क्षेत्रवाद और भाषा के नाम पर भले ही दुनिया भर में वैचारिक जंग का माहौल नजर आता हो, लेकिन देवभूमि उत्तराखंड की पवित्र धरती पर कदम रखते ही यह तमाम संकीर्णताएं बौनी साबित होने लगती हैं। इसमें न भाषा की दीवार आड़े आ रही है और न ही क्षेत्रवाद का अहं। देवभूमि में इन दिनों सम्पूर्ण भारत के दर्शन किए जा सकते हैं। यूं तो चारों धामों में देश के सभी भागों से तीर्थयात्री आ रहे हैं, लेकिन बदरी-केदार में दक्षिण भारत, यमुनोत्री में गुजरात और गंगोत्री में उत्तर भारत की खुशबू महसूस की जा सकती है। ऐसे में तीर्थयात्रा के बहाने ही सही, उत्तराखंड लंबे समय से राष्ट्रीय एकता की मिसाल बना हुआ है।
उत्तराखंड में स्थित पांच पवित्र धामों की तीर्थयात्रा विविध संस्कृति व परंपरा वाले लोगों को एकता के सूत्र में बांधने का सशक्त जरिया बन चुकी है। राज्य के गढ़वाल मंडल में समाए भगवान बदरीनाथ समस्त प्रांतों के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख प्रतीक हैं। यहां प्रतिदिन देशभर से करीब बीस हजार श्रद्धालु दर्शन को आ रहे हैं, जिनमें दक्षिण भारत के श्रद्धालुओं की संख्या करीब साठ फीसदी है। वहीं केदारनाथ भी दक्षिण के यात्रियों की प्रमुख पंसद बना हुआ है। यमुनोत्री में गुजराती श्रद्धालु हैं तो गंगोत्री हरियाणा-दिल्ली के श्रद्धालुओं के रंग में रंगा हुआ है। सिखों की आस्था का प्रतीक हेमकुंड साहिब पंजाबी श्रद्धालुओं का मुख्य केंद्र है, लेकिन इन पांचों धामों को जाने का रास्ता एक ही है। इन तीर्थस्थलों का प्रवेश द्वार ऋषिकेश, श्रद्धालुओं को धार्मिक एवं राष्ट्रीय एकता के सूत्र में पिरोकर यात्रा के लिए रवाना करता है। पांचों तीर्थस्थलों में श्रद्धालुओं के आंकड़ों के बारे में जानकारी देते हुए पुलिस महानिरीक्षक अशोक कुमार ने बताया कि उत्तराखंड पहुंचने वाले श्रद्धालु भले ही एक-दूसरे की भाषा न जानते हों, लेकिन यहां के सौहार्द का माहौल कहीं भी भाषाई बंधन को आड़े नहीं आने देता। यह उत्तराखंड सहित देश के लिए भी गौरव की बात है।
सोजन्य से जागरण न्यूज़

2 comments:
आभार इस आलेख को यहाँ प्रस्तुत करने के लिए.
Thanks Subhash ji for share this nice artical with us.
Vijay Butola
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