Thursday, May 8, 2008

अपनी भक्ति को करायें पहाडों (उत्तराखंड) की सैर

अगर आप गर्मियों की छुट्टियों का आनंद लेना चाहते हैं तो पहाड़ चले आइए। इन पहाड़ों में आपको प्रकृति का रोमांच और भक्ति का अध्यात्म दोनों मिलेंगे। मैदान की चिलचिलाती गर्मी से दूर आपको और आपके परिवार को सुहावने मौसम के बीच पहाड़ों में बसे मंदिरों की सैर जरूर रास आएगी। देवभूमि कहे जाने वाले पहाड़ के कुछ जाने-अनजाने मंदिरों के दर्शन आपके जीवन में कई यादगार लम्हे जोड़ देंगे। मनोरम पहाड़ों में बसे कुछ गौरवशाली मंदिरों की जानकारी आपके सामने है।

केदारनाथ

भारत के उत्तर-पश्चिम में हिमालय की चोटी में बसे केदारनाथ मंदिर की अपनी अलग ही गरिमा है। केदारनाथ शिव के 12 ज्योतिर्लिन्गों में से एक है। मंदाकिनी नदी के शीर्ष के नजदीक 3584 मीटर की उंचाई पर बसा ये मंदिर एक पवित्र तीर्थस्थान है। हर साल भारी संख्या में तीर्थयात्री और संसार के पर्यटक भक्ति-भाव और रोमांच लिए यहां घूमने आते हैं।

महाभारत के अनुसार, कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद अपनी हिमालय यात्रा के दौरान पांडव भगवान शिव से मिलना चाहते थे। पर भगवान शिव इस भेंट के इच्छुक नहीं थे, क्योंकि पांडव गोत्र हत्या के दोषी थे। उन्हें आते देख शिव ने बैल का भेष धारण कर लिया। पर जब उन्हें लगा कि उनके बदले भेष ने कोई काम नहीं किया, तो बैल जमीन के नीचे कूदने की कोशिश करने लगा।

भीम ने फुर्ती से बैल के पीछे के पैर पकड़ लिए। इस जद्दोजहद में भगवान शिव के शरीर के विभिन्न हिस्से केदारनाथ में अलग-अलग जगह फैल गए। नाभि सहित धड़ मद्महेश्वर में, भुजाऐं तुंगनाथ में, चेहरा रुद्रनाथ में और जटाऐं कप्लेश्वर में। भारत पंच केदार ट्रैक इन पांचों तीर्थस्थानों का ही भ्रमण है।

केदारनाथ की यात्रा गौरीकुंड से 14 किमी की पैदल यात्रा है। जंगलचट्टी, रामबाड़ा और गरुड़ की खूबसूरती से होते हुए यहां पहुंचा जाता है। यात्रा में रामबाड़ा से 1 किमी पहले एक अनुपम भव्य झरना भी मिलता है।

मंदिर का ऐश्वर्य उसकी वास्तुकला में दिखता है। 8 वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा निर्मित वर्तमान मंदिर पांडवों द्वारा बनाए गए मंदिर के पास ही है। मंदिर के पूजागृह में कई देवी-देवताओं और भारतीय पौराणिक दृष्य दिखते हैं। मंदिर के दरवाजे के बाहर नंदी बैल की प्रतिमा भी है।

यात्रा का समय- भारी बर्फबारी की वजह से मंदिर नवम्बर से अप्रैल तक बंद रहता है। मंदिर के पट मई में खुलते हैं।

निकटतम हवाईअड्डा- जॉली गांट, देहरादून, रेलवे स्टेथन- ऋषिकेथ, कोटद्वार, देहरादून।

दूरी- देहरादून से केदारनाथ- 239 किमी, कोटद्वार से केदारनाथ- 250 किमी, ऋषिकेथ से केदारनाथ- 221 किमी।

यात्रा शुरू करने का स्थान गौरीकुंड ऋषिकेश, कोटद्वार, देहरादून से सड़क से जुड़ा हुआ है। बस सेवा और प्राइवेट टैक्सी सेवा यात्रा के लिए उपलब्ध है। गौरीकुंड से या़त्रा के लिए घोड़े, डांडी उपलब्ध है।

ठहराव- जंगलचट्टी में धर्मशालायें, प्राइवेट होटल; केदारनाथ में धर्मशालायें

बद्रीनाथ

नर नारायण की गोद में बसा बद्रीनाथ नीलकण्ड पर्वत का पार्श्व लिए पर्यटकों को बहुत सुहाता है। विशाल बद्री के नाम से जाने वाला बद्रीनाथ पंच बद्री में सबसे बड़ा है। भगवाल विष्णु का ये स्थल आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा बनाया गया। देश को एक सूत्र में बांधने के लिए शंकराचार्य ने चारों दिशाओं में चार तीर्थस्थल बनाए- उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम, पूर्व में जगन्नाथपुरी और पश्चिम में द्वारिकापुरी ।

माना जाता है, पाण्डव अपनी स्वर्ग की यात्रा में जाते समय यहां से और बॉर्डर के अन्तिम गांव माणा से गुजरे थे। यह भी माना जाता है कि माणा में मौजूद एक गुफा में व्यास ने महाभारत लिखी थी।

बद्रीनाथ में 130 डिग्री सैल्सियस खौलता तप्त कुंड और सूर्य कुंड है जहां पूजा से पूर्व स्नान आवश्यक समझा जाता है।

यात्रा का समय- मई से अक्टूबर,।

रेलवे स्टेथन- ऋषिकेथ, देहरादून।

यात्रा का रूट- हरिद्वार से देवप्रयाग, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, चमोली होते हुए जोशीमठ।

दिल्ली से बद्रीनाथ नेशनल हाईवे की कुल दूरी- 538 किमी।

ठहराव- बद्रीनाथ में सरकारी और कई प्राइवेट होटल, आश्रम और धर्मशालायें मौजूद।

यमुनोत्री

उत्तरकाथी जिले में समुद्रतल से 3235 मी. ऊंचाई पर स्थित है, देवी यमुना का मंदिर- यमुनोत्री। यमुनोत्री मंदिर का निर्माण 19 वीं शताब्दी में जयपुर की महारानी गुलारिया ने कराया था। चार धामों में से एक धाम यमुनोत्री से यमुना का उद्गम मात्र एक किमी की दूरी पर है। यहां बंदरपूंछ चोटी (6315 मी ) के पश्चिमी अंत में फैले यमुनोत्री ग्लेशियर को देखना अत्यंत रोमांचक है।

हिन्दू मान्यता के अनुसार, सूर्य की बेटे यामा ने कहा था कि जो व्यक्ति उसकी बहिन यमुना के नदी स्वरूप में स्नान करेगा, उसे वह कभी परेथान नहीं करेगा।

हनुमानचट्टी से 13 किमी पैदल चलकर मंदिर तक पहुंचा जाता है। मंदिर के दर्शन से पहले चट्टान से बनी दिव्य शिला की पूजा होती है। मुख्य पूजा से पहले जमुनाबाई कुंड में पवित्र स्नान होता है।

यमुनोत्री में बर्फीले ग्लेशियर के पास ही खौलते कुंड भी हैं, जिनमें प्रमुख सूर्य कुण्ड है। इस कुण्ड में पोटली में चावल या आलू बांधकर पानी में डालकर पकाया जाता है। ये ही मंदिर का प्रसाद माना जाता है।

यात्रा का रूट- हरिद्वार से चम्बा, टिहरी, उत्तरकाशी होते हुए चार धाम कैम्प गंगोत्री।

कुल दूरी- हरिद्वार से 295 किमी।

ठहराव- जंगलचट्टी हनुमानचट्टी में निगम रेस्ट हाउस, धर्मशालाऐं।

चार धाम यात्रा यानी बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री यात्रा के लिए कई प्राइवेट टूर पैकेज मौजूद हैं। इन यात्राओं का खर्चा हर टूर एजेन्सी का अलग-अलग है, जैसे 12 दिन का एक व्यक्ति का टूर चार्ज लगभग 25000 रुपये।

सोजन्य से नवभारत टाईम्स

1 comments:

Udan Tashtari said...

अच्छी जानकारी, आभार,