पंचकेदारों का संपूर्ण विश्व में धार्मिकता की दृष्टि से अलग ही पहचान है। यही कारण है कि देश-विदेश के श्रद्धालु यहां पहुंचकर भगवान के साक्षात दर्शनों के लिए लालायित रहते है।
हिमालय की गोद में बसे पंचकेदारों में से एक तुंगनाथ भी है, यहां शिव की हृदय और बाहों की पूजा होती है। समुद्रतल से करीब 12,772 फिट की ऊंचाई पर पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित भगवान तुंगनाथ का प्राचीन मंदिर धार्मिकता के साथ ही प्राकृतिक सौंदर्य से भी लबालब है। हर साल यहां हजारों की संख्या में तीर्थयात्री पहुंचकर मन्नतें मांगते है। मान्यता है कि जब भगवान राम ने रावण का वध किया था, तो ब्रह्म हत्या शाप से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने ने यहां पर शिव की तपस्या की थी, इसलिए यहां का नाम चंद्रशिला पड़ा। चंद्रशिला से बद्रीनाथ, नीलकंठ पंचचूली, सप्तचूली, बंदरपूंछ, हाथी पर्वत, गंगोत्री व यमनोत्री के ऊपरी बुग्यालों के दर्शन होते है। प्रतिवर्ष तृतीय केदार तुंगनाथ की डोली शीतकाल गद्दी स्थल मक्कूमठ से ग्रीष्मकालीन पूजा के लिए तुंगनाथ पहुंचती है। मान्यता है कि तृतीय तुंगनाथ की शीतकालीन गद्दीस्थल मक्कूमठ में मारकंडी ऋषि द्वारा तपस्या की गयी थी, इसलिए यहां का नाम मक्कूमठ पड़ा। ग्रीष्मकालीन पूजा के लिए मक्कूमठ से प्रस्थान कर भगवान तुंगनाथ डोली पहले दिन भूतनाथ मंदिर, दूसरे दिन चोपता तथा तीसरे दिन चोपता से प्रस्थान कर तुंगनाथ पहुंची। जहां अगले दिन प्रात: ब्राह्मणों के वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ ही भगवान तुंगनाथ के कपाट खुलते हैं। यहां की एक पौराणिक कथा महाभारत काल से भी जुड़ी है। युद्ध में पांडवों ने कौरवों एवं गुरु द्रोणाचार्य का वध करने के बाद शाप से बचने के लिए शिव दर्शनों के लिए यहां पहुंचकर तपस्या की थी। वहीं आदि गुरु शंकराचार्य ने इन पंचकेदारों की खोज सनातन धर्म का जीर्णोद्धार के लिए किया था, तभी से आज तक यह प्रथा चली आ रही है।
सोजन्य से जागरण न्यूज़

1 comments:
आभार जानकारी के लिये.
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