथ यात्रा: अन्य जानकारियां

कैसे पहुंचे

देश के किसी कोने से आपको पहले ऋषिकेश पहुंचना होगा। ऋषिकेश से ठीक पहले तीर्थनगरी हरिद्वार दिल्ली, हावडा से बडी रेल लाइन से जुडी है। देहरादून के निकट जौली ग्रांट में हवाईअड्डा भी है जहां दिल्ली से सीधी उडानें हैं। हरिद्वार या ऋषिकेश से आपको चमोली जिला मुख्यालय गोपेश्वर का रुख करना होगा जो ऋषिकेश से करीब 212 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ऋषिकेश से गोपेश्वर पहुंचने के लिए आपको बस या टैक्सी आसानी से उपलब्ध हो जाती है। एक रात गोपेश्वर में रुकने के बाद अगले दिन आप अपनी यात्रा शुरू कर सकते हैं।

कहां ठहरें

गोपेश्वर में टूरिस्ट रेस्ट हाउस, पीडब्ल्यूडी बंगले के अलावा छोटे होटल और लॉज आसानी से मिल जाते हैं। गोपेश्वर से करीब पांच किलोमीटर ऊपर सगर नामक स्थान तक आप बस की सवारी कर सकते हैं। इसके बाद रुद्रनाथ पहुंचने के लिए यात्रियों को करीब 22 किलोमीटर की खडी चढाई चढनी होती है। यही चढाई श्रद्धालुओं की असली परीक्षा और ट्रैकिंग के शौकीनों के लिए चुनौती होती है। रास्ता पूरा जंगल का है लिहाजा यात्रियों को अपने साथ पूरा इंतजाम करके चलना होता है। यानी खाने-पीने की चीज से लेकर गर्म कपडे हरदम साथ हों। बारिश व हवा से बचाव के लिए बरसाती पास होनी चाहिए क्योंकि मौसम के मिजाज का यहां कुछ पता नहीं चलता। पैदल रास्ते में तो पालसी मिल जाते हैं लेकिन रुद्रनाथ में रुकना हो तो इंतजाम के बारे में सोचकर चलें।

कब जाएं

यूं तो मई के महीने में जब रुद्रनाथ के कपाट खुलते हैं तभी से यहां से यात्रा शुरू हो जाती लेकिन अगस्त सितंबर के महीने में यहां खिले फूलों से लकदक घाटियां लोगों का मन मोह लेती हैं। ये महीने ट्रेकिंग के शौकीन के लिए सबसे उपयुक्त हैं। गोपेश्वर में आपको स्थानीय गाइड और पोर्टर आसानी से मिल जाते हैं। पोर्टर आप न भी लेना चाहें लेकिन यदि पहली बार जा रहे हैं तो गाइड जरूर साथ रखें क्योंकि यात्रा मार्ग पर यात्रियों के मार्गदर्शन के लिए कोई साइन बोर्ड या चिह्न नहीं हैं। पहाडी रास्तों में भटकने का डर रहता है। एक बार आप भटक जाएं तो सही रास्ते पर आना बिना मदद के मुश्किल हो जाता है।

सोजन्य से जागरण न्यूज़

Saturday, July 12, 2008

नदी बचाने की जंग

अब नदियों पर संकट है, सारे गांव इकट्ठा हों
निजी कंपनी आई है, झूठे सपने लाई है
इन जेबों में सत्ता है, सारी सुविधा पाई है
अब रोटी पर संकट है, सारे गांव इकट्ठा हों.


इन दिनों जनकवि अतुल शर्मा के गीतों की ये पंक्तियां उत्तराखंड के गांव-गांव में गाई जा रही हैं. गांवों में इन गीतों के संदेशों से मिलते-जुलते विषयों पर नुक्कड़ नाटक भी खेले जा रहे हैं. यहां अब आपस में बैटकर नदियों पर बांधों के चलते उत्पन्न मसलों पर बातें की जा रही हैं. जल, जंगल और जमीन को कंपनियों के कब्जे में जाते देख कर उन्हें लगने लगा है कि अब अगर नदियां नहीं बचीं तो हम भी नहीं बचेंगे.

लंबी लड़ाई की तैयारी

उत्तराखंड में नदियों को लेकर पहली बार एक ऐसी लड़ाई शुरु हुई है, जो सिर्फ उत्तराखंड तक सीमित नहीं रहने वाली है.

लोग उत्तराखंड नदी बचाओ अभियान के आह्वान पर पदयात्रा, धरना और प्रदर्शन करने लगे हैं. इनमें महिलाएं और युवा बढ़-चढ़ कर भाग ले रहे हैं.

नदियों को लेकर उत्तराखंड में शुरु हुई यह लड़ाई अब भले पूरे राज्य में सतह पर उभर कर एकजुट दिखने लगी है, लेकिन इसकी अलग-अलग शुरुवात विभिन्न नदी घाटियों में कई साल पहले ही हो गई थी, क्योंकि टिहरी शहर के डूबने और चाई जैसे गांव के जमींदोज हो जाने की घटनाएं उन्हें कभी चैन से सोने नहीं दे रही है.

ऊर्जा के नाम पर
उत्तराखंड राज्य बनते ही प्रदेश के लोगों को यहां की सरकारों ने जिस तरह ऊर्जा प्रदेश बनाने के सपने दिखाए थे, उनने यहां के लोगों को न सिर्फ ठगा है, बल्कि उन्हें अपने पैतृक स्थलों से पलायन के लिए भी विवश कर दिया है. लोग नए आसरे की ओर निकलते जा रहे हैं. ऐसे में जो पलायन नहीं कर रहे हैं, वे अपनी धरती, जंगल, पहाड़ और नदियों को बचाने के लिए अपनी कमर कसने लगे हैं.

नदियों की मौजूदा असलियत उत्तराखंड निवासियों के लिए असहनीय हो गई है. उत्तराखंड के पूर्व में काली (शारदा) से लेकर पश्चिम में तमसा (टौंस) तक उत्तराखंड की सभी हिमपोषित नदियों पर बिजली उत्पादन के लिए दो सौ से अधिक परियोजनाएं निर्माणाधीन या प्रस्तावित हैं, जिन्हें बांधों और सुरंगों के माध्यम से क्रियान्वित किया जा रहा है. इसके कारण इन नदियों का सनातन प्रवाह और इनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है. बड़े हादसे तो जैसे अभिशाप की तरह जुड़ गए हैं.

पिछले दिनों विष्णुप्रयाग जल विद्युत परियोजना के लिए बनाई गई सुरंग के धंस जाने से उसके ऊपर बसा हुआ चॉई गांव ध्वस्त हो गया और कड़ाके की सर्दी में इस गांव के लोगों को अपने टूटे-फूटे दरकते मकानों को छोड़ कर बेघर होना पड़ा.

जंगल साफ हो रहे हैं सो अलग.

लोग हैरान हैं कि नदियों पर बांध औऱ सुरंग बनाने के प्रस्तावों पर बगैर इसके नतीजे की परवाह किए केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय ने भी अपनी ओर से हरी झंडी कैसे दिखा दी !

लेकिन मामला अकेला चॉई का नहीं है.

उत्तरकाशी के करीब चौदह गांव लोहारी नाग और पाला मनेरी जल विद्युत परियोजनाओं से प्रभावित हैं. इन गांवों की महिलाओं का कहना है कि उनके यहां बांध निर्माण एजेंसियां गांव के पुरुषों को प्रलोभन देकर निर्माण कार्य में मनमानी कर रही हैं. भागीरथी घाटी में सुरंग निर्माण के लिए कंपनियां हर दस मीटर पर विस्फोट कर रही हैं, जिससे मकानों में दरारें आ रही हैं. भूजल का रंग बदल गया है.

इस इलाके में 18 कंपनियां एनटीपीसी के संरक्षण में काम कर रही हैं, जिसमें बड़ी संख्या में बाहरी लोग आ रहे हैं. जाहिर है, इससे इन गांवों में सामाजिक असुरक्षा के मामले बढ़े हैं. दूसरी ओर जिनकी जमीन अधिगृहित की जा रही हैं, उनकी सुरक्षा और आजीविका के लिए कोई बात नहीं की जा रही है.

सूख रही है गंगा

दुनिया में बढ़ते तापमान, पिघलते ग्लेशियर और मौसम के बदले मिजाज के कारण गंगा विश्व की लुप्त होने जा रही 10 नदियों में शामिल हो गई है. हिमालय पर्यावरण शिक्षण संस्थान, उत्तरकाशी के सुरेश भाई का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो बीस सालों में गंगा सूख जाएगी. गंगोत्री ग्लेशियर पिछले साढ़े तीन हज़ार सालों में मात्र आठ किलोमीटर खिसका और आज हालत ये है कि पिछले 15 सालों में ही यह 210 मीटर तक सिकुड़ गया है.

भागीरथ पर बांध बनाने की परियोजना के चलते सबसे अधिक खतरे की जद में कुंजन व तिहार गांव हैं. इन गांवों की सुरक्षा व आजीविका के लिए परियोजना में कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है. लोहारी नाग-पाला बांध परियोजना की 12.05 किलोमीटर लंबी सुरंग बनने पर इसके डंपिंग यार्ड की कोई व्यवस्था नहीं है. ग्रामीणों का आरोप है कि विस्फोट के दौरान गांव वालों को उनकी कच्ची फसलें काट लेने के लिए बाध्य किया जाता है.


और गंगा भी
इन हिमपोषित नदियों के अलावा उत्तराखंड की अन्य नदियों- कोसी, नयार, पनार, पश्चिमी रामगंगा, गौला, गगास, गोमती गरुड़गंगा और सरयू आदि सघन वनों से निकली और वर्षा से पोषित नदियों की जलधाराएं निरंतर घटती चली जा रही हैं.

वैज्ञानिकों की मानें तो कौसानी के पास पिनाथ पर्वत से निकलने वाली कोसी नदी का जल प्रवाह अल्मोड़ा के निकट 1994 में 995 प्रति सेकंड था, जो 10 साल बाद 2003 में घट कर मात्र 85 प्रति सेकंड रह गया है. दूसरी नदियों का भी यही हाल है. वैज्ञानिकों के अनुसार ऐसी हालत बनी रही तो 10 से 15 साल के भीतर ये नदियां पूरी सूख जाएंगी.


गंगा का भूगोल छिन्न-भिन्न किया जा रहा है. टिहरी से धरासू तक टिहरी बांध का जलाशय ही नजर आता है. यहां रुका हुआ पानी हरा हो गया है, यहां गंगा मर चुकी है. इससे आगे धरासू से गंगोत्री की दूरी 125 किलोमीटर है. अब यहां भी गंगा को अपने प्राचीन रास्ते बदलकर सुरंगों और बांधों से गुजरना होगा. गंगा को इस तरह बाधित करने से उसके सूख जाने की आशंका जाहिर की जा रही है.

धरासू-उत्तरकाशी से गंगोत्री तक बनने वाली पांच नई परियोजनाओं में मनेरी भाली प्रथम और द्वितीय, भैरोघाटी प्रथम और द्वितीय सहित लोहारी नागपाला बांधें शामिल हैं. इनमें भैरोघाटी प्रथम और द्वितीय परियोजनाएं तो गंगोत्री में ही बनने वाली हैं.

राधा भट्ट का नेतृत्व

75 साल की गांधीवादी कार्यकर्ता राधा भट्ट नदी बचाओ के लिए संघर्ष का नेतृत्व कर रही हैं.


हिमालय के मध्य भाग में गंगा की दो धाराएं हैं जो विपरीत दिशाओं में अलकनंदा और भागीरथी के नाम से बहती हुई देवप्रयाग में एक-दूसरे से मिल जाती हैं और यहीं मिलने वाली दोनों नदियों की धाराएं गंगा के स्वरुप में पूरी तरह से ढल जाती है. प्रस्तावित बांधों के बनने से गंगा बहुत जल्द ही हमारी आंखों से ओझल हो जाएगी और वह सुरंगों से होकर बहेगी. ऐसे में सुरंगों में पहुंचाई जाने वाली गंगा अपने वजूद के लिए कब तक खैर मनाएगी !

गंगा नदी को सुरंग में डालने का विरोध धीरे-धीरे तेज़ हो रहा है. यह विरोध उत्तराखंड की सीमाओं से बाहर निकल कर देशव्यापी हो रहा है. इसमें नदी बचाओ अभियान के अलावा हिमालय के पर्वत श्रृंखलाओं पर आश्रम बना कर रहने वाले साधु-संत भी कूद गए हैं. गंगा की मूल धारा के रुप में विख्यात भागीरथी के प्रवाह को गंगोत्री से उत्तरकाशी तक किसी भी तरह के मानवीय व्यवधानों से मुक्त रखने की अपील के साथ वैज्ञानिक और पर्यावरण मामलों के जानकार प्रोफेसर जी डी अग्रवाल तो आमरण अनशन पर ही बैठ गए हैं.

उत्तराखंड में नदियों को बचाने के लिए अहिंसक तरीके से शुरु हुई इस लड़ाई की पहली कामयाबी तो यह हुई है कि गढ़वाल और कुमाऊं के बीच भेद खत्म हो गए हैं. उत्तराखंड नदी बचाओ अभियान द्वारा आयोजित जलयात्रा के तहत साल के शुरु में प्रदेश की पंद्रह नदी घाटियों से आई पदयात्रा टोलियों ने गढ़वाल और कुमाऊं के संगम स्थल रामनगर में सभा की और यहीं नदियों को बचाने का सामूहिक संकल्प लिया.

राधा भट्ट का नेतृत्व

अभियान को इसलिए भी गति मिलने लगी है क्योंकि इसका नेतृत्व चिपको आंदोलन सहित शराबबंदी के खनन उद्योगों के खिलाफ और उत्तराखंड राज्य बनाने के आंदोलनों के अनुभवों से तपी-तपाई और गांधी शांति प्रतिष्ठान की अध्यक्ष राधा भट्ट ने स्वीकार कर लिया है. इस लड़ाई में प्रदेश के करीब तीस से अधिक संगठन एकजुट हो गए हैं.

देश भर में लड़ाई की तैयारी

उत्तराखंड में नदियों को लेकर पहली बार एक ऐसी लड़ाई शुरु हुई है, जो सिर्फ उत्तराखंड तक सीमित नहीं रहने वाली है. यह लड़ाई नदी, गांव, जीवन, संस्कृति-सभ्यता और आजीविका के संसाधनों की भी लड़ाई है, जो इन दिनों देश के कई हिस्सों में लड़ी जा रही है. इस लड़ाई को राष्ट्रीय स्तर की लड़ाई में बदलने का हौसला उत्तराखंड नदी बचाओ अभियान ने जुटाया है. इस अभियान के तहत रवि चोपड़ा के संयोजन में देश भर में जल यात्रा निकालने की तैयारी चल रही है.

देश के सर्वोच्च गांधीवादी महिला संस्थानों की सचिव रहते हुए अनेक उल्लेखनीय कार्य करने वाली 75 साल की राधा भट्ट नदी बचाओ के लिए संघर्ष का आह्वान करती हुई कोसी नदी की मुख्य घाटी के कोटली से चनौदा, सोमेश्वर तक और मनसारी नाला व साईगाड़ घाटी के महिला मंडलों की मिसाल पेश करती हैं, जिन्होंने वसंती बहन के नेतृत्व में पिछले पांच वर्षों से आरक्षित वनों को संरक्षित करके नदी जल को बढ़ाने के भागीरथ प्रयास किए हैं.

भट्ट उत्तराखंड नदी बचाओ अभियान के लिए साल भर का कार्यक्रम तय कर कार्यकर्ताओं की फौज के साथ संघर्ष के मैदान में कूद गई हैं. वे नदियों पर बांध के विरुद्ध हैं, साथ ही जहां बांध बन गए हैं, वहां से स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने की भी वकालत करती हैं.

उत्तराखंड के लोग अपनी नदियों को बचाने के लिए एकजुट हो रहे हैं. लगातार धरना, प्रदर्शन और जलयात्राएं निकल रही हैं. देखना यह होगा कि नदियों को बचाने के लिए दृढ़संकल्प होने का दावा करने वाली उत्तराखंड की सरकार की आंखों में भी पानी बचा या है नहीं.


स्रोत http://www.raviwar.com/news/38_save-river-uttarakhand-prasunlatant.shtml