Tuesday, November 20, 2007

गौरवशाली इतिहास है 17वीं गढ़वाल राइफल का

स्थापना के पच्चीस वर्ष पूरे कर चुकी 17वीं गढ़वाल राइफल का इतिहास गौरवशाली रहा है। अपने छोटे से सफर में इस बटालियन के जवानों ने देश की रक्षा के लिए वह कर दिखाया जो एक सच्चा देश भक्त करता है। कारगिल युद्ध के दौरान इस बटालियन के 19 सिपाही और दो अधिकारी जन्म भूमि के लिए शहीद हो गए।

एक मई 1982 को 17वीं गढ़वाल राइफल का गठन किया गया। इसके बाद सेना की टुकड़ी ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। सेना की बटालियन ने अभी तक केवल कारगिल के युद्ध में शामिल हुई। जिसमें पाकिस्तान के कई बंकरों को पर कब्जा जमाया तथा चोटी 5285 पर कब्जा करने में सफल रही। इस लड़ाई में 19 जवानों के साथ ही एक अधिकारी व एक जेसीओ को अपनी जान गंवानी पड़ी। इसके साथ ही इस बटालियन ने अब तक कई आपरेशन जिनमें गरम हवा वर्ष 1985, आपरेशन बजरंग वर्ष 1991, आपरेशन राइनो वर्ष 1996 और इसके बाद वर्ष 1999 में आपरेशन विजय के लिए कारगिल में कूच किया। वीरता के लिए अब तक बटालियन को एक वीर चक्र, एक शौर्य चक्र, आठ सेना मेडल, 12 चीफ आप आर्मी स्टाफ कोमेडेशन एवं 19 जनरल आफ आफीसर्स कमांड़िग कोमेडेशन अवार्ड से नवाजा गया है। बटालियन के सूबेदार मेजर रणवीर सिंह नेगी बताता कि स्थापना के सिल्वर जुबली के अवसर पर रुद्रप्रयाग में स्थापना दिवस मनाया जा रहा है। जिसमें उन वीर शहीदों को याद किया जाएगा जो अभी तक की लड़ाई में शहीद हुए हैं। कार्यक्रम में पूर्व सैनिक भी शामिल होंगे। कारगिल में विपरीत परिस्थितियों के बाद भी सत्रहवीं गढ़वाल राइफल के जवानों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों को बंकरों से हटा कर उन पर कब्जा किया। भारतीय सेना की सत्रहवीं गढ़वाल राइफल के जवानों ने विपरीत परिस्थितियों में भी दुश्मन के बंकरों पर कब्जा जमा कर साबित किया कि भारतीय सेना किसी से कम नहीं।

सोजन्य से- जागरण न्यूज़

Monday, November 19, 2007

पहाडी लोक गीत- जिसने मिटा दी थी उत्तराखंड मे कोंग्रेस की सरकार

दोस्तो आज मैं आप लोगों के सामने एक ऐसा पहाडी गीत प्रस्तुत करने जा रहा हूँ जिसने अभी कुछ समय पहले हुऐ विधान सभा चुनाव मे कांग्रेस सरकार का तक्था पलट कर दिया था. यह गीत उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध लोक गायक मान्यीय श्री नरेन्द्र नेगी जी द्वारा रचित और गाया गया है. इस गीत के बोल आज भी हर उत्तराखंडी के मुह से सुने जा सकते हैं चाहे वो देश या विदेश के किसी भी कोने मे रहता हो.

तो प्रस्तुत है उत्तराखंड का सुपर हित पहाडी गीत जिसने मिटा दी एक सरकार और बना दी दूसरी सरकार

गीत -नौछ्म्मी नारैण
एलबम- नौछ्म्मी नारैण







Saturday, November 17, 2007

उत्तराखंड के कुछ लोक गीत

टका छिन ति टक टका




जय दुर्गा भवानी उत्तराखंडी भजन





ओये लछी घौर






जय अम्बा जगदम्बा भवानी - उत्तराखंडी भजन







कवे सुनुदु मेरी खैरी






बीरों बडों को देश





Friday, November 16, 2007

गौचर मेला,-उत्तराखंड का प्रसिद्ध ब्यापारिक मेला

भारत मेलों एवं सांस्कृतिक आयोजनों का देश रहा है । मेले किसी भी समाज के न सिर्फ लोगों के मिलन के अवसर होते है वरन संस्कृति, रोजमर्रे की आवश्यकता की पूर्ति के स्थल व विचारों और रचनाओं के भी साम्य स्थल होते है । पर्वतीय समाज के मेलों का स्वरूप भी अपने में एक आर्कषण का केन्द्र है । उत्तराखण्ड में मेले संस्कृति और विचारों के मिलन स्थल रहे है । यहां के प्रसिद्ध मेलों में से एक अनूठा मेला गौचर मेला है ।
तिब्बत में लगने वाले दो जनपदों पिथौरागढ व चमोली में भोटिया जनजाति के लोगों की पहल पर शुरू हुआ यह मेला उत्तराखण्ड के चमोली जनपद में जीवन के रोजमर्रे की आवश्यकताओं का हाट बाजार और यही हाट बाजार धीरे-धीरे मेले के स्वरूप में परिवर्तित हो गया । चमोली जनपद में नीति माणा घाटी के जनजातिय क्षेत्र के प्रमुख व्यापारी एवं जागृत जनप्रतिनिधि स्व0 बालासिंह पॉल, पानसिंह बम्पाल एवं गोविन्द सिंह राणा ने चमोली जनपद में भी इसी प्रकार के व्यापारिक मेले के आयोजन का विचार प्रतिष्ठित पत्रकार एवं समाजसेवी स्व0 गोविन्द प्रसाद नौटियाल के सम्मुख रखा । गढवाल के तत्कालीन डिप्टी कमीश्नर के सुझाव पर माह नवम्बर,1943 में प्रथमबार गौचर में व्यापारिक मेले का आयोजन शुरू हुआ बाद में धीरे-धीरे आद्यगिक विकास मेले एवं सांस्कृतिक मेले का स्वरूप धारण कर लिया । मेले में पहले तिथि का निर्धारण हर वर्ष भिन्न-भिन्न होता था, परन्तु आजादी के पश्चात गौचर में मेले का आयोजन भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू के जन्म दिन के अवसर पर 14 नवम्बर से एक सप्ताह की अवधि का किये जाने का निर्णय लिया गया ।

यह मेला संस्कृति, बाजार, उद्योग तीनों के समन्वय के कारण पूरे उत्तराखण्ड में लोकप्रिय बन गया है । मेले में जहां रोज की आवश्यक वस्तुओं की दुकाने लगाई जाती है वहीं जनपद में शासन की नीतियों के अनुसार प्राप्त उपलब्धियों के स्टॉल भी लगाये जाते है । मेले में स्वास्थ्य, पंचायत, सहकारिता, कृषि, पर्यटन आदि विषयों पर विचार गोष्ठियां होती है तथा मेले में स्वस्थ मनोंजरंन, संस्कृति के आधार पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है । इस हेतु प्रत्येक वर्ष पर्यटन विभाग, उत्तराखण्ड द्वारा अनुदान की धनराशि उपलब्ध कराई जाती है ।

कैसे पहुँचा जाये
गौचर राष्ट्रीय राजमार्ग पर अवस्थित है तथा चार धाम यात्रा मार्ग पर पडता है एवं राज्य के अन्य मुख्य शहरों से सड़क मार्ग से जुडा है । बस, टैक्सी तथा अन्य स्थानीय यातायात की सुविधायें उपलब्ध है ।

निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश 163 किमी0
निकटतम हवाई अड्डा जौलीग्रांट 180 किमी0

संकलित आलेख

Thursday, November 15, 2007

नंदा देवी राजजात- उत्तराखंड की एक परम्परागत विरासत

लोक इतिहास के अनुसार नन्दा गढ़वाल के राजाओं के साथ-साथ कुँमाऊ के कत्युरी राजवंश की ईष्टदेवी थी। ईष्टदेवी होने के कारण नन्दादेवी को राजराजेश्वरी कहकर सम्बोधित किया जाता है। नन्दादेवी को पार्वती की बहन के रुप में देखा जाता है। पूरे उत्तराँचल में समान रुप से पूजे जाने के कारण नन्दादेवी के समस्त प्रदेश में धार्मिक एकता के सूत्र के रुप में देखा गया
है।

सामान्य लोगों की मान्यता के अनुसार नन्दादेवी दक्ष प्रजापति की सात कन्याओं में से एक थीं। नन्दादेवी का विवाह शिव के साथ होना माना जाता है। शिव के साथ ऊँचे बर्फीले पर्वतों पर नन्दादेवी रहती हैं। पति के साथ होने के सुख के बदले भीषण से भीषण कष्ट वह हंसकर सह लेती है। कहीं-कहीं नन्दादेवी को पार्वती का रुप ही माना गया है। नन्दा के अनेक नामों में प्रमुख है, शिवा, सुनन्दा, शुभानन्दा, नन्दिनी।

उत्तरांचल में देवताओं की स्तुति में रात-दिन जगकर गाए जाने वाले गीत को जागर कहते हैं। नन्दादेवी के सम्बन्ध में कई जागरों के अनुसार विभिन्न कथाएँ पायी जाती है। एक जागर में नन्दा को नन्द महाराज की बेटी बताया जाता है। नन्द महाराज की यह बेटी कृष्ण जन्म के पूर्व ही कंस के हाथों से निकलकर आकाश में उड़कर नगाधिराज हिमालय की पत्नी मैना की गोद में पहुँच गई।

एक अन्य जागर में नन्दादेवी को चान्दपुर गढ़ के राजा भानुप्रताप की पुत्री बताया जाता है। एक और जागर में ऐसा वर्णन आता है कि नन्दादेवी का जन्म ॠषि हिमवंत और उनकी पत्नी मैना के घर पर हुआ था। यह सब अलग-अलग धारणायें होते हुए भी नन्दादेवी पर्वतीय राज्य उत्तराँचल के लोक मानस की एक दृढ़ आस्था का प्रतीक है तथा इसे परम्परा के अनुसार निभाकर हर बारहवें वर्ष में राजजात का भव्य आयोजन किया जाता है।

राजजात या नन्दाजात का अर्थ है राज राजेश्वरी नन्दादेवी की यात्रा। गढ़वाल क्षेत्र में देवी देवताओं की जात बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। जात का अर्थ होता है देवयात्रा। लोक विश्वास यह है कि नन्दा देवी हिन्दी माह के भादव के कृष्णपक्ष में अपने मैत (मायके) पधारतीं हैं। कुछ दिन के पश्चात उन्हें अष्टमी को मैत से विदा किया जाता है। राजजात या नन्दाजात देवी नन्दा की अपने मैत से एक सजीं संवरी दुल्हन के रुप में ससुराल जाने की यात्रा है। ससुराल को स्थानीय भाषा में सौरास कहते हैं। इस अवसर पर नन्दादेवी को सजाकर डोली में बिठाकर एवं वस्र, आभूषण, खाद्यान्न, कलेवा, दूज, दहेज आदि उपहार देकर पारम्परिक गढ़वाल की विदाई की तरह विदा किया जाता है।

वैसे तो हर साल नन्दाजात का आयोजन की प्रथा है परन्तु बारहवें वर्ष पर भव्य और मनोरंजक राजजात किया जाता है। नन्दाजात प्रतिवर्ष शुक्ल अष्टमी के दिन मनाई जाती है। नन्दा अष्टमी के दिन नन्दा को डोली में बिठाकर विदा किया जाता है। नैनीताल, वैजनाथ और अल्मोड़ा में विशेष धूमधाम से यह उत्सव मनाया जाता है। नैनीताल का प्रसिद्ध नन्दा-सुनन्दा मेला प्रतिवर्ष आयोजन किया जाता है जिसमें नन्दा-सुनन्दा बहनों की विशिष्ट और अनूठी केले के पेड़ से बनी मूर्तियों को- जो कि समस्त भारत में केवल कुमाऊँ में ही बनाई जाती है- डोले में बिठाकर घुमाया जाता है। अनतत: मूर्ति को नैनी झील में विसर्जित कर दिया जाता है।

कुमाऊँ में नन्दा की एक विशेषता यह भी है कि गरुड़ के कोट भ्रामरी मन्दिर में नन्दादेवी का अवतार एक पुरुष के शरीर में होता है जबकि उतराँचल के अन्य क्षेत्रों में देवी अवतार स्री शरीर में व देवता का अवतार पुरुष शरीर में होता है।

प्रसिद्ध इतिहासकार एटकिंसन महोदय भी हिमालयन गजेटियर में हर बारहवें वर्ष राजजात मनाये जाने का वर्णन करते हैं। इस यात्रा में लगभग २५० किलोमीटर की दूरी, नौटी से होमकुण्ड तक, पैदल करनी पड़ती है। इस दौरान घने जंगलों पथरीले मार्गों, दुर्गम चोटियों और बर्फीले पहाड़ों को पार करना पड़ता है। यात्रा की कठिनता और दुरुहता का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि बाणगांव से आगे रिणकीधार से यात्रियों को नंगे पांव चलकर ज्यूगरालीदार दैसी लगभग १८००० फीट की ऊँचाई पार करनी पड़ती है। रिणकीधार से आगे यात्रा में काफी प्रतिबन्ध भी है जैसे स्रियाँ, बच्चे, अभक्ष्य ग्रहण करने वाली जातियाँ, चमड़े की बनी वस्तुएं, गाजे-बाजे, इत्यादि निसिद्ध है। सम्भवत: यह विश्व की सबसे लम्बी, दुर्गम ओर कठिन धर्मयात्रा है। इसे केवल समर्पित एवं निष्ठावान व्यक्ति ही कर सकते हैं। हजारों श्रद्धालु आज भी इस यात्रा को पूरा करते हैं।

आजकल स्थानीय लोगों ने इस यात्रा के सफल संचालन प्रजातान्त्रिक ढ़ंग से श्री नन्दादेवी राजजात समिति का गहन किया है। इसी समिति के तत्त्वाधान में प्रति वर्ष नन्दादेवी राजजात का आयोजन किया जाता है। परम्परा के अनुसार वसन्त पंचमी के दिन यात्रा के आयोजन की घोषणा की जाती है। इसके पश्चात इसकी तैयारियों का सिलसिला आरम्भ होता है। इसमें नौटी के नौटियाल एवं कासुवा के कुवरो के अलावा अन्य सम्बन्धित पक्षों जैसे बधाण के १४ सयाने, चान्दपुर के १२ थोकी ब्राह्मण तथा अन्य पुजारियों के साथ-साथ जिला प्रशासन तथा केन्द्र एवं राज्य सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा मिलकर कार्यक्रम की रुपरेखा तैयार कर यात्रा का निर्धारण किया जाता है।

प्रशासनिक तैयारियाँ जैसे यात्रा मार्ग का मरम्मत अथवा सुधार, चिकित्सा, भोजन, दूरसंचार आदि की व्यवस्था सामान्य तौर पर होने वाले आयोजकों के समान ही होती है। इसकी व्यापकता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें सम्बन्धित प्रशासनिक एवं सरकारी विभाग, गैर सरकारी संगठन, स्वयंसेवक एवं जनप्रतिनिधियों के साथ-साथ आम जनता भी जुड़ी होती है। इससे जुड़ी धार्मिक व प्रशासनिक तैयारियों एवं हर बारहवें वर्ष पर इसके आयोजन को देखते हुए इसे उतरांचल का कुम्भ की संज्ञा दिया जाना गलत नहीं होगा।

भाद्र के शुक्लपक्ष के प्रथम दिन से ही नन्दा के जागर लगने आरम्भ हो जाते हैं। ये जागर नन्दा के मन्दिरों या घर के किसी कमरे (कक्ष) में लगते हैं। जागर गाने वाले को जागरी कहा जाता है। जागरी नन्दादेवी के विषय में विभिन्न गीत गाते रहता है। गीतों में लगभग सभी नौ रसों का अद्भुत प्रयोग देखा जा सकता है। ये जागरे सप्तमी तक लगातार बिना रुकावट के चलती रहती है। इन जागरों को 'मित्तलीपाती' भी कहते हैं। इन जागरों में विशेष रुप से करुणा, आदर और वात्सल्य रसों का अनुपम सामंजस्य रहता है। अष्टमी के दिन 'नन्दाष्टमी' का मेला लगता है। नवमी के दिन नन्दापाती का पूजन किया जाता है जिसे छोटी नन्दाजात भी कहा जाता है। इस दिन नन्दा के प्रतीक के रुप में चीड़ का वृक्ष आंगन में गाढ़ा जाता है और उसे सुन्दर वस्रों से सजाया जाता है। उस पर प्रसाद स्वरुप ककड़ी, मक्का, चबेना इत्यादि बांधा जाता है। फिर जागर के साथ-साथ ढ़ोल दमाऊ पर नृत्य भी होता है जिसे नन्दा का पति माना गया है। संध्या के समय प्रसाद बाँटा जाता है। प्रसाद को एक तरह से छीन झपट कर लूटा जाता है। दरअसल दो दल बन जाते हैं जो नन्दादेवी के मायके वालों और शिव के गणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। शिव गण परम्परा एवं चरित्रानुसार प्रसाद लूटकर खाते हैं। नन्दापाती के बाद नन्दा विदाई का समय आता है।

चौसिंगा खाडू का जन्म लेना राजजात की एक खास बात है। चौसिंगा खाडू की पीठ पर नौटियाल और कुँवर लोग नन्दा के उपहार में होमकुण्ड तक ले जाते हैं। वहाँ सो यह अकेला ही आगे बढ़ जाता है। खाडू के जन्म साथ ही विचित्र चमत्कारिक घटनाये शुरु हो जाती है। जिस गौशाला में यह जन्म लेता है उसी दिन से वहाँ शेर आना प्रारम्भ कर देता है और जब तक खाड़ का मालिक उसे राजजात को अर्पित करने की मनौती नहीं रखता तब तक शेर लगातार आता ही रहता है। यात्रा को दौरान भीड़-भाड़ होने पर भी यह बेधड़क यात्रा का मार्गदर्शन करता है। आस पास के अन्य जानवरों (भेड़ बकरियों) का इस पर कोई असर नहीं पड़ता है। रात को भी यह नन्दा की मूर्ति वाले रिगाल की छताली के पास ही सोता है। लोक मान्यता है कि यह कैलाश तक जाता है। इतना ही, नहीं लोक मान्यता से यह भी है कि खाडू हरिद्वार तक गंगा स्नान के लिये पहुँच जाता हैं। कुछ यात्रियों ने मुझसे यह भी बताया कि होमकुण्ड से ऊपर चढ़ने के पश्चात खाडू का सिर धड़ से अलग होकर नीचे आ जाता है जिसे भक्त लोग प्रसाद समझकर ले जाते हैं।

रिगाल की छतोली भी राजजात की एक विशेषता है। देवी के आदेशानुसार हर बारहवें वर्ष राजजात के संचालक कोसवा के कुँवर रिगाल की छतोली देवी के लिये लाते हैं। यह प्रथा राज घरानों में प्राचीन काल से प्रचलित है कि इस यात्रा के दौरान सिर के ऊपर छत्र (एक प्रकार की छतरी) का उपयोग किया जाता है। समृद्धता और अवसर के अनुसार इसमें धातुओं का प्रयोग किया जाता है। गढ़वाल में देवी देवताओं को भी सोने या चाँदी के छत्र चढ़ाने का रिवाज है। नन्दा द्वारा अपने लिये रिगाल या बांस की छतरी कुंवरी से मांगी गई। इसी प्रकार की छतोलियाँ कई अन्य स्थानों से भी यात्रा मार्ग में राजजात में शामिल हो जाती हैं जो कि होमकुण्ड तक साथ जाती हैं। नौटी में राजजात का शुभारम्भ ही रियाल की छतोली और चौसिंगा खाडू की पूजा से होता है।

राजजात की विधिवत घोषणा होती ही कांसुवा के राजवंशी कुंवर चौसिंगा खाडू और रियाल की छतोली लेकर नौटी आते हैं। छतोली पर नन्दादेवी का प्रतीक सोने की मूर्ति रखी जाती है। नौटी में एक विशेष बात यह है कि यहाँ पर नन्दा देवी का कोई मन्दिर या मूर्ति नही है। देवी का श्रीयंत्र को नवीं शताब्दी में राजा शालिपाल ने नौटी में भूमिगत करा दिया था। छतोली और खाडू का स्थानीय परम्परा के अनुसार विधि-विधान से पूजन होता है और राजजात शुरु हो जाता है। हजारों लोग नौटी से राजजात के साथ चल पड़ते हैं। चौसिंगा खाडू राजजात का नेतृत्व करता है और अन्य लोग उसके पीछे-पीछे चलते हैं। नंदा देवी के गीत, जयकार और देवी देवताओं की स्तुति यात्रीगण करते चलते हैं। कासुंवा पहँचने पर राजजात की छतोली कोटी चान्दपुर के ड्यूडी पुजारियों को आगे की यात्रा के लिये
सौंप की जाती है। इस बीच यात्रा मार्ग पर चान्दपुर के बारह थोकी ब्राह्मणों की छतोलियाँ भी सम्मिलित हो जाती हैं। चांदपुर गढ़ी में ही गढ़वाल के राजपरिवार द्वारा नन्दा देवी की पूजा अर्चना की जाती है। इस बीच भक्तों में से 'पोमारी' अर्थात् भार उठाने वाले देवताओं की सामग्री ढ़ोते हुए साथ चलते हैं। कुलसारी का इस धार्मिक यात्रा के कार्यक्रम निर्धारण में महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि कुलसारी के काली मन्दिर में भूमिगत काली यंत्र को केवल राजजात की अमावस्या की आधी रात को निकालकर पूजा की जाती है और फिर अगली राजजात तक के लिये भूमिगत कर दिया जाता है। नन्दकेसरी में भी यात्रा का पड़ाव होता है। यहाँ पर कुरुड़ की नन्दा देवी की मूर्ति डोली पर राजजात में शामिल होती है। इसके बाद कुरुड़ के पुजारी राजजात की छतोली सम्भालते हैं। विभिन्न पड़ावों से होती हुई यात्रा वाण गाँव पहुँचती है।

वाण यात्रा का अन्तिम गाँव है। इस गाँव में ही लाटू देवता का आकर्षक मन्दिर है जिसे नन्दा देवी का धर्म भाई माना जाता है। लाटू को बकरे की बलि दी जाती है तथा लाटू की पूजा-अर्चना भी नन्दा देवी से पहले ही की जाती है। लाटी की वर्ष में एक बार पूजा होती है लेकिन हर बारहवें वर्ष राजजात के समय लाटू की विशेष पूजा होती है। लाटू के मन्दिर के द्वार भी केवल राजजात के दिन ही खुलते हैं और नौटीयाल ब्राह्मणों द्वारा पूजा के बाद अगली राजजात तक बन्द कर दिये जाते हैं। उनके अलावा किसी को भी मन्दिर के दरवाजे खोलने का अधिकार नहीं होता। अन्य लोगों द्वारा बाहर से ही पूजा की जाती है और उन्हें बाहर से ही पूजा का फल मिल जाता है।

वाणगाँव तक आते-आते लगभग १९४ देवी देवताओं के निशान या चिन्ह राजजात में शामिल हो जाते हैं। रिगाल के अलावा भोजपत्रों की छतोलियां भी राजजात में शामिल होती है। वाण में ही लावा, दशोली और अल्मोड़ा की नन्दादेवी तथा कोट भ्रामरी की नन्ददेवी की कटार राजजात में शामिल होती है। वाण से आगे की यात्रा दुर्गम होती हैं और साथ ही प्रतिबंधित एवं निषेधात्मक भी हो जाती है। वाण से कुछ आगे रिणकीधार से चमड़े की वस्तुएँ जैसे जूते, बेल्ट आदि तथा गाजे-बाजे, स्रियाँ-बच्चे, अभक्ष्य पदार्थ खाने वाली जातियाँ इत्यादि राजजात में निषिद्ध हो जाते हैं। वाण से चलकर राजजात गैरोली पाताल, वैतरणी, बेदिनीकुण्ड, पातर नचौनियाँ, इत्यादि जगहों से होती हुई रुपकुण्ड पहुँचती है। इस बीच यात्रा मार्ग में बेदिनी बुग्याल के मनोहारी दृश्य यात्रियों की थकान मिटाते हैं। पातर नचौनियाँ के बारे में कथा प्रसिद्ध है कि राजा यशोधवल अपनी यात्रा में अन्य नियमों के उलंघन के साथ-साथ बाजे और नर्तकियां भी लाता था। रात्रि विश्राम में उसने नृत्य का आयोजन किया। यात्रा के नियम भंग होते देख देवी ने चेतावनी स्वरुप सभी नर्तकियों को पत्थर बना दिया। इसी से उस दृश्य का नाम पावर (नर्तकी) नचौनियाँ (नचाने वाला) पड़ गया। आज भी शिलालेखों के गोल घेरे वहाँ देखे जा सकते हैं। इस घटना से भी राजा यशोधवल नहीं चेता तो आगे चलकर देवी के प्रकोप का परिणाम राजा को रुपकुण्ड में भुगतना पड़ा। रुपकुण्ड में जो कि लगभग १६००० फीट की ऊँचाई पर है, राजजात में आये हुये नौटियाल ब्राह्मणों द्वारा कुंवरो के हाथों उनके पितरों का तपंण कराया जाता है। रुपकुण्ड का भी राजजात में विशेष महत्व है।

रुपकुण्ड सचमुच में एक अजीबोगरीब कुण्ड है। यहाँ पर मनुष्यों के शरीर, वस्र, जुते, शंख, घंटियाँ, रुद्राक्ष, डमरु, बर्तन, छतेलियाँ इत्यादि अवशेष मिलते हैं। इनके बारे में तरह-तरह की मान्यताएं प्रचलित है



सोजन्य : डॉ. कैलाश कुमार मिश्र

Tuesday, November 13, 2007

उत्तराखंडी मांगल गीत

जै जस दॆई, धरती माता,

जै जस दॆई, खॊली का गणॆश,

जै जस दॆई, मॊरी का नारैण,

जै जस दॆई, भुमी का भुम्याल,

जै जस दॆई, पंचनाम दॆवता,

यॆ बॊल है एक मांगल गीत कॆ | इसका अर्थ है कि हॆ धरती माता, हॆ द्वार कॆ गणॆश, हॆ धरती माता कॆ पालक दॆवता, हॆ पंचनाम दॆवताऒ मै आज जॊ यह मंगल कार्य कर रहा हुँ तुम यहाँ आकर इस कार्य कॊ सम्पन्न करनॆ मॆ तथा इस कार्य की सफलता कॆ लियॆ हमॆ आशीर्वाद प्रदान करॊ, ताकी हमॆ इस कार्य मॆ यश (सफलता) मिल सकॆ | उत्तराखण्ड कॆ मनुष्यॊ मॆ प्यार निष्ठा एवं हर कठिनाई कॊ सहजता सॆ सह लॆनॆ कि हिम्मत एवं द्रढ इच्छा शक्ति कॆ भाव भरॆ हॊं | जिवन कॆ तमाम उतार चढाव कॆ साथ साथ जब भी यहाँ कॊई शुभ कार्य हॊतॆ हैं तॊ सबसॆ पहलॆ आहवान किया जाता है दॆवी‍-दॆवताऒ का|दॆवॊ कॊ स्मरण करनॆ कॆ यॆ माध्यम हॊतॆ है यॆ गीत |

वैदिक परम्परा कॆ अनुसार किसी भी कार्य कॊ आरम्भ करनॆ कॆ पहलॆ मंगलाचरण हॊता है | वैदिक श्रचाऒ कि तरह इन गितॊ मॆ भी दॆवताऒ कॆ स्मरण, जागरण आहवान कॆ पश्चात क्षॆत्रपाल दॆवता तथा समस्त स्रिष्टि कॊ जगाया जाता है | सुहागिन महिलायॆ अपनॆ मधुर कंठ सॆ गणॆश तथा अन्य दॆवॊ सॆ आग्रह करती है कि वॆ इस कार्य कॊ सम्पन्न् करनॆ हॆतु उनकी प्रार्थना सुनॆ तथा कार्य कॊ पूर्ण करनॆ मॆ उनकी मदद करॆ :-

बीजी जावा है खॊली का गणॆश,

बीजी जावा है मॊरी का नारैण,

बीजी जावा है खतरी का खैँडॊ,

बीजी जावा है कुंती का पंडौऊं,

बीजती जावा है काठंयॊं उदकारॊं,

बीजी जावा है नौखंडी नरसिंह,

मंगल गीत गानॆ की प्रथा वैसॆ तॊ समस्त संस्कारॊ जैसॆ जन्म, नामकरण, मुण्डन, जनॆऊ, विवाह सभी अवसरॊ पर है लॆकिन वर्तमान मॆ विवाह कॆ ही गीत मांगल गीतॊ कॆ नाम सॆ अधिक जानॆ जातॆ हैं |

उत्तराखण्ड मॆ विवाह की कॊई भी ऎसी क्रिया नही है जॊ मांगल कॆ बिना पुरी हॊती हॊ | यॆ गीत विवाह कॆ विविध पक्षॊ कॊ ही नही बल्कि उनकॆ भावनात्मक स्वरूप की भी सुन्दर सजीव व्याख्या प्रस्तुत करतॆ हैं | मांगल गानॆ वाली मंगलॆनियाँ गीत गाकर कौवॆ कॊ हरॆ ब्रिक्ष पर बैठकर शगुन बॊलनॆ कॊ कहती है तथा तॊतॆ सॆ आग्रह करती है कि संदॆशवाहक का कार्य करॆ और विवाह कॆ शुभ अवसर पर सभी दॆवॊ कॆ साथ‌-साथ सावित्री, लक्ष्मी, पार्वती, सीता, सुधिवुधि आदी दॆवियॊ कॊ भी न्यॊता दॆ आयॆ | दॆवताऒ एवं मनुष्यॊ कॆ अतिरिक्त पॆड पौधॆ जैसॆ हल्दी की वाडि मालु की पत्तियॊ, धान की क्यारी व कामधॆनु कॊ भी सम्मान पूर्वक विवाह कार्य मॆ न्यॊता दॆकर सम्मिलित किया जाता है | सुआ सॆ न्यॊता दॆनॆ कॆ लियॆ आग्रह कुछ इस प्रकार किया जाता है |

पिंजरी का सुआ अटारी का सुआ,

दॆ आ सुआ तु सुहागण्यॊं न्यूतू |

सुनपंखी सुआ लाल ठूंठी सुआ,

दॆ आ सुआ तु सुहागण्यॊं न्यूतू |

विष्णु जी का घर लक्ष्मी दॆवी,

वॆ घर वीं दॆवी न्यूती की आया |

महादॆव जी का घर हॊली पार्वती दॆवी,

वॆ घर वीं दॆवी न्यूती की आया |

मंगलस्नान विवाह का प्रमुख क्रियाऒ सॆ माना जाता है | मंगलस्नान करवानॆ कॆ लियॆ 'लड्की/लडका' कॆ मां, बडी चाची, भाभी, बहन एवं कुँवारी कन्याऒ व सुहागिनॊ आमत्रित किया जाता है | इसकॆ पुर्व अनुष्ठान कॆ लियॆ आवश्यक सामग्री जैसॆ हल्दी चन्दन आदि जुटानॆ का कार्य भी मांगल गीतॊ सॆ प्रारम्भ हॊता है और मांगल सॆ ही प्रारम्भ हॊ है बाँद दॆनॆ की क्रिया जॊ कुछ इस प्रकार है :-

दॆ धावा मॆरा ब्रह्मा जी हल्दी का बाना

दॆ धावा मॆरी माँजी हल्दी का बाना हॆ

दॆ धावा मॆरी बढी जी दै दूध का बाना

दॆ धावा मॆरा चची जी घी तॆल का बाना

दॆ धावा मॆरा मॆरी भाभी जी कच्यूरा का बाना

दॆ धावा मॆरा मॆरी पुफु जी चन्दन का बाना

दॆ धावा मॆरा मॆरी दीदी समॊया का बाना

मंगलस्नान कॆ बाद बस्त्राधारण हॊता है जिसमॆ बॆटी द्वारा पिता सॆ आग्रह किया जाता है कि वह अच्छॆ-अच्छॆ वस्त्र दॆ | वॆदी चिणाई कॆ वक्त कन्या अपनॆ पिता सॆ कहती है कि सॊनॆ चांदी वॆदी बनावॆ और उसॆ मॊतियॊ सॆ भर दॆ|

अब वक्त हॊ गया है बारात कॆ आनॆ का और बारात का स्वागत ढॊल दमौं पर बजॆ 'द्वार चार' कॆ माध्यम सॆ हॊता है | इस अवसर पर बॆटी अपनॆ पिता सॆ कहती है कि आज मॆरॆ राम जी द्वार पर आयॆ हैं उनका स्वागत उचित तरह सॆ करना | कन्यादान और सप्तपदी संस्कारॊ कॆ अतिरिक्त स्तंभूपजा, गॊत्राचार, कंकणबंधन, पाणीग्रहण आदि संस्कार सम्पन्न कियॆ जातॆ हैं | इन सभी संस्कारॊ कॊ सम्पन्न करतॆ समय संस्कारानुसार मांगल गीत गायॆ जातॆ हैं |

सप्तपदी फॆरॊ कॆ साथ ही विवाह सम्पन्न माना जाता है | इस अवसर पर सप्तपदी की प्रत्यॆक भंवर का उल्लॆख कुछ इस प्रका र है :-

तीजॊं फॆरी लाडी भाइयॊ की लाडली,

चौथॊ फॆरॊ फैरी लाडी छॊड मै बैणॊं कू दगडू,

पाँचॊ फॆरॊ फॆरी लाडी छॊड मै बाबू की खॊली,

छठीं फॆरॊ फॆरी लाडी सैसर की छ त्यारी,

सातॊ फॆरॊ फॆरी लाडी कन्या हवै तुमारी,

सप्तपदी फॆरॊ कॆ पश्चात गौ (गाय‌) दान कॆ साथ ही कन्यादान हॊ जाता है :

दॆ दवाया बाबाजी गौ कन्यादान |

हीरा दान मॊती दान हर कॊई दॆला,

तुम दॆला बाबाजी कन्या कू दान |

ससुराल मॆ नववधू का प्रवॆश मांगल्य का सुचक माना जाता है तथा इस अवसर पर भी मांगल गीत गायॆ जातॆ है नवबधु का स्वागत ग्रिह लक्ष्मी कॆ रूप मॆ कुछ इस प्रकार किया जाता है :-

शुभ दिन शुभ घडी आई सुहागण,

अमरित सिंचदी आई सुहागण,

मॊतियॊ परॊखदी आई सुहागण |

अर्थात 'आज शुभ दिन, शुभ घडी मॆ सुहागन का ग्रिह प्रवॆश हॊ गया है | अम्रित सिंचती हुई और मॊतियॊ कॊ बिखॆरती हुई सुहागन हमारॆ घर पर आ गयी है | इस सुहागन का स्वागत है|' मांगल गीतॊ का काव्य पक्ष जितना सश्क्त है उससॆ वढकर इनका संगीत, जिसमॆ किसी कॊ सहज ही अपनी ऒर खिंचनॆ की अपार क्षमता है |

परन्तु खुद का सॊना मिट्टी और गैर की मिट्टी कॊ सॊना समझनॆ ही हमारी मानसिकता कॆ कारण हम धिरॆ-धिरॆ इन मांगल गीतॊ कॊ भुलाकर पाश्चात्य संस्क्रिति कॆ साथ‌-साथ अपनी संस्क्रिति कॊ भी महत्व दॆं | ताकी विलुप्त हॊती इस संस्क्रिति कॊ जिन्दा रखा जा सकॆ |

सोजन्य से - म्यार पहाड़ (संकलित लेख )