Thursday, October 11, 2007

मैती कार्यक्रम / संस्था



मनुष्य आज कितना स्वार्थी हो गया है, आज के स्वार्थ के बीच वह अपना कल का भविष्य भूल गया, वो भूल गया की कल वो क्या करेगा, आज वो जो भूल कर रहा है, कल उसका क्या अंजाम होगा. आज के भौतिकवादी युग मैं हम केवल अपना आज देख रहे है , हम भूल गए है की आने वाला कल भी हमारे लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना आज. दोस्तो मैं ज्यादा विस्तार मैं न जाकर सीधे अपने विषय पर आता हू जो मैं आप लोगों से कहना चाहता हू. जैसे आज आप सभी लोगों को पता होगा की हमारा वातावरण दिन प्रतिदिन प्रदूषित होता जा रहा है. जंगल कटते जा रहे है, पेडो की संख्या दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है, ओधोगिकी करण के इस युग मैं दुनिया भर की विषैले पदार्थ हमारे वायुमंडल मैं फैलते जा रहे है और जीवन दायिनी ओजोन परत को नुकसान पंहुचा रहे है, लेकिन अफ़सोस की बात यह है की एसके बारे मैं सोचने का समय किसी के पास नही है, किसी के पास ऐसा समय नही है जो इसको बचाने का विकल्प खोज सके, सभी लोग हवा मैं तीर मारना जानते है लेकिन शायद वो जमीनी हक़ीकत को भूल गए. इसी विषय पर एक जमीन से जुड़े हुए समाजिक कार्यकर्ता श्री माननीय कल्याण सिह रावत ने एक बहुत ही अच्छा, सुलभ और सस्ता उपाय ढूँढा, और इसको नाम दिया "मैती". मैं थोड़ा सा अपको इनके बारे मैं बता दू , श्री रावत जी उत्तराखंड के रहने वाले है और पेशे से एक अध्यापक है.

उत्तराखंड मैं मैती शब्द का अर्थ होता है "मायका" और मैं समझता हू की आप सभी लोग इस शब्द से भली भाती परिचित होंगे.

उत्तराखंड मैं इस कर्याकरम की शुरुआत गॉव की कुवारी लड़कियों से शुरू हुई. चेत्र के गाँवों की कुंवारी लड़कियों को जल जंगल जमीन से उनके कुदरती लगाव को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की
मुहिम को मैती नाम दिया गया .

इस तरह लड़कियों के साथ मुहिम शुरू कर इसमे गाँव की बुजुर्ग महिलाओ ,पुरूषों और विवाहित लोगों को भी जोडा गया .

विवाह कर ससुराल चली जाने वाली लड़की शादी के समारोह के दौरान एक पौधा अपने घर के पास रोप कर जाती .


इस तरह वो पेड़ के रूप मे , विदाई के समय एक मैती की याद भी अपने साथ ले जाती . ये परम्परा , अब गढ़वाल और कुमाऊ के की गाँवों तक फेल गी है .

दरअसल मैती संस्था की शुरूआत १९९४ मे उत्तरांचल के चमोली गढ़वाल के ग्वालदम चेत्र से हुई थी .अब ये बहुचर्चित मैती आन्दोलन अपने १४वे साल मना रहा है और मकसद है शहरी युवा वर्ग को अपनी मिट्टी अपने जंगल और अपनी धरती के प्रति जागरूक करना .

दोस्तो मेरे यहा लिखने का मात्र अभिप्राय यह है की अगर अपकी नज़र मैं भी यह एक अच्छा, सुलभ और सस्ता उपाय हो सकता है अपने प्रयावारण को बचने मैं तो जरूर मैती कार्यक्रम का अपने अपने गॉव, शहर और आस पास प्रचार प्रसार करें और सर्व प्रथम इसकी शुरुआत अपने घर से करें और लोगों को प्रोत्साहित करें आगे करने के लिए .

मुझे ज्यादा लिखना तो नही आता है लेकिन मुझे पूरा विश्वास है जो बात मैं आप लोगों से कहना चाहता था वो आप लोग समझ गए होंगे और इसको अपनाने की पूरी कोशिश करेंगे. दोस्तो सपथ ले लो की हमें अपना प्रयावारण बचाना है और इसकी शुरुआत सर्व प्रथम हम लोगों को ही करनी है , नही तो वो दिन दूर नही जब इस धरती से जीव नाम का अंश मिट जाएगा.

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