गंगोत्री
गंगा के उद्गम के पास देवी गंगा का स्थान, गंगोत्री चार धाम यात्राओं में से एक तीर्थ है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में मौजूद यह मंदिर 18 वीं शताब्दी का है। हिन्दू पौराणिक कथा के अनुसार स्वर्ग की बेटी देवी गंगा ने राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर उनके पुरखों के पाप धोने के लिए नदी का रूप धारण किया था। गंगा नदी के इस तीव्र बहाव को कम करने के लिए भगवान शिव ने इस बहाव को अपनी जटाओं में ले लिया। गंगोत्री में बहने वाली भगीरथी नदी का बहाव जब कम होता है तब नदी में एक प्राकृतिक चट्टान दिखाई देती है।
कहा जाता है इसी चट्टान में बैठकर भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में समाया था। गंगोत्री से गंगा का उद्गम स्थल गौमुख, 17 किमी पैदल गंगोत्री ग्लेशियर के साथ चलकर दिखाई पड़ता है। यहां पहुंचने के लिए नजदीकी एयरपोर्ट जॉली ग्रांट और देहरादून है। अगर ट्रेन से जाना हो तो हरिद्वार या ऋषिकेश जाना होगा। हरिद्वार से गंगोत्री 277 किमी दूर है। ठहरने के लिए होटल से लेकर आश्रम तक की व्यवस्था है। यहां जाने का सही वक्त मई से अक्टूबर तक है।
ज्वालादेवी
हिमाचल प्रदेश की अलौकिक खूबसूरती में बसा ज्वालादेवी मंदिर बड़ी संख्या में सैलानियों को अपनी ओर खींचता है। कांगड़ा जिले की घाटी से दक्षिण में 34 किमी दूर ज्वालादेवी 51 शक्तिपीठों में से एक है। मंदिर ज्वालादेवी के उग्र रूप को समर्पित है। माना जाता है कि सती की जीभ, जो पवित्र ज्वाला का चित्रण करती है इसी जगह गिरी थी। मंदिर में विशालकाय फोल्डिंग चांदी के दरवाजे हैं। मंदिर का गुंबद सोने की तरह चमकने वाले पदार्थ की प्लेटों से बना है। पूजा के लिए मंदिर का आंतरिक हिस्सा चौकोर आकार में बना है। प्रांगण में एक चट्टान है जो कि देवी महाकाली के उग्र मुख का संकेत देती है।
यहां पहुंचने के लिए नजदीकी एयरपोर्ट कुल्लू और रेलवे स्टेशन कालका है। कुल्लू से ज्वालादेवी 23 किमी और कालका से 90 किमी दूर है। दिल्ली से ज्वाला देवी की दूरी 343 किमी है। ठहरने के लिए होटल, आश्रम और धर्मशालाएं उपलब्ध हैं। यहां साल में कभी भी जाया जा सकता है।
पाताल भुवनेश्वर
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट तहसील से 14 किमी दूर पाताल भुवनेश्वर का मंदिर धार्मिक आस्था के साथ ही कौतूहल का भी केंद्र है। गुफा में मौजूद मंदिर भगवान शिव का है। कहा जाता है ब्रह्मा स्वर्ग के दूसरे देवताओं के साथ यहां शिव अराधना के लिए आते हैं। मंदिर के अंदर संकरे पानी की धारा से होते हुए गुफा में जाना होता है। गुफा के अंदर जाने का मुख्य रास्ता भी कई छोटी गुफाओं का रास्ता दिखाता है। गुफा में घुसते ही शुरुआत में नरसिम्हा भगवान के दर्शन होते हैं। कुछ नीचे जाते ही चट्टान से बने शेषनाग नजर आते हैं।
शेषनाग की रीढ़ से होते हुए गुफा के मध्य तक जाया जा सकता है, जहां गणेश जी मिलते हैं। उनके ऊपर गुफा की छत में चट्टान से बना कमल का फूल है, जिससे पानी टपकते हुए मूर्ति पर पड़ता है। ये गुफाएं चूना पत्थर की चट्टानों से बनी हैं। इनसे टपकता पानी कई तरह के आकार बनाता है। कहा जाता है कि ये आकार देवी-देवताओं को प्रतिरूपित करते हैं। यहां जाने के लिए ट्रेन से काठगोदाम या टनकपुर जाना होगा। उसके आगे सड़क के रास्ते ही सफर करना होगा। दिल्ली से यह 550 किमी दूर है। रहने के लिए गंगोलीहाट में होटल और धर्मशालाएं हैं। साल में जब भी मन करे यहां जाया जा सकता है।
तुंगनाथ
उत्तराखंड के चमोली जिले का करीब हजार साल पुराना तुंगनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। समुदतल से 3600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित तुंगनाथ सबसे ऊंचाई में बसा मंदिर माना जाता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए चोपता गांव से 3-4 किमी की पैदल जाना होता है। यह रास्ता घने और ऊंचे जंगलों से गुजरता है। गर्मियों में यहां रास्ते भर खूबसूरत जंगली फूल फैले रहते हैं।
कहा जाता है कि केदारनाथ में भगवान शिव से मिलने के इच्छुक पांडव और इस भेंट से बचते भगवान शिव के बीच संघर्ष के दौरान भगवान शिव की भुजाएं तुंगनाथ में गिरी, इसीलिए यहां यह पवित्र मंदिर बना। मंदिर के प्रांगण में भगवान शिव का मुख्य मंदिर है। साथ ही, हिमालय पुत्री और शिव अर्धान्गिनी पार्वती का भी मंदिर यहां मौजूद है। यहां से चौखम्बा, त्रिशूल, नंदादेवी चोटी अलौकिक दिखती हैं। यहां पहुंचने के लिए नजदीकी रेलवे स्टेशन हरिद्वार और ऋषिकेश है।
दिल्ली से तुंगनाथ की दूरी 455 किमी है। ठहरने के लिए तुंगनाथ में ही व्यवस्था है या फिर आप चाहें तो नजदीकी चोपता में भी रुक सकते हैं। यहां जाने का सबसे सही वक्त मई से अक्टूबर के बीच का है। बरसात में यहां जाने से बचें।
सोजन्य से नवभारत टाइम्स
Monday, May 12, 2008
हिमालय की गोद में मन्दिर
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2 comments:
बहुत ही सुंदर काम आप कर रहे हैं और लेखन भी ऐसा कि लगता है पढ़ नहीं देख रहे हैं। जारी रखे। बहुत ही उम्दा कार्य।
बहुत अच्छा उत्तरांचल की खूबसूरती को आप सबके सामने ला रहे हैं।
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