Sunday, October 21, 2007

उत्तराखंड राज्य एक परिचय

उत्तराखंड राज्य एक परिचय

हिमालय पर्वतमाला की गोद में बसा नवगठित राज्य उतराखंड ९ नवंबर २००० को भारतवर्ष का सत्ताईसवाँ राज्य बन गया। दूर-दूर तक हज़ारों वर्ग मील में फैला यह प्रदेश भारतमाता की शोभा बढ़ाने वाला परिधान है। हिममण्डित शिखर उस राजरानी राजेश्वर का शुभ्र मुकुट है। ऐसे में कालिदास याद आते हैं। अपनी कृति कुमारसम्भव में कालीदास कहते हैं:


अस्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराज:।
पूर्वापरौं तोयनिधी वगाह्य स्थित: पृथि इवमानदणड:।।

उतराखंड सौंदर्य का जीवन्त प्रतीक है, सरलता एवं गरिमा का अभिषेक है और सभ्यता एवं संस्कृति इसकी विशिष्ट पहचान है। यहाँ प्रकृति और जीवन के बीच ऐसा सामंजस्य हैं जो सभी पर्यटकों और तीर्थयात्रियों को मंत्रमुग्ध कर देता है। यहाँ की शीतल हवा शान्ति की प्रतीक हैं तो फलदार वृक्ष दान की महिमा का गुणगान करते हैं। यहाँ के लोक जीवन में परंपराएँ, खेल-तमाशे, मेले, उत्सव, पर्व-त्यौहार, चौफुला-झुमैलो, दैरी-चांचरी, छपेली, झौड़ो के झमाके, खुदेड़ गीत, ॠतुरैण, पाण्डव-नृत्य, संस्कार सभी कुछ अपने निराले अन्दाज में जीवन को सजाते हैं।

ब्रह्मावर्त, ब्रह्मदेश, ब्रह्मर्षिदेश और आर्यावर्त आदि नामों से विख्यात उतराखंड प्रदेश वेद भूमि है। पुराणों में केदारखण्ड नाम से और संस्कृत साहित्य में हिमवान् हिमवन्त और इसी प्रकार पालि साहित्य में भी उसी आदर और प्रेम से उन्हीं नामों से अभिहित हुआ है। हिमालय इस वसुन्धरा का प्रिय वत्स है। वत्सरुप हिमालय को प्राप्त कर ही धरती-धेनु ने रस, औषधियाँ और रत्न रुपी दूध प्रदान किया। यह यज्ञ साधन है। विष्णु पुराण में स्वयं भगवा विष्णु कहते हैं कि "मैंने पर्वत राज हिमालय की सृष्टि यज्ञ साधन के लिए की है।"

उत्तराचल के चार विरासत या धरोहर के प्रतीक हैं:

(
क) राज्य पुष्प ब्रह्म कमल;
(
ख) राज्य वन्य पशु कस्तूरी मृग;
(
ग) राज्य वृक्ष बुरांस; और
(
घ) राज्य पक्षी मोनाल।

ब्रह्म कमल यहाँ का राज्य पुष्प है। वेदों में भी इसका उल्लेख मिलता है। यह कश्मीर, मध्य नेपाल, उतराखंड में फूलों की घाटी, केदारनाथ, शिवलिंग, बेस, पिंडापी, ग्लेशियर, आदि में ३६०० मीटर की ऊँचाई पर पाया जाता है। पौधों की ऊँचाई ७०-८० से.मी. होती है। जुलाई से सितम्बर के मध्य यह जहाँ खिलता है वहीं का वातावरण सुगंध से भर जाता है। पुष्प के चारों ओर कुछ पारदर्शी ब्लैडर के समान पत्तियों की रचना होती है जिसको स्पर्श कर लेने मात्र से उसकी सुगंध कई घंटों तक अनुभव की जा सकती है। इसकी जडों में औषधीय गुण होते है। यह दुर्लभ प्रजाति का विशेष पुष्प है। इतिहास एवं धार्मिक ग्रंथों में इस पुष्प का कई स्थलों पर उल्लेख मिलता है


उतराखंड प्रदेश का क्षेत्रफल ५१,१२५ वर्ग कि.मी. क्षेत्र पर विस्तृत है। इस प्रदेश के अन्तर्गत गढ़वाल व कुमाऊँ मण्डल तथा हरिद्वार जनपद शामिल है। गढ़वाल मण्डल के अन्तर्गत ६ जिले शामिल हैं जिनमें देहरादून, टिहरी गढ़वाल, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमोली, पौड़ी गढ़वाल हैं। कुमाऊँ मण्डल के अतर्गत नैनीताल, अल्मोड़, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चम्पावत और उधमसिंह नगर हैं। इसके अलावा हरिद्वार जनपद भी उतराखंड प्रदेश में शामिल है। भौगोलिक दृष्टि से उतराखंड प्रदेश के पश्चिम में हिमालय प्रदेश, पूर्व में नेपाल, उत्तर में चीन के तिब्बती क्षेत्र एवं दक्षिण में उत्तर प्रदेश के गंगा-यमुना (नदियों) के मैदान सम्मिलित है।

उतराखंड के प्राकृतिक भू-भाग धरातलीय ऊँचाई, वर्षा की मात्रा में भिन्नता होने के कारण उतराखंड के क्षेत्रीय भाषा मानवीय क्रिया-कलापों में विभिन्नता होना स्वाभावित है। इसीलिए इस प्रदेश को विभिन्न भू-भागों में बाँटा गया है। ये भू-भाग है:

(
क) महान हिमालय
(
ख) मध्य हिमालय
(
ग) दून या शिवालिक
(
घ) तराई व भावर क्षेत्र
(
च) हरिद्वार का मैदानी भू-भाग।


(क) महान हिमालय

महान हिमालय भू-भाग हिमाच्छादित रहता है। यहाँ नन्दा देवी सर्वोच्च शिखर है जिसकी ऊँचाई ७८१७ मीटर है। इसके अलावा कामेत, गंगोत्री, चौखम्बा, बन्दरपूँछ, केदारनाथ, बद्रीनाथ, त्रिशूल बद्रीनाथ शिखर है जो ६००० मीटर से ऊँचे है। फूलों की घाटी तथा कुछ छोटे-छोटे घास के मैदान जिन्हें बुग्याल के नाम से जानते हैं, भी इसमें शामिल हैं। इस भू-भाग में केदारनाथ, गंगोत्री आदि प्रमुख हिमनंद है जो कि गंगोत्री हिमनंद, यमनोत्री हिमनंद, गंगा-यमुना आदि नदियों के उद्गम स्थल है। यह भू-भाग अधिकतर ग्रेनाइट, नीस व शिष्ट शैलों से आवृत है।

(ख) मध्य हिमालय

महान हिमालय के दक्षिण में मध्य-हिमालय-भू-भाग फैला हुआ है जो कि ७५ कि.मी. चौड़ी है। इस भू-भाग में कुमाऊँ के अन्तर्गत अल्मोड़ा, गढ़वाल, टिहरी गढ़वाल तथा नैनीताल का उत्तरी भाग भी सम्मिलित है जो कि ३००० से ५००० मी. तक के भू-भाग में फैले हुए है।

(
ग) दून या शिवालिक का भू-भाग

यह क्षेत्र मध्य हिमालय के दक्षिण में विद्यमान है। इसे बाह्य हिमालय के नाम से भी पुकारते हैं। इस क्षेत्र के अन्तर्गत ६००० मीटर से १५०० मीटर ऊँचे वाले क्षेत्र अल्मोड़ा के दक्षिणी क्षेत्र मध्यवर्ती नैनीताल, देहरादून मिला है। शिवालिक एवं मध्य श्रेणियों के बीच क्षैतिज दूरी पाई जाती है जिन्हें 'दून' कहा जाता है। दून का अर्थ घाटियों से है। इस घाटी के अन्तर्गत २४ से ३२ कि.मी. चौड़ी ३५० से ७५० मी. ऊँची देहरादून की घाटी अत्यन्त महत्वपूर्ण है जो कि वर्तमान समय में उतराखंड की राजधानी है। अन्य दून घाटियों के रुप में देहरादून, पवलीदून, केहरीदून आदि प्रमुख हैं।

(घ) तराई व भावर क्षेत्र

तराई व भावर क्षेत्र के अन्तर्गत हरिद्वार, उधमसिंह नगर के मैदानी क्षेत्र सम्मिलित हैं। इस भाग में पर्वतीय क्षेत्र सम्मिलित है। हालांकि इस भाग में पर्वतीय नदियाँ, नालों, रेतीली भूमि के अदृश्य हो जाती है।

(च) हरिद्वार का मैदानी क्षेत्र

इस क्षेत्र की उत्तरी सीमा ३०० मी. की समोच्च रेखा द्वारा निर्धारित होती है जो गढ़वाल और कुमाऊँ को पृथक करती है। हरिद्वार एक विश्वविख्यात और महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है जहाँ बारह वर्ष के बाद कुम्भ का मेला लगता है।

उतराखंड की जलवायु

जलवायु भिन्नता के कारण वनस्पति, कृषि एवं मानवीय रीति रिवाज़ों पर विशेष प्रभाव पड़ता है। ये जलवायु विभिन्न मौसमों में चक्र के रुप में चलती है। जैसे ग्रीष्म ॠतु जिसे स्थानीय भाषा में ऊरी कहा जाता है जो अंग्रेजी माह के मार्च से प्रारम्भ होकर मध्य जून तक रहती है। मार्च से तापमान में वृद्धि होती है।

नवम्बर से जनवरी तक शीत ॠतु का काल है। नवम्बर से जनवरी तक तापमान निरन्तर घटती रहती है। जनवरी अत्यधिक ठण्डा रहता है।

वर्षा ॠतु मध्य जून से अगस्त तक रहती है। कुल वार्षिक वर्षा का प्रतिशत ७३.३ है। सबसे अधिक वर्षा १२० से.मी. से होती है।

शरद ॠतु सितम्बर के अन्त तक रहती है। इस ॠतु से तापमान गिरने लगता है जो दिसम्बर तक रहता है।

श्रीनगर में १९३ से.मी. वार्षिक वर्षा, देहरादून में २१२ से.मी., नरेंद्र नगर में १८० से.मी., कोटिद्वार में १८० से.मी., टिहरी में १८० से.मी., मंसूरी में २४२ से.मी., नैनीताल में १६८ से.मी., अल्मोड़ा में १३६ से.मी. वर्षा दर्ज की गई है।

धरातलीय विषमताओं के कारण तापमान में विविधताएँ पाई जाती है। हिम क्षेत्रों में इसका प्रभाव अधिक देखने को मिलता है। उतराखंड के पर्वतीय भागों में अप्रैल-मई में दैनिक तापान्तर सबसे अधिक होता है। विभिन्न ऊँचाइयों पर तापमान की दर अलग-अलग होती है।
उतराखंड प्रदेश की नदियाँ

इस प्रदेश की नदियाँ भारतीय संस्कृति में सर्वाधिक स्थान रखती हैं। उतराखंड अनेक नदियों का उद्गम स्थल है। यहाँ की नदियाँ सिंचाई व जल विद्युत उत्पादन का प्रमुख संसाधन है। इन नदियों के किनारे अनेक धार्मिक व सांस्कृतिक केन्द्र स्थापित हैं।

हिन्दुओं की अत्यन्त पवित्र नदी गंगा का उद्गम स्थल मुख्य हिमालय की दक्षिण श्रेणियाँ हैं। गंगा का आरम्भ अलकनन्दा व भागीरथी नदियों से होता है। अलकनन्दा की सहायक नदी धौली, विष्णु गंगा तथा मंदाकिनी है। गंगा नदी भागीरथी के रुप में गोमुख स्थान से २५ कि.मी. लम्बे गंगोत्री हिमनद से निकलती है। भागीरथी व अलकनन्दा देव प्रयाग संगम करती है जिसके पश्चात वह गंगा के रुप में पहचानी जाती है।

यमुना नदी का उद्गम क्षेत्र बन्दरपूँछ के पश्चिमी यमनोत्री हिमनद से है। इस नदी में होन्स, गिरी व आसन मुख्य सहायक हैं।

राम गंगा का उद्गम स्थल तकलाकोट के उत्तर पश्चिम में माकचा चुंग हिमनद में मिल जाती है।

सोंग नदी देहरादून के दक्षिण पूर्वी भाग में बहती हुई वीरभद्र के पास गंगा नदी में मिल जाती है।

झीलें और तालाब

झीलें और तालाब का निर्माण भू-गर्भीय शक्तियों द्वारा परिवर्तन के पश्चात हिमानियों के रुप में हुआ है जो स्थाई है और जल से भरी है। इनकी संख्या कुमाऊँ मण्डल में सबसे अधिक है।

नैनीताल की झील भीमताल जिसकी लम्बाई ४४५ मी. है, एक महत्वपूर्ण झील है। इसके अलावा नैकुनि, चालाल, सातसाल, खुर्पाताल, गिरीताल मुख्य है जो अधिकतर नैनीताल जिले में है।

गढ़वाल के तालाब व झीलें: डोडिताल, उत्तरकाशी, देवरियाताल, रुद्रप्रयाग जनपद, वासुकीताल, अप्सरा ताल, लिंगताल, नर्किंसग ताल, यमताल, सहस्मताल, गाँधी सरोवर, रुपकुण्ड धमो जनपद, हेमकुण्ड, संतोपद ताल, वेणीताल, नचकेला ताल, केदार ताल, सातताल, काजताल मुख्य हैं।

उतराखंड के प्रमुख हिमनदों में गंगोत्री, यमुनोत्री, चौरावरी, बद्रीनाथ हिमनद महत्वपूर्ण है।


उतराखंड प्रदेश की वनस्पतियाँ

वनस्पति की दृष्टि से उतराखंड समृद्ध है। ६५ प्रतिशत भू-भाग वनों से अच्छादित है। ३२ प्रतिशत वन कुमाऊँ मण्डल में है। वनों का सर्वाधिक भाग ३० प्रतिशत उत्तरकाशी जनपद में है। पिथौरागढ़ व चमोली का वन भूमि का कम होना हिमाच्छादित प्रमुख कारण है। कुमाऊँ में ३६ प्रतिशत भाग वन नैनीताल जिले में हैं।

बुग्याल वनस्पति हिमालयी क्षेत्रों में प्रारम्भ होती है। ये हरे-भरे मैदान के रुप में दिखाई देती हैं।

चमोली जनपद के बद्रीनाथ मार्ग पर जोशीमठ के बीच गोविन्दधाम से १५ कि.मी. धांधरिया व धरिये से ४ कि.मी. दूर फूलों की घाटी है। यह बहुत स्मरणीय क्षेत्र है।

प्राचीनकाल से ही यह प्रदेश तपोभूमि के रुप में विख्यात है। केदारनाथ, बद्रीनाष योमनोत्री, गंगोत्री विश्व प्रसिद्ध तीर्थ स्थल यहीं स्थित है। इन्ही तीर्थों में से ताड़केश्वर धाम एक है। कोटद्धार से ताड़केश्वर (महादेव) की दूरी लगभग ६० किलोमीटर है। तीन किलोमीटर में फैले देवदार वृक्षों के बीच में स्थित ताड़केश्वर धाम की खूबसूरती विलक्षण है। श्री ताड़केश्वर महादेव की पूजा एक वर्ष में दो बार होती है। इसके अधीन ८६ गाँव है। गाँव में फसल होने पर सर्वप्रथम मन्दिर में भेंट चढ़ाई जाती है। इसके पश्चात ही गाँव वाले इस्तेमाल करते हैं। लोक मान्यता के अनुसार पौराणिक समय में यहाँ अदृश्य आवाज़ आती थी कि जो भी गलत कार्य करेगा उसे देव शक्ति द्वारा प्रताड़ित किया जाएगा। इसलिए इसका नाम ताड़केश्वर पड़ा। मन्दिर में अदृश्य शिवलिंग है। मन्दिर के उत्तर दिशा में देवदार के वृक्ष का आकार त्रिशूल एवं चिमटा जैसा है तथा पश्चिम दिशा में भी एक त्रिशूल के आकार का देवदार वृक्ष है। इन आश्चर्यजनक वृक्षों को दर्शनार्थी नमन करते हैं।

साग-सब्जी

तरकारियाँ यानि साग-सब्जियाँ यहाँ पर प्राय: सभी होती हैं। खास-खास ये हैं - आलू, प्याज, मूली, घुइयाँ, गडेरी, गावे, ककड़ी कद्द, कोहड़ा (भुज) लौकी, तोरई, चरचिंडे, तरुड़, जमीकंद (सुरण), शलजम, पालक, धनिया, मेथी, मटर, बाकुला, टमाटर, सोया। गोबी, सलाद, हाथीचुक आदि चीजें भी पैदी होती हैं। गेठी व तरुड़ यहाँ की खास सब्जियाँ हैं, जो घर व जंगल में भी होती है।

लाई, उगल, चुआ या चौलाई आदि उन गरीब किसानों की सब्जियाँ है, जिन्हें प्राय: नमक के साथ रोटी खानी पड़ती है। ये लोग जंगलों से 'कैरुवा, लिंगुड़, कोहयड़ा' आदि भी मौसम में ले आते.

खेती-बाड़ी

खेती-बाड़ी का काम यहाँ पर प्राय: प्राचीन ढ़ंग से होता है। पहाड़ों की ढालों में काट-काटकर खेत बनाये गये हैं, जिनमें अनाज बोया जाता है। जहाँ कहीं हो सकता है, पर्वतीय नदियों से नाला काटकर नहर ले जाता हैं, जिन्हें 'गुल' कहते हैं। उनसे सिंचाई होती है। कहीं-कहीं पहाड़ की घाटियों में नदी के किनारे बड़ी उपजाऊ जमीने हैं। ये 'सेरे' कहे जाते हैं। जिस जमीन में पानी से सिंचाई नहीं हो सकती, वह 'उपजाऊ' कहलाती है। गाँव के हिस्से 'तोक, सार, टाना' आदि नामों से पुकारे जाते हैं।

यों तो खेती हल चलाकर होती है। किन्तु कहीं-कहीं ऐसी पर्वतीय जगहें हैं, जहाँ बैल नहीं जा सकते। वहाँ कुदाली (कुटल) से खोदकर खेती करते है । फसलें प्राय: दो होती हैं। तराई भावर में कहीं-कहीं तीन फसलें होती हैं। फसलों में जो-जो चीजें पैदा होती हैं, उनका ब्यौरा नीचे दिया गया है -

खरीफ

अनाज - धान, मडुवा, मानिरा, कौणी, चीणा, चौलाई या चुआ, उगल (फाफरा), मक्का।

तराई भावर में इनके अलावा ज्वार, बाजरा, गानरा आदि भी होते हैं।

दालें - उर्द, भट, गहत, रैंस, अरहर, मूँग । अरहर पर्वतों में नहीं होता।

तिलहन - सरसों, तिल, भंगीरा।

रबी

अनाज - गेहूँ, जौं, भावर में गानरा
दालें - मसूर, मटर (चना भावर तराई में)
तिलहन - अलसी, सरसों।

रुई यहाँ पर यत्र-तत्र कुछ होती है। फसल खरीफ के साथ भाँग भी बोई जाती है, जिसके पत्तों से चरस बनती है। इसके बीज पीसकर जाड़ों में तरकारी में डालकर खाये जाते हैं। ये बड़े गरम होते हैं। भागों के रेसों से रस्सियाँ तथा बोरी का कपड़ा बनता है।

गन्ना कहीं-कहीं पहाड़ों में भी होता है। अदरख, हल्दी, मिर्च, बहुतायत से बाहर भेजे जाते हैं। आलु व घुइयाँ (पिनालु) बहुत होते हैं। बंडे (गडेरी) ८-१० सेर तक होते हैं, और कलकत्ते तक भेजे जाते हैं।

तम्बाकु निजी खर्च के लिए कहीं-कहीं बोया जाता है।

लोगों की मुख्य गुज़र खेती से होती है। पर खेती लोगों के पास थोड़ी-थोड़ी बोने से सब बातों की गुज़र उससे नहीं होती, इसलिए लोग नौकरी करते हैं। तमाम भारत में, खासकर उत्तरी भारत में बहुत से लोग उच्च सरकारी व अन्य नौकरियों में फैले हैं।

कुमाऊँ में कुमाऊँ के लायक अनाज पैदा नहीं होता। तराई-भावर से अनाज पर्वतों को जाता है, किन्तु यह ज्यादातर नगरों को जाता है, जैसे नैनीताल, भवाली, रानीखेत, अल्मोड़ा मुक्तेश्वर आदि। देहात अन्न के बारे में प्राय: स्वावलंबी हैं

फूल

फूल कुमाऊँ में बहुत होते हैं। मुख्य ये हैं - बेला, चमेली, चंपा, गुलाब, कुंज, हंसकली, केवड़ा, जुही (जाई), रजनीगंधा (हुस्नहाना), गेंदा, गुलदावरी, डलिया, गुलबहार, मोतिया, नरगिस, कमल, सूर्य व चन्द्र तथा अन्य प्रकार के। शिलिंग, जिनकी सुगंध दूर तक फैलती है, इन पर्वतों का एक खआस फूल है। यह सितंबर के बाद फूलता है। बुरांस जब बसंत में जंगलों में खिलता है, तो टेसू से कई गुना सुन्दर दिखाई देता है। गुल बाँक भी कई कि का होता है।


अँग्रेजी फूलों में ऐस्टर, बिगोनिया, डलिया, हौलीहौक, कैलोसिया, कौक्स कौम, टफूशिया, स्वीट विलियम, स्वीट सुल्तान, जीरेनियम, पिट्रेनियाँ, जिनियाँ, डेजी, कागजू फूल आदि होते हैं।

देशी फूल खुशबूदार होते हैं। अँग्रेजी फूल देखने में उत्तम होते हैं, पर विशेषत: निर्गेध होते हैं।

हिमालय के पास तथा जंगलों में नाना प्रकार के जंगली फूल खिलते हैं, जिनमें कई बड़े सुन्दर या खुश्बुदार होते हैं। कुछ जहरीले भी होते हैं।

विश्वा प्रसिद पर्यटक स्थल फूलू की घाटी भी इसी खूबसूरत उत्तराखंड राज्य मे शोभायमान है.

फल
घरेलू फल

अखरोट, आलू, बुखार, अलूचा, आम, इमली, अमरुद, अनार, अँगूर, आड़ू, बड़हल, बेर, चकोतरा (इसे अठन्नी भी कहते हैं) चेरी (पयं), गुलाबजामुन, कटहल, केला, लीची, लोकाट, नारंगी, नासपती (गोल, तुमड़िया तथा चुसनी) नींबू, पांगर (chestnut ), पपीता, शहतूत (कीमू) सेब, खरबूज, तरबूज, फूट, खुमानी, काक, अंजीर आदि फल कुमाऊँ में होते हैं।

जंगली फल

आंचू (लाल व काले हिसालू), अंजीर (बेड़ू), बहेड़ा, बोल, बैड़ा, आँवला, बनमूली, बन नींबू, बेर, बमौरा, भोटिया बादाम, स्यूँता (चिलगोजा), चीलू (कुशम्यारु), गेठी, घिंघारु, गूलर, हड़, जामन, कचनार, काफल, खजूर, किल्मोड़, महुआ, मौलसिरी, मेहल, पद्म (पयं), च्यूरा, कीमू, तीमिल, गिंवाई आदि कुमाऊँ के जंगलों में होते हैं।

जड़ी-बूटियाँ


१. छड़ीला या दगद फूल
२. पद्म
३. दारुहल्दी
४. घुड़बच
५. मुलीम
६. पखानवेद
८. रीठा मीठा दाने का
९. दालचीनी, तेजपात
१०. राजिगरा सफेद व काले छीटे का
११. हंसराज सबज
१२. चिरायता मोटा
१३. कोटू फाफरा दाने का
१४. अमलतास फली व गूदा
१५. सुहागा
१६. बिरोजा
१७. समोया
१८. घासीजीरा
१९. तेजपत्ता
२०. मिर्च दड़ा
२१. सींक
२२. सिंगाड़ा मोटे दाने का
२३. बनफ्सा
२४. ब्राह्मी
२५. बिजसार की छाल
२६. बबूल
२७. खैर
२८. कायफल की छाल तथा रसौद, कुचिला, पुनर्नवा रोहिणी, पिपली, तरुड़, गेठी, लीसा आदि।

चाय के बगीचे

बज्यूला, ग्वालदम, डूमलोट, ओड़ा, लोध, दुनागिरि, जलना, बिसनर, गौलपालड़ी, बेनीनाग, डोल, लोहाघाट, झलतोला, कौसानी, स्याही देवी, चौकोड़ी, छीड़ापानी आदि में चाय की खेती होती थी। इन सब में कौसानी, बेनीनाग तथा लोध ने खूब नाम कमाया। कौसानी की चाय अब नाम-मात्र को रह गई है। चौकड़ी व बेनीनाग में अभी बहुत कुछ चाय ठा. देवीसिंह व दानसिंह बिष्ट बना रहे हैं। ये ही सबसे बड़ी चाय के बगीचे यहाँ पर रह गये हैं।

पर्वतीय खेती में अत्यधिक श्रम तथा दक्षता की आवश्यकता होती है। सीढ़ीदार खेतों को पुरातन यंत्रों से जोतना एक कठिन कार्य है। यद्यपि बाढ़ तथा सूखा जैसे प्राकृतिक प्रकोपों से सामान्यत: यह क्षेत्र मुक्त रहा था। परन्तु भूमि के कटाव तथा भूस्नखल जैसी समस्यायें उठती रही।

प्रारम्भ में किसान असुरक्षा के कारण अस्थिर तथा घुमक्कड़ थे। कुछ समय तक एक स्थान पर खेती करने के बाद दूसरे स्थान की तलाश में निकल जाते थे। फसल परिवर्तन की परिवर्तन की परम्परागत व्यवस्था इस क्षेत्र के लिए अत्यनत उपयुक्त थी, बशर्तें भूमि की उर्वरता बनी रहे। ऊँची ढलानों में पैदावार कम होती थी जबकि घाटियों की भूमि अत्यन्त उपजाऊ थी। जहाँ भूमि का छोटे से छोटा भाग भी श्रम पूर्वक जोता जाता था। एटकिन्सन से सोमेश्वर व भीमताल की घाटियों को सम्पूर्ण एशिया में सुन्दरतम व उर्वरतम बताया है। खास जाति के लोग, जो पश्चिमी एशिया से आये थे, मुख्यत: पशुपालन करते थे और अपने पशुओं को चराने के लिए उन्होंने पर्वतों की तलहटी में बसना श्रेयस्कर समझा। बाद में उन्होंने पशुचारण के साथ खेती भी स्वीकार की।

कुमाऊँ में विभिन्न राजवंशों ने राज्य किया। विभिन्न जन जातियों के बीच निरन्तर युद्धों से खेती पर असर पड़ा और भूमि की उर्वरता क्षीण होती चली गयी। चीनी यात्री ह्मवेनसांग, जो हर्ष काल के समय भारत आया था, ने पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र को देखकर लिखा कि यह अत्यन्त सम्पन्न है, भूमि उर्वर है तथा मुख्य फसलें हैं मोटा गेहूँ, जौ, उवा तथा फाफर। यहाँ खेतों में बीजों के अंकुरण तथा फसलों की रक्षा हेतु खेतों के देवता भूमिया (क्षेत्रपाल), वनों के संरक्षण का देवता सैम, पशुधन में वृद्धि का देवता चामू, बधाण, कलबिष्ट इत्यादि।

कृपया ये सब जानकारिया संकलित की गई है, कही कोई भूल चूक हो गई होगी तो माफ़ी चाहता हू.


3 comments:

Mired Mirage said...

बढ़िया जानकारीयुक्त लेख रहा । धन्यवाद ।
घुघूती बासूती

Udan Tashtari said...

उत्तराखण्ड के विषय में इतनी गहन जानकारियाँ आपसे प्राप्त हो रहीं है जो कि वहाँ घूम आने पर भी न मिलती. बहुत आभार. जारी रखें.

pankaj said...

उत्तराखण्ड के संबंध में आपका लेख निश्चित रूप से ग्यानवर्धक है. बहुत-बहुत धन्यवाद इतनी सारगर्भित जानकारी उपलब्ध कराने के लिये...
जय उत्तराखण्ड