हिमालय की गोद में बसे चारधाम यात्रा के पहले पड़ाव यमुनोत्री धाम का हिंदू पुराणों में विशेष स्थान है। नैसर्गिक सौंदर्य से परिपूर्ण यह क्षेत्र देश विदेश के सैलानियों को बड़ी संख्या में अपनी ओर आकर्षित करता है। यमुनोत्री मंदिर के कपाट वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को श्रृद्धालुओं के लिए खोल दिए जाते है् और यह कपाट दीपावली के बाद यम द्वितीया को बंद हो जाते हैं। यहां का सूर्य कुंड पर्यटकों के आकर्षक का केंद्र है।
पौराणिक कथा के अनुसार यमुना जी यमराज की भगनी, सूर्य भगवान की पुत्री और भगवान कृष्ण की आठ पटरानियों में कालिंदी के नाम से प्रसिद्ध हैं। यमुना नदी का उद्गम स्थान यमुनोत्री कांठा के अंग में है। यमुना नदी के उद्गम स्थल में सप्तर्षि कुंड है, जहां ग्लेशियरों में पानी जमा रहता है। कहा जाता है कि बारह ऋृषि जो महादेव के साथ लंका से आए थे, यहीं के हिमालय में शिवजी की तपस्या करते थे और महावीर हनुमान भी इसी हिमालय की बंदर पुच्छ नामक चोटी पर तप करते थे, इसलिए इस नदी का नाम हनुमान गंगा प्रसिद्ध हुआ। यह नदी यमुना से खरसाली गांव के पास मिलती है। यमुनोत्री मंदिर के पंडे आज भी इसी गांव में निवास करते हैं। हिमालय की बुलंदियों के बीच घिरे संतोत्पथ बंदर पुच्छ केदार खंड रोहिणी कांठा ने इस पौराणिक स्थल को आर्कषक बना दिया है। यमुनोत्री का मुख्य आकर्षण यहां के गर्म पानी के कुंड हैं। उष्ण जल के स्त्रोत यमुनोत्री से 500 गज नीचे हैं और यहां पानी का तापमान 94.7 डिग्री रहता है। इस गर्म जल के आस पास की भूमि बराबर गर्र्मं रहती है, इसी कारण यहां की भूमि पर बर्फ नहीं टिकती। यमुनोत्री आने वाले तीर्थयात्री सर्वप्रथम गरम पानी के कुंड में स्नान कर यात्रा की पूरी थकान दूर करते हैं। पुरूष व महिलाओं के लिए अलग-अलग कुंड बनाए गए हैं। स्नान करने के पश्चात श्रद्धालु मंदिर में दर्शन कर तृप्त कुंड से थोड़ी ऊंचाई पर स्थित दिव्य शिला के दर्शन करते हैं। यहां से ठीक सामने उबलते पानी का सूर्य कुंड है, जिसमें पोटली में बंधे चावल डालकर यमुनोत्री के असली प्रसाद के रूप में उबले चावलों को ग्रहण किया जाता है।
सोजन्य से जागरण न्यूज़

2 comments:
आभार इस जानकारी के लिए. जारी रहें.
बहुत अच्छी जानकारी देने के लिये आपका आभार !
यमुना मैया की जय !
-लावण्या
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