Tuesday, October 23, 2007

कनाडा-अमेरिका तक फैला उत्तराखंड का 'मैती' आंदोलन

दोस्तो जैसे की मैं पहले ही मैती कार्यक्रम से आपको परिचित कर चुका हू , लेकिन अभी कुछ दिन पहले मेरी नज़र हिन्दी अखबार दैनिक जागरण पर नज़र पड़ी तो बहुत ही खुसी हुए और सोचा आप लोगों के बीच भी इस न्यूज़ को शेयर करू.

कनाडा-अमेरिका तक फैला उत्तराखंड का 'मैती' आंदोलन

नैनीताल। कनाडा के युवा अब अपनी सगाई और जन्म दिन पर एक दूसरे को उपहार देने की बजाय धरती को एक पौधे का उपहार देना बेहतर मान रहे है। अमेरिका, इंग्लैंड, थाइलैंड व नेपाल में भी हजारों लोग भावनात्मक रूप से विश्व के इन अनूठे पर्यावरणीय अनुष्ठान में जुटे हुए हैं। ऐसे में आंदोलन का प्रणेता भारत भी क्यों पीछे रहे, यहां 12 राज्य इस अभियान में शरीक है। सबसे खास बात यह कि अभियान का 'मैत' यानी मायका उत्तराखंड में है जहां 12 वर्ष पूर्व एक जीव विज्ञान प्रवक्ता ने 'मैती' नाम से इस आंदोलन की शुरूआत की थी।
'मैत्री' आंदोलन के प्रणेता व वर्तमान में राज्य पर्यावरण शिक्षा के राज्य समन्वयक कल्याण सिंह रावत गुरुवार को नैनीताल में थे। यहां 'जागरण' से एक विशेष भेंट में उन्होंने बताया कि वह राज्य के अनूठे 'चिपको आंदोलन' से गोपेश्वर में पढ़ाई के दौरान रूबरू हुए। इस आंदोलन से पेड़ों के कटान पर तो रोक लग गई पर गढ़वाल में कई जगह वृक्ष रहित नंगी चट्टानें देख मन विचलित हो उठता था। 1995 में ग्वालदम में विशेषकर महिलाओं को भावनात्मक रूप से पौधे लगाने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से उन्होंने 'मैती' आंदोलन प्रारंभ किया। इसके तहत गांव की हर बेटी अपने दूल्हे के साथ डोली में विदा होते समय अपनी मां को एक पौधा सौंपती है। दूल्हा गांव की लड़कियों को जूते छिपाने की रस्म के बदले पौधे की देखभाल के लिए पैसे देता है। इस धनराशि से गांव की गरीब लड़कियों की मदद भी की जाती है। बेटी के विदा होने के बाद मां व गांव की लड़कियां उसकी स्मृतियों को चिरस्थायी रखने के उद्देश्य से पौधे की आजन्म देखभाल करती है। आंदोलन का प्रभाव अब 6 हजार गांवों में विकसित हुए वनों के रूप में दिखाई देने लगा है। रावत बताते है 1997 में कौसानी में एक अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण संगोष्ठी आयोजित हुई जिसमें उपस्थित कनाडा की पूर्व प्रधानमंत्री व तत्कालीन वित्त मंत्री फ्लोरा डोनाल्ड इससे बेहद प्रभावित हुई। उन्होंने इसे वहां शुरू किया, फलस्वरूप कनाडा आज इस अभियान की सफलता में प्रथम स्थान पर है। बीबीसी के अलावा विश्व की जानी-मानी पत्रिका टाइम्स में भी 'मैती' को स्थान मिला। नेपाल में अब अपने 'मैती' संगठन हैं। इंग्लैंड सहित अन्य देशों में भी आंदोलन सफलता के साथ चल रहा है।

3 comments:

मीनाक्षी said...

बहुत खूब ! मैती आन्दोलन ने दिल मे आशा का संचार किया है कि पर्यावरण पर बातें ही नही हो रही , कुछ लोग सक्रिय भी है .

हिन्दी टुडे said...

काश! आज भी इसी तरह का आन्दोलन होता। जिसकी आज उत्तराखन्ड को सख्त जरूरत है।

Udan Tashtari said...

शुभ समाचार है. विगत वर्ष अपने जन्म दिवस पर भारत में किसी संस्था द्वारा हमसे वृक्षारोपण करवाया गया था, बहुत अच्छा लगा था.