Friday, October 12, 2007

उतराखंडी / गड़वाली रामलीला

उतराखंडी (गढ़वाली) राम लीला - अंधेरे मे लुप्त

दोस्तो जैसे आप सभी लोगों को पता है की रामलीला और अन्य धार्मिक, सामाजिक नाटक जिनका मंचन हमारे देश, गॉव और शहरौं मैं बहुत प्राचीन समय से होता चला आ रहा है और हम सभी लोग इनका आनंद बड़े चाव से लेते है . हमारे उतराखंड मे राम लीला का एक अलग ही महत्व है और इसकी एक अलग ही पहिचान है. वैसे तो राम लीला का मंचन देश के हर भाग मे होता होगा लेकिन जो राम लीला हमारे गॉव या कहे की उतराखंड मे होती है, उसकी एक अलग ही पहिचान और एक अलग ही स्वाद है. अभी तक आप लोगों ने केवल हिन्दी काब्या और गद्य मे ही राम लीला देखी होगी और सुनी होगी लेकिन क्या कभी आपने अपनी बोली मे राम लीला का स्वाद लिया? हमारे उतराखंड की अपनी बोली मे कभी आपने राम लीला का मंचन होते हुए देखा? जहा तक मे समझता हू किसी ने भी अभी तक अपनी बोली मे इसका स्वाद नही लिया होगा, लेकिन दोस्तो मे अपने को बड़ा भाग्यवान मानता हू की मैंने अपनी बोली मे इसका स्वाद लिया हुआ है और कई बार हम लोग इसका मंचन अपने गॉव मे कर चुके है.

मैं सीधे शब्दों मे आप लोगों से कहना चाहता हू की हमारे गॉव मे एक ऐसा ब्याक्तित्व है जिन्होंने इसके बारे मैं सोचा और इसको अपनी बोली मे लिखने का प्रयास किया और अपने कार्य मे सफल भी हुए. उनका नाम है "श्री सर्वेश्वर दत्त कान्डपाल". उन्होंने लव कुश काण्ड का अपनी बोली मे बड़ा ही सज्जीव और मधुर वर्णन किया है. मुझे पूरा विश्वास है की जब आप लोग एक बार इसको देखेंगे और सुनेंगे तो जरूर आप लोग इसको पसंद करेंगे और तारीफ करेंगे.

मैं यहा कुछ अंश अपनी याददास्त के आधार पर समेटने की कोशिश कर रहा हू.

कुछ अंश इस प्रकार है.

जब सीता सवाय्म्बर की तयारी होंदी और सवायाम्बर मा शिवजी कु दनुष क्वे नि तोडी सक्दु , तब रजा जनक बहुत ही ज्यादा निराश ह्वे जान्दा और ग़ुस्सा भी ह्वे जान्दा , तब सी क्या बोल्दा

जवा बै जवा तुम सब घौर जवा, तुम सब लोडया बैक छीन, बात करीदां लंबी चोडी, दयोंन्दा खोले पटाल फ़ोडी

जब सीता धनुष को उठाकर कहीं दूसरी जगह रख लेती हैं. तब दोनों के बीच का सम्वाद्-

जनक - शिवजी को प्यारू धनु कैन उठाये बाबा, बोला री बाबा ईथै कैन उठाये

पीडयौं बीतीक च्ल्यां, कभी नी हिलाये अज्यौं

जादू कु हाथ फ़ैरी,

कैन उठाये

सीता - मिन सदानी मंदिर मा सूनी छये, बात जु

शिवजी शंकर को धनु भारी छयो जाति को

कुणजै की लाटी ज्न, मीन उठाये बाबा

जनक - बोला री बाबा ईथै कैन उठाये

जब राम, लक्षम्ण और सीता वन में जाते है , तब राम कहते हैं-

देख भुला लक्षमन तू ,

कन स्वाणा बौंण छन

डाली छिन बोटी छिन

घुघुती हैलास छिन

जब शूर्पणखा राम के सामने शादी का प्रस्ताव रखती है, तब राम लक्षम्न की ओर संकेत करके शूर्पणखा से कहते हैं

झपन्याली जटा तेरी रुग बुग्या सी आंखी

कती स्वाणी लगदी,

छोटु भुला लक्षम्न भलु गौरु भलु स्वाणु

भलु बाणु गौरु लगदु

जब पहली बार सीता राम और लक्षम्न को बाग में देखती है, तो अगले दिन अपनी सखियौं से कहती है

यार दिदी ब्याली छा

नौना दवी बाग मा

गौरा छया सौला छया,

रौतेला राग मा

और बहुत कुछ आगे है पर मुझे भी याद नही है.

अगर आप लोगों मे से कोई भी इस कार्यक्रम का आयोजन करना चाहता है, वो मुझसे से समपर्क कर सकता है

मेरा ई मैल एड्रेस है - sckkandpal@gmail.com

मोबाइल नम्बर

धन्याबाद


1 comments:

Shrish said...

मैंने गढ़वाल की रामलीला एक दिन देखी जिन्दगी में बस। आज रामलीला के नाम पर भौण्डा प्रदर्शन होता है सब जगह, ऐसे में उत्तराखण्ड की रामलीला सुकून देती है।