Thursday, October 11, 2007

बांट ले खुशियां तू

दोस्तो जैसे अपको मेरे परिचय से पता ही चल गया होगा की मैं भारत के एक बहुत छोटे और सुंदर राज्य उत्तराखंड से सम्बन्ध रखता हू और उत्तराखंड की छेत्रिय बोली मैं अपने मन के भावौं को कविता के माधय्म से आप लोगों के सामने ब्य्क्त कर रहा हू. मेरे जो भी उतराखंडी भाई बहिन इस कविता को पड़ रहे होंगे वे सब अच्छी तरह समझ गए होंगे की मैं क्या कहना चाहता हू और मेरा अपने देश के लोगों से क्या विनती है. यह कविता हिन्दी और पहारी बोली का सयुंक्त रूप है और इसी कविता के साथ मैं अपने ब्लॉग का श्री गणेश कर रहा हू.

हाथ जोड़ीक करले पूजा,
मुंड झुके दे आज तू

कुछ नि होलु ए मनखी
,
छोड़ी दे घमंड तू

यखी तेरी माया रोली,
धन सगुणी पुंगणी हे

मुटठी बोटीक आयी इख
,
हाथ पसारी जोलु हे

ना बडू यख ना छोटु कोई,
देह सब समान च

धर्म सबका अपना अपना
,
खून सबको लाल च

पंच तत्त्वौं की काया तेरी,
ना कर अभिमान तू

इक भी त्त्वैते छोड़ी दयोली
,
ह्व्वे जालु हे खाक तू


भूखे की भूख मिटे दे
प्यासे की प्यास तू

दुखियारौं को दुख मिटे दे

कमैं ले इ पुन्या तू


ना कर तू ईश्या द्वेष
,
वाणी को हराश तू

चार घड़ी की सांस तेरी

बांट ले खुशियां तू





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