Monday, May 19, 2008

मद्महेश्वर: यहां होती है शिव की नाभि पूजा

हिमालय पर्वत की श्रंखलाओं की गोद में अनेक तीर्थ स्थल है जो कि श्रद्धालुओं के लिए असीम आस्था के केंद्र है इन्हीं पंचकेदारों में से एक द्वितीय केदार के नाम से प्रसिद्ध भगवान मद्महेश्वर जहां शिव के नाभि की पूजा होती है। मान्यता है कि स्वर्ग लोक से कामधेनु गाय रोज यहां दूध चढ़ाती थी। आज भी यहां गाय के खुर व स्तन विद्यमान है। गत रविवार को द्वितीय केदार के कपाट खुलने के बाद यहां भगवान के दर्शनों के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी है।

हिमालय के चौ-खम्बा पर्वत की गोद में समुद्र तल से 9700 फिट की ऊंचाई पर स्थित भगवान मद्महेश्वर का मंदिर श्रद्धालुओं के लिए असीम आस्था का केन्द्र बिन्दु है। मान्यता है कि भोले को यह स्थान काफी प्रिय था, विवाह कि बाद भगवान शिव ने अधिक समय यहीं पर बिताया था। इसे गुप्त तीर्थ के नाम भी जाना जाता है। किवदंती है कि जो भी नि:संतान दंपति पुत्ररत्न की प्राप्ति के लिए यहां पर भगवान की मन से पूजा करता है उसे इच्छित फल की प्राप्ति होती है। पांडवों ने स्वर्गारोहण के समय पंचकेदारों की स्थापना की। कहा जाता है कि स्वर्ग लोक से कामधेनु गाय नित्य यहां दूध चढ़ाती थी। वर्तमान में यहां गाय के खुर व स्तन भी विद्यमान है। यहां श्वेत भैरव निरन्तर भोले की रक्षा करते है। पुराणों के अनुसार मद्महेश्वर तीर्थ में गौड़ देश का स्वाधी ब्राह्मण अपने समस्त पित्रों के कल्याणार्थ तीन रात्रि जागरण करने के पश्चात पूजा अर्चना कर लौट रहा था कि उन्हें मार्ग में एक विशाल विकराल राक्षस दिखाई दिया जिसकी जंघाओं से सैकड़ों कृमि निकल रहे थे यह देखकर उक्त ब्राह्मण भयभीत हो गया। घबराए हुए व कुछ भी न बोल सका, वह राक्षस भी ब्राह्मण की एकटक देखने लगा वह बोला कि में समझ रहा हूं कि मेरे कुछ पाप तुम्हारे दर्शनों से दूर हो गए है देखते-देखते ही वह स्वस्थ हो गया। ठंड अधिक होने के कारण नवम्बर में भगवान मद्महेश्वर के कपाट छ: माह के लिए बंद कर दिए जाते है। भगवान की डोली ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ पहुंचती है तथा यहां पर विश्व विख्यात धार्मिक मद्महेश्वर मेले का आयोजन होता है। गत रविवार को कपाट खुलने के बाद भगवान मद्दमहेश्वर के दर्शनों के लिए देश-विदेश के श्रद्धालुओं का यहां पहुंचना शुरू हो गया है। भगवान मद्दमहेश्वर की पैदल यात्रा कठिन होने के बावजूद भी यहां पहुंचने पर श्रद्धालुओं को असीम शांति की अनुभूति होती है।

सोजन्य से जागरण न्यूज़

3 comments:

दीपान्शु गोयल said...

मेरी भी इच्छा है कि पांचो केदार के दर्शन करुं। लेकिन समय ही नहीं मिल पाता है। आप का लेख पढ कर लगता है कि जल्दी ही जाना होगा। बहुत सुन्दर वर्णन किया है आपने।

jai said...

Nice Post. You may like to post it at diggsamachar and votedlinks
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Udan Tashtari said...

उम्दा जानकारी. आभार.