Tuesday, May 27, 2008

यमुनोत्री का सूर्यकुंड आकर्षण का केंद्

हिमालय की गोद में बसे चारधाम यात्रा के पहले पड़ाव यमुनोत्री धाम का हिंदू पुराणों में विशेष स्थान है। नैसर्गिक सौंदर्य से परिपूर्ण यह क्षेत्र देश विदेश के सैलानियों को बड़ी संख्या में अपनी ओर आकर्षित करता है। यमुनोत्री मंदिर के कपाट वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को श्रृद्धालुओं के लिए खोल दिए जाते है् और यह कपाट दीपावली के बाद यम द्वितीया को बंद हो जाते हैं। यहां का सूर्य कुंड पर्यटकों के आकर्षक का केंद्र है।

पौराणिक कथा के अनुसार यमुना जी यमराज की भगनी, सूर्य भगवान की पुत्री और भगवान कृष्ण की आठ पटरानियों में कालिंदी के नाम से प्रसिद्ध हैं। यमुना नदी का उद्गम स्थान यमुनोत्री कांठा के अंग में है। यमुना नदी के उद्गम स्थल में सप्तर्षि कुंड है, जहां ग्लेशियरों में पानी जमा रहता है। कहा जाता है कि बारह ऋृषि जो महादेव के साथ लंका से आए थे, यहीं के हिमालय में शिवजी की तपस्या करते थे और महावीर हनुमान भी इसी हिमालय की बंदर पुच्छ नामक चोटी पर तप करते थे, इसलिए इस नदी का नाम हनुमान गंगा प्रसिद्ध हुआ। यह नदी यमुना से खरसाली गांव के पास मिलती है। यमुनोत्री मंदिर के पंडे आज भी इसी गांव में निवास करते हैं। हिमालय की बुलंदियों के बीच घिरे संतोत्पथ बंदर पुच्छ केदार खंड रोहिणी कांठा ने इस पौराणिक स्थल को आर्कषक बना दिया है। यमुनोत्री का मुख्य आकर्षण यहां के गर्म पानी के कुंड हैं। उष्ण जल के स्त्रोत यमुनोत्री से 500 गज नीचे हैं और यहां पानी का तापमान 94.7 डिग्री रहता है। इस गर्म जल के आस पास की भूमि बराबर गर्र्मं रहती है, इसी कारण यहां की भूमि पर बर्फ नहीं टिकती। यमुनोत्री आने वाले तीर्थयात्री सर्वप्रथम गरम पानी के कुंड में स्नान कर यात्रा की पूरी थकान दूर करते हैं। पुरूष व महिलाओं के लिए अलग-अलग कुंड बनाए गए हैं। स्नान करने के पश्चात श्रद्धालु मंदिर में दर्शन कर तृप्त कुंड से थोड़ी ऊंचाई पर स्थित दिव्य शिला के दर्शन करते हैं। यहां से ठीक सामने उबलते पानी का सूर्य कुंड है, जिसमें पोटली में बंधे चावल डालकर यमुनोत्री के असली प्रसाद के रूप में उबले चावलों को ग्रहण किया जाता है।

सोजन्य से जागरण न्यूज़

Friday, May 23, 2008

चम्पावत- एक अनुकरणीय विरासत

चम्पावत की संस्कृति को आकार यहां के इतिहास से मिला है। यह एक प्राचीन शहर है जिसे 10वीं सदी में कुमाऊं के चंद वंश के राजाओं द्वारा बनवाया गया था। स्थानीय आकर्षणों में सुंदर मंदिर परिसरों के अवशेष तथा कुछ पौराणिक तौर पर जुड़े स्थल जैसे गोरिल देवता तथा नागनाथ के मंदिर शामिल हैं। यह शहर चीड़ पेड़ के वनों तथा समतल हरे-भरे खेतों से घिरा है एवं यहां का शांतिपूर्ण वातावरण तथा यहां के मित्रवत लोग आपके हृदय में जगह बना लेंगे। शहर के आस-पास घूमने योग्य स्थानों में प्राचीन घटोत्कच्छ मंदिर तथा मायावती में स्वामी विवेकानंद से जुड़ा आश्रम शामिल हैं।

पोराणिक मान्यताओं के अनुसार

जोशीमठ की गुरूपादुका नामक ग्रंथ के अनुसार नागों की बहन चम्पावती ने चम्पावत के बालेश्वर मंदिर के पास प्रतिष्ठा की थी। वायु पुराण में चम्पावतपुरी नामक का उल्लेख मिलता है जो नागवंशीय नौ राजाओं की राजधानी थी। स्कंद पुराण के केदार खंड में चंपावत को कुर्मांचल कहा गया है, वह स्थान जहां भगवान विष्णु ने एक कछुए का अवतार लिया था। कुमाऊं वास्तव में कुर्मांचल का अपम्रंश है। चंपावत का संबंध महाभारत के प्रणेताओं पांडवों से भी है। माना जाता है कि अपने 14 वर्षों के निर्वासित जीवन के दौरान पांडव इस क्षेत्र में आये थे तथा यहीं भीम की मुलाकात राक्षसी हिडिंबा से हुई थी, जिसने भीम पर आसक्त होकर उनसे विवाह कर लिया। चंपावत में घटोत्कच्छ मंदिर भीम और हिडिंबा के पुत्र घटोत्कच्छ को समर्पित है।

चंपावत तथा इसके आस-पास बहुत से मंदिरों का निर्माण महाभारत काल में हुआ माना जाता है। एक दूसरी प्रचलित किंवदन्ती ग्वाल देवता से संबंधित है, जिन्हें गोरिल या गोलु भी कहते हैं तथा जिन्हें न्याय का देवता माना जाता है। चंपावत के ग्वारैल चौर में इन्हें समर्पित एक मंदिर हैं जो हजारों-हजार तीर्थयात्रियों के आकर्षण का केंद्र है क्योंकि वे पद दलितों को न्याय प्रदान करते हैं।

स्थानीय आकर्षण

आज चंपावत एक छोटा शहर पर जिला प्रशासन का मुख्यालय है। फिर भी इसकी विरासत एवं प्राचीन गौरवपूर्ण चंद वंश की राजधानी का प्रमाण कई स्थानों जैसे बालेश्वर मंदिर तथा राजा का चबूतरा जो शहर के बीच है, पर देखा जा सकता है। इसके अलावा चंपावत आने वाले पर्यटकों को एक शोरगुल रहित शांत वातावरण प्रदान करता है जहाँ आराम के साथ-साथ हिमालय के सुंदर दृश्यों को देखा जा सकता है।


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Wednesday, May 21, 2008

85 हजार श्रद्धालु कर चुके केदारनाथ बाबा के दर्शन

सर्द मौसम के बावजूद प्रसिद्ध धाम भगवान केदारनाथ में भोले के दर्शनों के लिए तीर्थ यात्रियों का सैलाब उमड़ रहा है। कपाट खुलने से लेकर अब तक 85 हजार से अधिक श्रद्धालु बाबा के दरबार में पहुंचकर दर्शन कर चुके हैं।

ग्यारहवें ज्योर्तिलिंग भगवान केदारनाथ के दर्शनों के लिए प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु देश-विदेश से केदारपुरी पहुंच रहे है। कई दिनों से हल्की बूंदा-बांदी के साथ ही बर्फबारी के चलते यहां ठंड का प्रकोप बढ़ गया है, लेकिन तीर्थ यात्रियों पर इसका कोई असर नहीं दिखाई दे रहा है। बाबा के दरबार में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में प्रतिदिन हो रहे भारी इजाफे से केदारपुरी की रौनक और अधिक बढ़ गयी है। खासकर यहां विदेशी पर्यटक अत्यधिक संख्या में पहुंच रहे हैं और यहां के प्राकृतिक सौंदर्य का जमकर लुत्फ उठा रहे है।

सोजन्य से जागरण न्यूज़

Monday, May 19, 2008

मद्महेश्वर: यहां होती है शिव की नाभि पूजा

हिमालय पर्वत की श्रंखलाओं की गोद में अनेक तीर्थ स्थल है जो कि श्रद्धालुओं के लिए असीम आस्था के केंद्र है इन्हीं पंचकेदारों में से एक द्वितीय केदार के नाम से प्रसिद्ध भगवान मद्महेश्वर जहां शिव के नाभि की पूजा होती है। मान्यता है कि स्वर्ग लोक से कामधेनु गाय रोज यहां दूध चढ़ाती थी। आज भी यहां गाय के खुर व स्तन विद्यमान है। गत रविवार को द्वितीय केदार के कपाट खुलने के बाद यहां भगवान के दर्शनों के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी है।

हिमालय के चौ-खम्बा पर्वत की गोद में समुद्र तल से 9700 फिट की ऊंचाई पर स्थित भगवान मद्महेश्वर का मंदिर श्रद्धालुओं के लिए असीम आस्था का केन्द्र बिन्दु है। मान्यता है कि भोले को यह स्थान काफी प्रिय था, विवाह कि बाद भगवान शिव ने अधिक समय यहीं पर बिताया था। इसे गुप्त तीर्थ के नाम भी जाना जाता है। किवदंती है कि जो भी नि:संतान दंपति पुत्ररत्न की प्राप्ति के लिए यहां पर भगवान की मन से पूजा करता है उसे इच्छित फल की प्राप्ति होती है। पांडवों ने स्वर्गारोहण के समय पंचकेदारों की स्थापना की। कहा जाता है कि स्वर्ग लोक से कामधेनु गाय नित्य यहां दूध चढ़ाती थी। वर्तमान में यहां गाय के खुर व स्तन भी विद्यमान है। यहां श्वेत भैरव निरन्तर भोले की रक्षा करते है। पुराणों के अनुसार मद्महेश्वर तीर्थ में गौड़ देश का स्वाधी ब्राह्मण अपने समस्त पित्रों के कल्याणार्थ तीन रात्रि जागरण करने के पश्चात पूजा अर्चना कर लौट रहा था कि उन्हें मार्ग में एक विशाल विकराल राक्षस दिखाई दिया जिसकी जंघाओं से सैकड़ों कृमि निकल रहे थे यह देखकर उक्त ब्राह्मण भयभीत हो गया। घबराए हुए व कुछ भी न बोल सका, वह राक्षस भी ब्राह्मण की एकटक देखने लगा वह बोला कि में समझ रहा हूं कि मेरे कुछ पाप तुम्हारे दर्शनों से दूर हो गए है देखते-देखते ही वह स्वस्थ हो गया। ठंड अधिक होने के कारण नवम्बर में भगवान मद्महेश्वर के कपाट छ: माह के लिए बंद कर दिए जाते है। भगवान की डोली ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ पहुंचती है तथा यहां पर विश्व विख्यात धार्मिक मद्महेश्वर मेले का आयोजन होता है। गत रविवार को कपाट खुलने के बाद भगवान मद्दमहेश्वर के दर्शनों के लिए देश-विदेश के श्रद्धालुओं का यहां पहुंचना शुरू हो गया है। भगवान मद्दमहेश्वर की पैदल यात्रा कठिन होने के बावजूद भी यहां पहुंचने पर श्रद्धालुओं को असीम शांति की अनुभूति होती है।

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पचास हजार श्रद्धालुओं ने मां पूर्णागिरि धाम में शीश नवाये

उत्तर भारत के सुप्रसिद्ध मां पूर्णागिरि धाम में काफी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे है। बुद्ध पूर्णिमा पर्व पर पचास हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने मां पूर्णागिरि मंदिर में शीश नवाये। गर्मी में कमी के कारण व रविवार को अवकाश होने के कारण शनिवार से ही श्रद्धालुओं का आना जारी था। काफी भीड़भाड़ के चलते कालिका मंदिर से मुख्य मंदिर तक भीड़ को काबू में करने के लिए जगह- जगह बैरिकेटिंग लगाया गया । जिससे श्रद्धालुओं को मां पूर्णागिरि दर्शन के लिए घंटों इंतजार करना पड़ा। ठूलीगाड़ में भी भारी संख्या में वाहनों के पहुंचने से बार-बार जाम की स्थिति बनी रही। इधर टनकपुर के शारदा घाट में भी बुद्ध पूर्णिमा पर्व पर हजारों श्रद्धालुओं ने डुबकी लगाई व महिलाओं ने सूर्य देव को जल चढ़ाया। उधर नेपाल के महेन्द्र नगर व ब्रह्मदेव मंडी स्थित सिद्धनाथ बाबा के मंदिर में भी काफी संख्या में तीर्थयात्री दर्शन को पहुंच रहे है। जिससे यहां के बाजारों में काफी रौनक बनी हुई है।
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Sunday, May 18, 2008

गौरवशाली इतिहास है देहरादून का

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून का गौरवशाली इतिहास अनेक पौराणिक गाथाओं एवं विविध संस्कृतियों को तो अपने आगोश में समेटे हुए है ही साथ ही यह नाना प्रकार के झंझावतों और उथल-पुथल से भी भरपूर रहा है।

इतिहासविदें के अनुसार देहरादून का पुराना नाम द्रोणाश्रम था और इसका संबंध द्वापर युग में पांडवों तथा कौरवों के गुरु द्रोणाचार्य के इस क्षेत्र में तपस्या हेतु आगमन से जोड़ा गया है। इसका आधुनिक नाम देहरादून गुरु रामराय के यहां पदार्पण से निकट संबंध रखता है।

देहरादून दो शब्दों देहरा और दून से मिलकर बना है। इसमें देहरा शब्द को डेरा का अपभ्रंश माना गया है। जब गुरु रामराय इस क्षेत्र में आए तो अपने तथा अनुयायियों के रहने के लिए उन्होंने यहां अपना डेरा स्थापित किया। कालांतर में नगर का विकास इसी डेरे का आस-पास प्रारंभ हुआ। इस प्रकार डेरा का दून के साथ जुड़ जाने के पश्चात् यह स्थान देहरादून कहलाया जाने लगा। कुछ इतिहासविदें का यह भी मानना है कि देहरा शब्द स्वयं में सार्थकता लिए हुए है, इसको डेरा का अपभ्रंश रूप नहीं माना जा सकता है। देहरा शब्द हिंदी तथा पंजाबी में आज भी प्रयोग किया जाता है। हिंदी में देहरा का अर्थ देवग्रह अथवा देवालय है, जबकि पंजाबी में इसे समाधि, मंदिर तथा गुरुद्वारे के अर्थो में सुविधानुसार किया गया है। इसी तरह दून शब्द दूण से बना है और यह दूण शब्द संस्कृत के द्रोणि का अपभ्रंश है। संस्कृत में द्रोणि का अर्थ दो पहाड़ों के बीच की घाटी है।

देहरादून जिला उत्तर में हिमालय से तथा दक्षिण में शिवालिक पहाड़ियों से घिरा हुआ है, पूर्व में गंगा नदी और पश्चिम में यमुना नदी प्राकृतिक सीमा बनाती है। इस जिले का क्षेत्रफल 3088 वर्ग किमी है। यह जिला दो प्रमुख भागों में बंटा है जिसमें मुख्य शहर देहरादून एक खुली घाटी है जो कि शिवालिक तथा हिमालय से घिरी हुई है और दूसरे भाग में जौनसार बावर है जो हिमालय के पहाड़ी भाग में स्थित है। दून क्षेत्र का प्राचीन केदारखंड में यमुना, टौंस, बालखिल्य [सुसवा], सिद्धकूट [नागसिद्ध], ऋषिकेश और तपोवन के नामों से उल्लेख है। द्वापर युग में गुरु द्रोणाचार्य ने द्वारागांव के पास देहरादून शहर से 19 किमी पूर्व में देवदार पर्वत पर तप किया था। इसी से यह घाटी द्रोणाश्रम कहलाती है। बालखिल्य अथवा सुसवा नदी की उत्पत्ति की रोचक कथा है। एक बार देवताओं के राजा इंद्र ने बालखिल्य ऋषियों को गाय के खुर के समान पानी से भरे गढ्डे में क्रीड़ा करते देखा और वे उनके छोटे शरीर की हंसी करने लगे। इससे खिन्न होकर बालखिल्य ऋषियों ने दूसरे इंद्र की रचना के लिए तप किया। तपस्या मग्न ऋषियों के शरीर से इतना पसीना निकला कि उससे बालखिल्य या शोभन नदी बन गई जिसे अब सुसवा कहते हैं।

केदारखंड को स्कंदपुराण का एक भाग माना जाता है। इसमें गढ़वाल की सीमाओं का वर्णन इस तरह है- गंगाद्वार-हरिद्वार से लेकर श्वेतांत पर्वत तक तथा तमसा-टौंस नदी से बौद्धांचल-बघाण में नन्दा देवी तक विस्तृत भूखंड जिसके एक ओर गंगा और दूसरी तरफ यमुना नदी बहती है। तमसा का प्रवाह भी देहरादून से होकर है।

रामायण काल से देहरादून के बारे में विवरण आता है कि रावण के साथ युद्ध के बाद भगवान राम और उनके छोटे भाई लक्ष्मण इस क्षेत्र में आए थे। अंग्रेज लेखक जीआरसी विलियम्स ने मेमोयर्स आफ दून में ब्राह्मण जनुश्रुति का उल्लेख करते हुए लिखा है कि लंका विजय के पश्चात् ब्राह्मण रावण को मारने का प्रायश्चित करने और प्रायश्चित स्वरूप तपस्या करने के लिए गुरु वशिष्ठ की सलाह पर भगवान राम लक्ष्मण के साथ यहां आए थे। राम ने ऋषिकेश में और लक्ष्मण ने तपोवन में पाप से मुक्ति के लिए वर्षो तपस्या की थी।

इसी प्रकार देहरादून जिले के अंतर्गत ऋषिकेश के बारे में भी स्कंदपुराण में उल्लेख है कि भगवान् विष्णु ने दैत्यों से पीड़ित ऋषियों की प्रार्थना पर मधु-कैटभ आदि राक्षसों का संहार कर यह भूमि ऋषियों को प्रदान की थी। पुराणों में इस क्षेत्र को लेकर एक विवरण इस प्रकार भी है कि राम के भाई भरत ने भी यहां तपस्या की थी। तपस्या वाले स्थान पर भरत मंदिर बनाया गया था। कालांतर में इसी मंदिर के चारों ओर ऋषिकेश नगर का विकास हुआ। पुरातत्व की दृष्टि से भरत मंदिर की स्थापना सैकड़ों साल पुरानी है। स्कंद पुराण में तमसा नदी के तट पर आचार्य द्रोण को भगवान शिव द्वारा दर्शन देकर शस्त्र विद्या का ज्ञान कराने का उल्लेख मिलता है। यह भी कहा जाता है कि आचार्य द्रोण के पुत्र अश्वात्थामा द्वारा दुग्धपान के आग्रह पर भगवान शिव ने तमसा तट पर स्थित गुफा में प्रकट हुए शिवलिंग पर दुग्ध गिराकर बालक की इच्छा पूरी की थी। यह स्थान गढ़ी छावनी क्षेत्र में स्थित टपकेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर बताया जाता है। महाभारत काल में देहरादून का पश्चिमी इलाका जिसमें वर्तमान कालसी सम्मिलित है का शासक राजा विराट था और उसकी राजधानी वैराटगढ़ थी। पांडव अज्ञातवास के दौरान भेष बदलकर राजा विराट के यहां रहे। इसी क्षेत्र में एक मंदिर है जिसके बारे में लोग कहते कि इसकी स्थापना पांडवों ने की थी। इसी क्षेत्र में एक पहाड़ी भी है जहां भीम ने द्रौपदी पर मोहित हुए कीचक को मारा था। जब कौरवों तथा त्रिगता के शासक ने राजा विराट पर हमला किया तो पांडवों ने उनकी सहायता की थी।

महाभारत की लड़ाई के बाद भी पांडवों का इस क्षेत्र पर प्रभाव रहा और हस्तिनापुर के शासकों के अधीनस्थ शासकों के रूप में सुबाहू के वंशजों ने यहां राज किया। पुराणों मे देहरादून जिले के जिन स्थानों का संबंध रामायण एवं महाभारत काल से जोड़ा गया है उन स्थानों पर प्राचीन मंदिर तथा मूर्तियां अथवा उनके भग्नावशेष प्राप्त हुए हैं। इन मंदिरों तथा मूर्तियों एवं भग्नावशेषों का काल प्राय: दो हजार वर्ष तथा उसके आसपास का है। क्षेत्र की स्थिति और प्राचीन काल से चली आ रही सामाजिक परंपराएं, लोकश्रुतियां तथा गीत और इनकी पुष्टि से खड़ा समकालीन साहित्य दर्शाते हैं कि यह क्षेत्र रामायण तथा महाभारत काल की अनेक घटनाओं का साक्षी रहा है। यमुना नदी के किनारे कालसी में अशोक के शिलालेख प्राप्त होने से इस बात की पुष्टि होती है कि यह क्षेत्र कभी काफी संपन्न रहा होगा। सातवीं सदी में इस क्षेत्र को सुधनगर के रूप में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी देखा था। यह सुधनगर ही बाद में कालसी के नाम से पहचाना जाने लगा। कालसी के समीपस्थ हरिपुर में राजा रसाल के समय के भग्नावशेष मिले हैं जो इस क्षेत्र की संपन्नता को दर्शाते हैं। लगभग आठ सौ साल पहले दून क्षेत्र में बंजारे लोग आ बसे थे। उनके बस जाने के बाद यह क्षेत्र गढ़वाल के राजा को कर देने लगा। कुछ समय बाद इस ओर इब्राहिम बिन महमूद गजनवी का हमला हुआ।

इससे भी भयानक हमला तैमूर का था। सन् 1368 में तैमूर ने हरिद्वार के पास राजा ब्रह्मदत्त से लड़ाई की। ब्रह्मदत्त का राज्य गंगा और यमुना के बीच था। बिजनौर जिले से गंगा को पार कर के मोहन्ड दर्रे से तैमूर ने देहरादून में प्रवेश किया था। हार जाने पर तैमूर ने बड़ी निर्दयता से मारकाट करवाई, उसे लूट में बहुत-सा धन भी मिला था। इसके बाद फिर कई सदियों तक इधर कोई लुटेरा नहीं आया। शाहजहां के समय में फिर एक मुगल सेना इधर आई थी। उस समय गढ़वाल में पृथ्वी शाह का राज्य था। इस राजा के प्रपौत्र फतेह शाह ने अपने राज्य की सीमा बढ़ाने के उद्देश्य से तिब्बत और सहारनपुर पर एक साथ चढ़ाई कर दी थी, लेकिन इतिहास के दस्तावेजों के अनुसार उसको युद्ध में हार का मुंह देखना पड़ा था। सन् 1756 के आसपास श्री गुरु राम राय ने दून क्षेत्र में अपनी सेना तथा शिष्यों के साथ प्रवेश किया और दरबार साहिब की नींव रखकर स्थायी रूप से यहीं बस गए।

गूजर और राजपूतों के आ जाने से धीरे-धीरे दून की आबादी बढ़ने लगी। आबादी तथा अन्न की उपज बढ़ने से गढ़वाल राज्य की आमदनी भी बढ़ने लगी। देहरादून की संपन्नता देखकर सन् 1757 में रूहेला सरदार नजीबुद्दौला ने हमला किया। इस हमले को रोकने में गढ़वाल राज्य नाकाम रहा, जिसके फलस्वरूप देहरादून मुगलों के हाथ में चला गया। देहरादून के तत्कालीन शासक नजब खाँ ने इसके परिक्षेत्र को बढ़ाने में भरपूर कोशिश की। उसने आम के पेड़ लगवाने, नहर खुदवाने तथा खेती का स्तर सुधारने में स्थानीय निकायों को भरसक मदद पहुंचाई, लेकिन नजब खाँ की मौत के बाद किसानों की दशा फिर दीनहीन हो गई।

गुरु राम राय दरबार के कारण यहां सिखों की आवाजाही भी बढ़ चुकी थी। अत: एक बार फिर से देहरादून का गौरव समृद्धशाली क्षेत्र के रूप में फैलने लगा। सन् 1785 में गुलाम कादिर ने इस क्षेत्र पर हमला किया। इस बार बड़ी मारकाट मची। गुलाम कादिर ने लौटते समय उम्मेद सिंह को यहां का गवर्नर बनाया। गुलाम कादिर के जिंदा रहते उम्मेद सिंह ने स्वामी भक्ति में कोई कमी न आने दी, लेकिन उनके मरते ही सन् 1796 में उम्मेद सिंह ने गढ़वाल राजा प्रद्युम्न शाह से संधि कर ली।

सन् 1801 तक देहरादून में अव्यवस्था बनी रही। प्रद्युम्न शाह का दामाद हरिसिंह गुलेरिया दून की प्रजा का उत्पीड़न करने वालों में सबसे आगे था। अराजकता के कारण दून की वार्षिक आय एक लाख से घटकर आठ हजार रुपये मात्र रह गई थी। प्रद्युम्न शाह के मंत्री रामा और धरणी नामक बंधुओं ने दून की व्यवस्था सुधार में प्रयास आरंभ किए ही थे कि प्रद्युम्न शाह के भाई पराक्रम शाह ने उनका वध करा दिया। अब देहरादून की सत्ता सहसपुर के पूर्णसिंह के हाथों में आ गई, किंतु वह भी व्यवस्था में सुधार न ला सका। पराक्रम शाह ने अपने मंत्री शिवराम सकलानी को इस आशय से देहरादून भेजा गया कि वह उसके हितों की रक्षा कर सके। शिवराम सकलानी के पूर्वज शीश राम को रोहिला युद्ध में वीरता दिखाने के कारण टिहरी रियासत ने सकलाना पट्टी में जागीर दी थी। इन सभी के शासन काल में देहरादून का गवर्नर उम्मेद सिंह ही बना रहा। वह एक चतुर राजनीतिज्ञ था इसी कारण प्रद्युम्न शाह ने अपनी एक पुत्री का विवाह उसके साथ करके उसे अपना स्थायी शासक नियुक्त कर दिया। कहा जाता है कि 1803 में गोरखा आक्रमण के समय उम्मेद सिंह ने अवसरवादिता का परिचय इस प्रकार दिया कि युद्ध के समय वह अपने ससुर के पक्ष में खड़ा नहीं देखा गया। देहरादून को उसकी संपन्नता के कारण ही समय-समय पर लुटेरों की लूट एवं तानाशाहों की प्रवृत्ति का शिकार बनते रहना पड़ा।

सन् 1760 में गोरखों ने अल्मोड़ा को जीतने के उपरांत गढ़वाल पर धावा बोला। गढ़वाल के राजा ने गोरखों को पच्चीस सौ रुपये वार्षिक कर के रूप में देना शुरू किया, लेकिन इतना नजराना पाने के बावजूद भी 1803 में गोरखों ने गढ़वाली सेना से युद्ध छेड़ दिया। गोरखों की विजय हुई और उनका अधिकार क्षेत्र देहरादून तक बढ़ गया। ईस्ट इंडिया कंपनी ने देहरादून को गोरखों के प्रभाव से मुक्त कराने के लिए मोहन्ड और तिमली दर्रो से अंग्रेज सेना भेजी। अंग्रेजों ने बल का उपयोग करके गोरखों को खदेड़ बाहर किया और इस तरह उनका देहरादून में प्रभुत्व स्थापित हो गया। उन्होंने अपने आराम के लिए 1827-28 में लंढोर और मसूरी शहर बसाया। कुछ समय के लिए देहरादून जिला कुमाऊँ कमिश्नरी यानी मंडल में रहा फिर इसको मेरठ में मिला दिया गया। आज यह गढ़वाल मंडल में है। 1970 के दशक में इसे गढ़वाल मंडल में शामिल किया गया। सन् 2000 में उत्तरप्रदेश से अलग होकर बने उत्तरांचल [अब उत्तराखंड] की अस्थाई राजधानी देहरादून को बनाया गया। राजधानी बनने के बाद इस शहर का आकार निरंतर बढ़ रहा है।

सोजन्य से जागरण न्यूज़

मद्दमहेश्वर और रुद्रनाथ के कपाट खुल

मध्य हिमालय में स्थित पंचकेदारों में द्वितीय केदार भगवान मद्दमहेश्वर और भगवान रुद्रनाथ के कपाट विधि-विधान के साथ श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए गए है। अब छह माह तक भोले की पूजा अर्चना यहीं पर की जाएगी। रविवार सुबह आठ बजे द्वितीय केदार की उत्सव डोली गौंडार गांव से बणतौली, कटरा, नानू, मैखंडा होते हुए मद्दमहेश्वर धाम पहुंची। मंदिर के धर्माधिकारी उमादत्त सेमवाल वेदपाठी विनोद जमलोकी व मद्दमहेश्वर मंदिर के पुजारी गंगाधर लिंग ने वैदिक पूजा-अर्चना के साथ उत्सव डोली से भगवान की मूर्ति को मंदिर के गर्भ ग्रह में स्थापित किया।पंचकेदारों में एक द्वितीय केदार भगवान मद्दमहेश्वर मंदिर में शिव के मध्य भाग नाभि की पूजा-अर्चना की जाती है।
चतुर्थ केदार भगवान रुद्रनाथ के कपाट विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद रविवार प्रात: 5:30 बजे दर्शनार्थियों के लिए खोल दिए गए हैं। साढ़े बारह हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित भगवान रुद्रनाथ की उत्सव डोली गोपेश्वर स्थित गोपीनाथ मंदिर से छह माह की शीतकालीन अवधि के बाद इस चतुर्थ केदार रुद्रनाथ को रवाना हुई थी। सगर, गंगोलगांव, ग्वाड़, देवलधार व विश्व के खूबसूरत बुग्यालों में से एक पनार से होते हुए भगवान की उत्सव डोली शनिवार को रुद्रनाथ पहुंची थी। जिसका रविवार को वेदोच्चार और मंत्रोच्चारणों के साथ भगवान आसुतोष के अभिषेक के बाद श्रृंगार कर कपाटों को आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। छह माह की ग्रीष्मकालीन अवधि तक भगवान रुद्रनाथ के दर्शनों के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं। कपाट खुलने के अवसर पर हजारों श्रद्धालुओं ने जलाभिषेक कर पुण्य लाभ अर्जित किए। रुद्रनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी प्रयागदत्त भट्ट ने कहा कि पुराणों में चतुर्थ केदार रुद्रनाथ के दर्शन करने मात्र से ही जीवन के कष्ट दूर हो जाते हैं। नैसर्गिक छटाओं से आच्छादित यह पूरा क्षेत्र श्रद्धालुओं के लिए खास तौर पर आकर्षण का केंद्र रहा है, लेकिन 24 किलोमीटर की दुर्गम पैदल यात्रा जहां श्रद्धालुओं को थका देती है, वहीं पंचकेदारों में से एक महत्वपूर्ण केदार क्षेत्र में पहुंचने मात्र से ही श्रद्धालुओं की सारी थकान दूर हो जाती है

सोजन्य से जागरण न्यूज़

Tuesday, May 13, 2008

21 हजार श्रद्धालु कर चुके गंगोत्री-यमुनोत्री के दर्शन

गंगोत्री व यमुनोत्री धाम के दर्शन करने वाले तीर्थ यात्रियों की भीड़ में इस साल जोरदार बढ़ोत्तरी हुई है। सात दिन में 21 हजार से अधिक यात्री स्नान व पूजा-अर्चना कर चुके हैं। भीड़ को संभालने में पुलिस को रात-दिन पसीना बहाना पड़ रहा है।

विश्व प्रसिद्ध धाम गंगोत्री व यमुनोत्री के कपाट खुले अभी एक सप्ताह हुआ है। इस साल तीर्थ यात्रियों की संख्या में जबरदस्त वृद्धि नजर आ रही है। गत वर्ष की अपेक्षा तीन गुना अधिक तीर्थ यात्री अभी तक दर्शनों के लिए पहुंचे है। यात्रियों को पार्किग की समस्या और वाहनों के प्रवेश को लेकर परेशानी झेलनी पड़ रही है। हनुमानचट्टी से आगे बड़े वाहन प्रवेश नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में प्रीपेड व्यवस्था के तहत हनुमानचट्टी से जानकी चट्टी तक तीर्थ यात्रियों को जीप व टैक्सी से पहुंचाया जा रहा है। पुलिस अधीक्षक नीलेश आनंद भरणे ने कहा कि प्रीपेड व्यवस्था के तहत 60 टैक्सियां उपलब्ध हैं। इन टैक्सियों की संख्या बढ़ाए जाने के लिए ऋषिकेश व हरिद्वार संपर्क किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यात्रा मार्ग पर पुलिस को अबके कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। यात्रियों को सूचना व सुरक्षा पुलिस का महत्वपूर्ण दायित्व है। एसपी ने बताया कि यमुनोत्री यात्रा पर प्रतिदिन 3 हजार से अधिक यात्री पहुंच रहे हैं। गंगोत्री में प्रति दिन चार हजार से अधिक यात्री दर्शनों को पहुंच रहे हैं। ऐसे में गंगोत्री की वाहन पार्किंग व्यवस्था तंग नजर आ रही है। पुलिस अधीक्षक नीलेश आनंद भरणे ने कहा कि गंगोत्री की ओर 130 बडे़ वाहन और 120 छोटे वाहनों की आवाजाही नित्य हो रही है। करीब 250 वाहन गंगोत्री पहुंच रहे है। गंगोत्री में पार्किंग व्यवस्था न होने से स्थिति विकट हो गई है। पुलिस अधीक्षक ने कहा कि इसका समाधान भी तलाश लिया गया है। कोशिश की जा रही है कि भैरव घाटी से प्रति दिन 30 वाहन ही आगे जाएं। 30 के बाद जाने वाले वाहनों को भैरवघाटी में रोककर वहां से प्रीपेड टैक्सी के माध्यम से यात्रियों को गंगोत्री की रवाना किए जाने की व्यवस्था पर विचार किया जा रहा है।

सोजन्य से जागरण न्यूज़

Monday, May 12, 2008

उत्तराखंड में प्रमुख

उत्तराचंल की प्रमख नदियां
गंगा, यमुना, काली, रामगंगा, भागीरथी, अलकनन्दा, कोसी, गोमती, टौंस, मंदाकिनी, धौली गंगा, गौरीगंगा, पिंडर नयार(पू) पिंडर नयार (प) आदी प्रमुख नदीयां हैं।

उत्तराचंल के प्रमुख हिमशिखर

गंगोत्री (6614), दूनगिरि (7066), बंदरपूछ (6315), केदारनाथ (6490), चौखंवा (7138), कामेत (7756), सतोपंथ (7075), नीलकंठ (5696), नंदा देवी (7817), गोरी पर्वत (6250), हाथी पर्वत (6727), नंदा धुंटी (6309), नंदा कोट (6861) देव वन (6853), माना (7273), मृगथनी (6855), पंचाचूली (6905), गुनी (6179), यूंगटागट (6945)।

उत्तराचंल के प्रमुख ग्लेशियर

1. गंगोत्री 2. यमुनोत्री 3. पिण्डर 4. खतलिगं 5. मिलम 6. जौलिंकांग, 7. सुन्दर ढूंगा इत्यादि।

उत्तराचंल की प्रमुख झीलें (ताल)

गौरीकुण्ड, रूपकुण्ड, नंदीकुण्ड, डूयोढ़ी ताल, जराल ताल, शहस्त्रा ताल, मासर ताल, नैनीताल, भीमताल, सात ताल, नौकुचिया ताल, सूखा ताल, श्यामला ताल, सुरपा ताल, गरूड़ी ताल, हरीश ताल, लोखम ताल, पार्वती ताल, तड़ाग ताल (कुंमाऊँ क्षेत्र) इत्यादि।

उत्तराचंल के प्रमुख दर्रे

बरास- 5365मी.,(उत्तरकाशी), माणा- 6608मी. (चमोली), नोती-5300मी. (चमोली), बोल्छाधुरा-5353मी.,(पिथौरागड़), कुरंगी-वुरंगी-5564 मी.( पिथौरागड़), लोवेपुरा-5564मी. (पिथौरागड़), लमप्याधुरा-5553 मी. (पिथौरागड़), लिपुलेश-5129 मी. (पिथौरागड़), उंटाबुरा, थांगला, ट्रेलपास, मलारीपास, रालमपास, सोग चोग ला पुलिग ला, तुनजुनला, मरहीला, चिरीचुन दर्रा।

उत्तराचंल के वन अभ्यारण्य

1. गोविन्द वन जीव विहार 2. केदारनाथ वन्य जीव विहार 3. अस्कोट जीव विहार 4. सोना नदी वन्य जीव विहार 5. विनसर वन्य जीव विहार

उत्तराखण्ड के लोक गीतः

गीत और संगीत उत्तराखण्ड संस्कृति का अनादिकाल से महत्तवपूर्ण अंग रहा है। हर मौकों पर गीत गाए जाते हैं। यहाँ तक कि जब पर्वतीय महिलाएँ घास काटने जंगलों में जाती हैं वहां भी लोकगीत गाये या गुनगुनाए जाते हैं। कुछ लोक गीतों का विवरण इस प्रकार हैः-

मांगलः- यह गीत शभ कार्यों एंव शादी विवाह के मौकपर गाये जाते हैं।
जागरः- जागर देवताओं के गीत है जैसे- विनसर, नागर्जा, नरसिंह, भैरों, ऐड़ी, आछरी, जीतू, लाटू, भगवती, चण्डिका, गालू देवता आदी।
पंडोवः - पंडोव गढ़वाली लोक साहित्य के मौलिक महाकाव्य तथा खण्ड काव्य है। इन गीतों में ठाकुरी राजाओं के वीर गाथाओं को गाया जाता है। जैसे तीलूरोतेली, जोतरमाला, पत्थरमाला, नौरंगी, राजुला, राजा, जिते सिंह आदी।
चौफुलाः - यह नृत्य चांदनी रात में गोल दायरे में घूमकर पुरूष तथा महिलाएं मिलकर गाते हैं। इसमें प्रकृति तथा उत्सवों के गीत गाये जाते हैं। यह नृत्य काफी कुछ गुजरात के “ गरबा ” नृत्य से मिलता है।
खुदेड़ गीतः - करूणात्मक शैली के गीत “खुदेड़” हैं। यह गीत माँ-बाप, भाई-बहन, सखी, वन, पशु-पक्षी, नदी, फल-फलों की स्मृति ताजा कराते है और इनकी याद आ जाने पर सबसे मिलने की चाह पैदा हो जाती है तथा न मिल पाने की स्थिति में ये गीत मुखार बिन्दु पर फूट पड़ते हैं।
चौमासाः - वर्षा ऋतु में हिमालय की गोद में बसे उत्तराखण्ड का सौंदर्य निराला होता है। इस ऋतु के दिनों में अक्सर परदेश में गये साथी की ज्यादा याद सताती है तब यह गीत अपने आप मुखार बिन्दु पर फूट पड़ते हैं।
थड़याँ - यह नृत्य बसंत पंचमी से लेकर विषुवत सक्रान्ति तक नेक सामाजिक व देवताओं के नृत्य गीतों के साथ खुले मैदान में गोलाकार होकर स्त्रियों द्वारा किया जाता है।


सोजन्य से odaligaon

हिमालय की गोद में मन्दिर

गंगोत्री

गंगा के उद्गम के पास देवी गंगा का स्थान, गंगोत्री चार धाम यात्राओं में से एक तीर्थ है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में मौजूद यह मंदिर 18 वीं शताब्दी का है। हिन्दू पौराणिक कथा के अनुसार स्वर्ग की बेटी देवी गंगा ने राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर उनके पुरखों के पाप धोने के लिए नदी का रूप धारण किया था। गंगा नदी के इस तीव्र बहाव को कम करने के लिए भगवान शिव ने इस बहाव को अपनी जटाओं में ले लिया। गंगोत्री में बहने वाली भगीरथी नदी का बहाव जब कम होता है तब नदी में एक प्राकृतिक चट्टान दिखाई देती है।

कहा जाता है इसी चट्टान में बैठकर भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में समाया था। गंगोत्री से गंगा का उद्गम स्थल गौमुख, 17 किमी पैदल गंगोत्री ग्लेशियर के साथ चलकर दिखाई पड़ता है। यहां पहुंचने के लिए नजदीकी एयरपोर्ट जॉली ग्रांट और देहरादून है। अगर ट्रेन से जाना हो तो हरिद्वार या ऋषिकेश जाना होगा। हरिद्वार से गंगोत्री 277 किमी दूर है। ठहरने के लिए होटल से लेकर आश्रम तक की व्यवस्था है। यहां जाने का सही वक्त मई से अक्टूबर तक है।

ज्वालादेवी

हिमाचल प्रदेश की अलौकिक खूबसूरती में बसा ज्वालादेवी मंदिर बड़ी संख्या में सैलानियों को अपनी ओर खींचता है। कांगड़ा जिले की घाटी से दक्षिण में 34 किमी दूर ज्वालादेवी 51 शक्तिपीठों में से एक है। मंदिर ज्वालादेवी के उग्र रूप को समर्पित है। माना जाता है कि सती की जीभ, जो पवित्र ज्वाला का चित्रण करती है इसी जगह गिरी थी। मंदिर में विशालकाय फोल्डिंग चांदी के दरवाजे हैं। मंदिर का गुंबद सोने की तरह चमकने वाले पदार्थ की प्लेटों से बना है। पूजा के लिए मंदिर का आंतरिक हिस्सा चौकोर आकार में बना है। प्रांगण में एक चट्टान है जो कि देवी महाकाली के उग्र मुख का संकेत देती है।

यहां पहुंचने के लिए नजदीकी एयरपोर्ट कुल्लू और रेलवे स्टेशन कालका है। कुल्लू से ज्वालादेवी 23 किमी और कालका से 90 किमी दूर है। दिल्ली से ज्वाला देवी की दूरी 343 किमी है। ठहरने के लिए होटल, आश्रम और धर्मशालाएं उपलब्ध हैं। यहां साल में कभी भी जाया जा सकता है।

पाताल भुवनेश्वर

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट तहसील से 14 किमी दूर पाताल भुवनेश्वर का मंदिर धार्मिक आस्था के साथ ही कौतूहल का भी केंद्र है। गुफा में मौजूद मंदिर भगवान शिव का है। कहा जाता है ब्रह्मा स्वर्ग के दूसरे देवताओं के साथ यहां शिव अराधना के लिए आते हैं। मंदिर के अंदर संकरे पानी की धारा से होते हुए गुफा में जाना होता है। गुफा के अंदर जाने का मुख्य रास्ता भी कई छोटी गुफाओं का रास्ता दिखाता है। गुफा में घुसते ही शुरुआत में नरसिम्हा भगवान के दर्शन होते हैं। कुछ नीचे जाते ही चट्टान से बने शेषनाग नजर आते हैं।

शेषनाग की रीढ़ से होते हुए गुफा के मध्य तक जाया जा सकता है, जहां गणेश जी मिलते हैं। उनके ऊपर गुफा की छत में चट्टान से बना कमल का फूल है, जिससे पानी टपकते हुए मूर्ति पर पड़ता है। ये गुफाएं चूना पत्थर की चट्टानों से बनी हैं। इनसे टपकता पानी कई तरह के आकार बनाता है। कहा जाता है कि ये आकार देवी-देवताओं को प्रतिरूपित करते हैं। यहां जाने के लिए ट्रेन से काठगोदाम या टनकपुर जाना होगा। उसके आगे सड़क के रास्ते ही सफर करना होगा। दिल्ली से यह 550 किमी दूर है। रहने के लिए गंगोलीहाट में होटल और धर्मशालाएं हैं। साल में जब भी मन करे यहां जाया जा सकता है।

तुंगनाथ

उत्तराखंड के चमोली जिले का करीब हजार साल पुराना तुंगनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। समुदतल से 3600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित तुंगनाथ सबसे ऊंचाई में बसा मंदिर माना जाता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए चोपता गांव से 3-4 किमी की पैदल जाना होता है। यह रास्ता घने और ऊंचे जंगलों से गुजरता है। गर्मियों में यहां रास्ते भर खूबसूरत जंगली फूल फैले रहते हैं।

कहा जाता है कि केदारनाथ में भगवान शिव से मिलने के इच्छुक पांडव और इस भेंट से बचते भगवान शिव के बीच संघर्ष के दौरान भगवान शिव की भुजाएं तुंगनाथ में गिरी, इसीलिए यहां यह पवित्र मंदिर बना। मंदिर के प्रांगण में भगवान शिव का मुख्य मंदिर है। साथ ही, हिमालय पुत्री और शिव अर्धान्गिनी पार्वती का भी मंदिर यहां मौजूद है। यहां से चौखम्बा, त्रिशूल, नंदादेवी चोटी अलौकिक दिखती हैं। यहां पहुंचने के लिए नजदीकी रेलवे स्टेशन हरिद्वार और ऋषिकेश है।

दिल्ली से तुंगनाथ की दूरी 455 किमी है। ठहरने के लिए तुंगनाथ में ही व्यवस्था है या फिर आप चाहें तो नजदीकी चोपता में भी रुक सकते हैं। यहां जाने का सबसे सही वक्त मई से अक्टूबर के बीच का है। बरसात में यहां जाने से बचें।

सोजन्य सनवभारत टाइम्स

Thursday, May 8, 2008

खुल गये बदरी विशाल के कपाट

हिंदू आस्था के केंद्र भगवान बदरी विशाल के कपाट शुक्रवार से श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गये है. आज ठीक सुबह ८:१५ मिनट पर भगवान् बद्रिशाल के कपाट मन्दिर के रावल द्वारा वैदिक मंत्रोचार के साथ सभी श्रधालों के लिए लगभग ६ महीने के लिए द्रशनार्थ के लिए खोल दिए है. अखंड ज्योति के प्रथम दर्शन के लिए बदरी विशाल के प्रांगन में हजारों की संख्यां में श्रद्धालु पड़ाव डाले हुए थे. विभिन टीवी समाचार चैनलों द्वारा भगवान् बद्रीविशाल के प्रथम दर्शन का सीधा प्रसारण भी किया गया.

अपनी भक्ति को करायें पहाडों (उत्तराखंड) की सैर

अगर आप गर्मियों की छुट्टियों का आनंद लेना चाहते हैं तो पहाड़ चले आइए। इन पहाड़ों में आपको प्रकृति का रोमांच और भक्ति का अध्यात्म दोनों मिलेंगे। मैदान की चिलचिलाती गर्मी से दूर आपको और आपके परिवार को सुहावने मौसम के बीच पहाड़ों में बसे मंदिरों की सैर जरूर रास आएगी। देवभूमि कहे जाने वाले पहाड़ के कुछ जाने-अनजाने मंदिरों के दर्शन आपके जीवन में कई यादगार लम्हे जोड़ देंगे। मनोरम पहाड़ों में बसे कुछ गौरवशाली मंदिरों की जानकारी आपके सामने है।

केदारनाथ

भारत के उत्तर-पश्चिम में हिमालय की चोटी में बसे केदारनाथ मंदिर की अपनी अलग ही गरिमा है। केदारनाथ शिव के 12 ज्योतिर्लिन्गों में से एक है। मंदाकिनी नदी के शीर्ष के नजदीक 3584 मीटर की उंचाई पर बसा ये मंदिर एक पवित्र तीर्थस्थान है। हर साल भारी संख्या में तीर्थयात्री और संसार के पर्यटक भक्ति-भाव और रोमांच लिए यहां घूमने आते हैं।

महाभारत के अनुसार, कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद अपनी हिमालय यात्रा के दौरान पांडव भगवान शिव से मिलना चाहते थे। पर भगवान शिव इस भेंट के इच्छुक नहीं थे, क्योंकि पांडव गोत्र हत्या के दोषी थे। उन्हें आते देख शिव ने बैल का भेष धारण कर लिया। पर जब उन्हें लगा कि उनके बदले भेष ने कोई काम नहीं किया, तो बैल जमीन के नीचे कूदने की कोशिश करने लगा।

भीम ने फुर्ती से बैल के पीछे के पैर पकड़ लिए। इस जद्दोजहद में भगवान शिव के शरीर के विभिन्न हिस्से केदारनाथ में अलग-अलग जगह फैल गए। नाभि सहित धड़ मद्महेश्वर में, भुजाऐं तुंगनाथ में, चेहरा रुद्रनाथ में और जटाऐं कप्लेश्वर में। भारत पंच केदार ट्रैक इन पांचों तीर्थस्थानों का ही भ्रमण है।

केदारनाथ की यात्रा गौरीकुंड से 14 किमी की पैदल यात्रा है। जंगलचट्टी, रामबाड़ा और गरुड़ की खूबसूरती से होते हुए यहां पहुंचा जाता है। यात्रा में रामबाड़ा से 1 किमी पहले एक अनुपम भव्य झरना भी मिलता है।

मंदिर का ऐश्वर्य उसकी वास्तुकला में दिखता है। 8 वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा निर्मित वर्तमान मंदिर पांडवों द्वारा बनाए गए मंदिर के पास ही है। मंदिर के पूजागृह में कई देवी-देवताओं और भारतीय पौराणिक दृष्य दिखते हैं। मंदिर के दरवाजे के बाहर नंदी बैल की प्रतिमा भी है।

यात्रा का समय- भारी बर्फबारी की वजह से मंदिर नवम्बर से अप्रैल तक बंद रहता है। मंदिर के पट मई में खुलते हैं।

निकटतम हवाईअड्डा- जॉली गांट, देहरादून, रेलवे स्टेथन- ऋषिकेथ, कोटद्वार, देहरादून।

दूरी- देहरादून से केदारनाथ- 239 किमी, कोटद्वार से केदारनाथ- 250 किमी, ऋषिकेथ से केदारनाथ- 221 किमी।

यात्रा शुरू करने का स्थान गौरीकुंड ऋषिकेश, कोटद्वार, देहरादून से सड़क से जुड़ा हुआ है। बस सेवा और प्राइवेट टैक्सी सेवा यात्रा के लिए उपलब्ध है। गौरीकुंड से या़त्रा के लिए घोड़े, डांडी उपलब्ध है।

ठहराव- जंगलचट्टी में धर्मशालायें, प्राइवेट होटल; केदारनाथ में धर्मशालायें

बद्रीनाथ

नर नारायण की गोद में बसा बद्रीनाथ नीलकण्ड पर्वत का पार्श्व लिए पर्यटकों को बहुत सुहाता है। विशाल बद्री के नाम से जाने वाला बद्रीनाथ पंच बद्री में सबसे बड़ा है। भगवाल विष्णु का ये स्थल आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा बनाया गया। देश को एक सूत्र में बांधने के लिए शंकराचार्य ने चारों दिशाओं में चार तीर्थस्थल बनाए- उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम, पूर्व में जगन्नाथपुरी और पश्चिम में द्वारिकापुरी ।

माना जाता है, पाण्डव अपनी स्वर्ग की यात्रा में जाते समय यहां से और बॉर्डर के अन्तिम गांव माणा से गुजरे थे। यह भी माना जाता है कि माणा में मौजूद एक गुफा में व्यास ने महाभारत लिखी थी।

बद्रीनाथ में 130 डिग्री सैल्सियस खौलता तप्त कुंड और सूर्य कुंड है जहां पूजा से पूर्व स्नान आवश्यक समझा जाता है।

यात्रा का समय- मई से अक्टूबर,।

रेलवे स्टेथन- ऋषिकेथ, देहरादून।

यात्रा का रूट- हरिद्वार से देवप्रयाग, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, चमोली होते हुए जोशीमठ।

दिल्ली से बद्रीनाथ नेशनल हाईवे की कुल दूरी- 538 किमी।

ठहराव- बद्रीनाथ में सरकारी और कई प्राइवेट होटल, आश्रम और धर्मशालायें मौजूद।

यमुनोत्री

उत्तरकाथी जिले में समुद्रतल से 3235 मी. ऊंचाई पर स्थित है, देवी यमुना का मंदिर- यमुनोत्री। यमुनोत्री मंदिर का निर्माण 19 वीं शताब्दी में जयपुर की महारानी गुलारिया ने कराया था। चार धामों में से एक धाम यमुनोत्री से यमुना का उद्गम मात्र एक किमी की दूरी पर है। यहां बंदरपूंछ चोटी (6315 मी ) के पश्चिमी अंत में फैले यमुनोत्री ग्लेशियर को देखना अत्यंत रोमांचक है।

हिन्दू मान्यता के अनुसार, सूर्य की बेटे यामा ने कहा था कि जो व्यक्ति उसकी बहिन यमुना के नदी स्वरूप में स्नान करेगा, उसे वह कभी परेथान नहीं करेगा।

हनुमानचट्टी से 13 किमी पैदल चलकर मंदिर तक पहुंचा जाता है। मंदिर के दर्शन से पहले चट्टान से बनी दिव्य शिला की पूजा होती है। मुख्य पूजा से पहले जमुनाबाई कुंड में पवित्र स्नान होता है।

यमुनोत्री में बर्फीले ग्लेशियर के पास ही खौलते कुंड भी हैं, जिनमें प्रमुख सूर्य कुण्ड है। इस कुण्ड में पोटली में चावल या आलू बांधकर पानी में डालकर पकाया जाता है। ये ही मंदिर का प्रसाद माना जाता है।

यात्रा का रूट- हरिद्वार से चम्बा, टिहरी, उत्तरकाशी होते हुए चार धाम कैम्प गंगोत्री।

कुल दूरी- हरिद्वार से 295 किमी।

ठहराव- जंगलचट्टी हनुमानचट्टी में निगम रेस्ट हाउस, धर्मशालाऐं।

चार धाम यात्रा यानी बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री यात्रा के लिए कई प्राइवेट टूर पैकेज मौजूद हैं। इन यात्राओं का खर्चा हर टूर एजेन्सी का अलग-अलग है, जैसे 12 दिन का एक व्यक्ति का टूर चार्ज लगभग 25000 रुपये।

सोजन्य से नवभारत टाईम्स

Wednesday, May 7, 2008

अठ्ठारह मई को खुलेंगे चतुर्थ केदार के कपाट

चतुर्थ केदार श्री रूद्रनाथ धाम में कपाट खुलने की धार्मिक तैयारियां आरंभ हो चुकी हैं लेकिन अभी तक यात्रा मार्ग पर न तो पानी के पुख्ता इंतजाम हैं और न ही पैदल मार्ग का निर्माण पूर्ण हो पाया है। स्थानीय लोगों ने जिलाधिकारी को ज्ञापन देकर तत्काल सुविधाएं मुहैया कराने की मांग की है। 18 मई को श्री रूद्रनाथ के कपाट खुलने हैं। 14 मई को भगवान की डोली गोपीनाथ मंदिर से बाहर निकाली जाएगी। पुजारी, मंदिर समिति सहित स्थानीय लोग धार्मिक तैयारियों में जुटे हुए हैं। लेकिन रूद्रनाथ में पानी व पैदल रास्ते की समस्या बनी हुई है। पनार तक पैदल मार्ग पूर्ण हो चुका है लेकिन वहां से आगे के रास्ते चट्टानी हैं। हर बार लोग पौराणिक नारद कुंड से एक-एक बूंद पानी मंदिर तक पहुंचाकर जलाभिषेक करते हैं।

सिद्धनाथ मंदिर में भी श्रद्धालु उमड़


टनकपुर (चम्पावत)। इन दिनों उत्तर भारत के सुप्रसिद्ध मां पूर्णागिरि धाम में भारी संख्या में श्रद्धालु उमड़ रहे है। गर्मी के चलते दिन की अपेक्षा रात्रि के समय अधिक संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे है। इधर नेपाल के सिद्धनाथ मंदिर में भी काफी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे है।

पिछले चार दिनों से मां पूर्णागिरि धाम में श्रद्धालुओं की संख्या में इजाफा हुआ है। शारदा नदी में भी इन दिनों स्नान के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु उमड़ रहे है। शारदा घाट में किसी अप्रिय घटना को देखते हुए पीएसी की तैराक टीम भी तैनात की गई है। इधर नेपाल के महेन्द्र नगर व ब्रह्मदेव मंडी स्थित सिद्धनाथ मंदिर में भी भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे है। जिसके कारण नेपाल के दोनों बाजारों में चहल- पहल भी बढ़ गई है। मेला क्षेत्र में जगह-जगह भंडारे का भी आयोजन किया जा रहा है।



अखिलतारिणी में देवी भक्तों का जमावड़ा


लोहाघाट (चम्पावत)। मां अखिलतारिणी धाम में चल रहे 108 दिवसीय महायज्ञ के पारायण की तैयारियां शुरू हो चुकी है। यज्ञ स्थल पर यज्ञ वेदियों की स्थापना के साथ धार्मिक महत्व के पौधों को रोपा जा रहा है। 8 मई गुरुवार को अक्षय तृतीय के दिन यहां यज्ञ का पारायण हो जायेगा। इन दिनों महायज्ञ आयोजन समिति की ओर से लक्ष्य रुद्री पाठ का आयोजन कर आहुतियां दी जा रही है। इसके अलावा द्वादशाक्षरी मंत्र, गायत्री मंत्र व मृत्युंजय महामंत्रों की आहुतियां 71 यज्ञ आचार्यो द्वारा दी जा रही है।

वेद मंत्रोच्चार के साथ खुले श्रद्धा व आस्था के कपाट

करोड़ों हिंदुओं की आस्था के केंद्र केदारनाथ धाम के साथ ही बुधवार को गंगोत्री व यमुनोत्री धाम के कपाट श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए गए। कपाट खुलने के शुभ अवसर पर जय बाबा केदार के उद्घोषों से संपूर्ण केदारपुरी गूंज उठी तो दूसरी तरफ, गंगोत्री व यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने से पूर्व हजारों श्रद्धालुओं ने गंगा व यमुना में डुबकियां लगाकर पुण्य अर्जित किया। बद्री-केदार मंदिर समिति के उप मुख्य कार्याधिकारी जेपी नंबूरी ने बताया कि पहले दिन केदारपुरी में भोले के दर्शन के लिए पांच हजार चार सौ चौबीस यात्री पहुंचे।

रुद्रप्रयाग जिले में स्थित शिव के ग्यारहवें ज्योर्तिलिंग भगवान केदारनाथ के कपाट वैदिक पूजा-अर्चना एवं मंत्रोच्चार के साथ सुबह आठ बजे भक्तों के दर्शनार्थ खोल दिए गए। कपाट खुलने के समय केदारपुरी का मौसम सर्द बना रहा और हल्की बूंदा-बांदी भी हुई। इसके बावजूद यहां सुबह से ही हजारों भक्तों की भीड़ भोले के प्रथम दर्शनों के लिए कतार में लगी रही। निर्धारित समय आठ बजते ही केदारनाथ के रावल 1008 भीमा शंकरलिंग मंदिर प्रांगण में पहुंचे और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ ग्रीष्म काल के लिए भगवान केदारनाथ के कपाट भक्तों के लिए खोल दिए गए। कपाट खुलने के अवसर पर सूबे के पर्यटन मंत्री प्रकाश पंत, सचिव राकेश कुमार, पतंजलि योगपीठ के आचार्य बालकृष्ण, मुनि चिदानंद महाराज, केदारनाथ क्षेत्र की विधायक आशा नौटियाल, मंदिर समिति की उपाध्यक्ष दर्शनी देवी, उप मुख्य कार्याधिकारी जेपी नंबूरी, जिलाधिकारी सचिन कुर्वे, एसपी नीरु गर्ग, मंदिर के पुजारी राजशेखर लिंग सहित हजारों की संख्या में भक्त मौजूद थे। उत्तारकाशी जिले के अंतर्गत विश्व प्रसिद्ध गंगोत्री व यमुनोत्री धाम के कपाट आज वेद मंत्रोच्चार के साथ पूर्वाह्न साढ़े ग्यारह बजे भक्तों के दर्शनार्थ खोले गए। मंगलवार को गंगोत्री की डोली मुखवा गांव से गंगोत्री की ओर चली। भैरवघाटी स्थित भैरव मंदिर में रात्रि विश्राम के बाद सुबह डोली का गंगोत्री की ओर प्रस्थान हुआ। परंपरागत वाद्य यंत्र ढोल दमाऊ व सैकड़ों भक्तों के साथ गंगा की डोली सुबह गंगोत्री पहुंची। यहां विधिवत पूजा-अर्चना के बाद गर्भगृह के कपाट खोले गए। बुधवार की सुबह यमुनोत्री की डोली शीतकालीन वास खरसाली से रीति-रिवाज व पौराणिक परंपरा के साथ रवाना हुई। सैकड़ों श्रद्धालुओं व परंपरागत वाद्य यंत्रों के साथ मां यमुना की डोली यमुनोत्री मंदिर पहुंची। वैदिक मंत्रों व पूजा अर्चना के बाद यमुनोत्री के कपाट खोले गए। गंगोत्री व यमुनोत्री के कपाट खुलने पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु मंदिरों में पहुंचे। स्नान के बाद श्रद्धालुओं ने कपाटोत्सव में भाग लेकर पुण्य अर्जित किया।

सोजन्य से जागरण न्यूज़

समय की करवट और आधुनिकता ने बदल दिए हमारे नाम

दोस्तो जैसे आप लोग जानते है कि उत्तराखंड की अपनी एक अलग पहिचान है, अपनी एक अलग संस्कृति सभ्यता,भाषा-बोली है और इसी के आधार पर उत्तराखंडी लोगों की पहिचान की जा सकती है. कहते है कि किसी ब्यक्ति विशेष के नाम से ही उसकी पहिचान की जा सकती है, जैसे कि वो किस मुल्क का रहने वाला है, कोन सी भाषा को बोलने वाला है, उसका धर्म क्या है, समाज क्या है, ये सब उसके नाम से पता लगाया जा सकता है. पहले उत्तराखंडियों लोगों के नाम से ही उनकी पहिचान हो जाती थी, ऐसे नाम जो दुनिया के किसी भी कोने में नही पाये जाते थे, वो नाम होते थे उत्तराखंडियों के, जो कि अपने आप में अदुतीय थे. लेकिन समय के साथ हमसे ये नाम दूर होते चले गए और आज ये आलम है कि अब ये नाम सुनने को भी नही रह गए. मैं इस लेख के माध्यम से अपने उन पूर्वजों के नामों को समेटने की कोशिश कर रहा हूँ , ताकि हमारे आने वाली पीड़ी को भी ये पता चले कि हमारे पूर्वजों के क्या नाम होते थे और आज हमारे क्या नाम है, समय ने कितनी करवट बदल दी, उन नामों की क्या पहिचान थी, क्या मह्त्वा था और आज के हमारे नामों की क्या पहिचान है?.

आप लोगों में बहुत को पढने के बाद कुछ अटपट्टा जरूर लगेगा, लेकिन ये वो नाम है जो शायद अब हमको कभी सुनने को नही मिलेंगे. ये मेरी तरफ़ से अपने पूर्वजों को एक श्रधांजलि है . इसमे पुरूष और महिला दोनों के नाम सम्मलित हैं, मैंने पुरूष महिला का उल्लेख नही किया है.

चतरु
छौन्दाडू
बणी
काल्या
भुरया
सुरतू
मशान्तु
अत्ति
सौणु
मंग्शीरू
चैतू
दुन्ना
झोंती
फप्फा
बैसाखू
अषाडू
सुरि
धनुली
रज्मा
गुड्डी
फागुणी
छौन्दाड़ी
एकादशी
फुल्मुंडया
तीलू
जीत्तू
मोरू
सब्लू
अतरु
बंडवारी
मशंती
गैणा
सुन्दुरु
भंग्ल्या
बौल्या
मंगतु
लाटा
चेपड़
माघी
देवी
छिल्की देवी
घुंगरा देवी
सोणी देवी
नीलकंठी देवी
लूली देवी
बबनी देवी
होशियारू
तोंगी
चैतू
प्राणी
बालक
सिंह
रेवती देवी
दरबान
चिंता
मणि
मूसा
अथरु
गुमान
छोट्या
गोल्या
फंग्नु
फरशा
पंछी
फतूरी
डोखल्या
कानबाई
भ्योंराज
स्यूराज
राडी
बिछना

नाम तो बहुत है लेकिन अभी याद इतने ही आये है