Tuesday, May 13, 2008

21 हजार श्रद्धालु कर चुके गंगोत्री-यमुनोत्री के दर्शन

गंगोत्री व यमुनोत्री धाम के दर्शन करने वाले तीर्थ यात्रियों की भीड़ में इस साल जोरदार बढ़ोत्तरी हुई है। सात दिन में 21 हजार से अधिक यात्री स्नान व पूजा-अर्चना कर चुके हैं। भीड़ को संभालने में पुलिस को रात-दिन पसीना बहाना पड़ रहा है।

विश्व प्रसिद्ध धाम गंगोत्री व यमुनोत्री के कपाट खुले अभी एक सप्ताह हुआ है। इस साल तीर्थ यात्रियों की संख्या में जबरदस्त वृद्धि नजर आ रही है। गत वर्ष की अपेक्षा तीन गुना अधिक तीर्थ यात्री अभी तक दर्शनों के लिए पहुंचे है। यात्रियों को पार्किग की समस्या और वाहनों के प्रवेश को लेकर परेशानी झेलनी पड़ रही है। हनुमानचट्टी से आगे बड़े वाहन प्रवेश नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में प्रीपेड व्यवस्था के तहत हनुमानचट्टी से जानकी चट्टी तक तीर्थ यात्रियों को जीप व टैक्सी से पहुंचाया जा रहा है। पुलिस अधीक्षक नीलेश आनंद भरणे ने कहा कि प्रीपेड व्यवस्था के तहत 60 टैक्सियां उपलब्ध हैं। इन टैक्सियों की संख्या बढ़ाए जाने के लिए ऋषिकेश व हरिद्वार संपर्क किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यात्रा मार्ग पर पुलिस को अबके कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। यात्रियों को सूचना व सुरक्षा पुलिस का महत्वपूर्ण दायित्व है। एसपी ने बताया कि यमुनोत्री यात्रा पर प्रतिदिन 3 हजार से अधिक यात्री पहुंच रहे हैं। गंगोत्री में प्रति दिन चार हजार से अधिक यात्री दर्शनों को पहुंच रहे हैं। ऐसे में गंगोत्री की वाहन पार्किंग व्यवस्था तंग नजर आ रही है। पुलिस अधीक्षक नीलेश आनंद भरणे ने कहा कि गंगोत्री की ओर 130 बडे़ वाहन और 120 छोटे वाहनों की आवाजाही नित्य हो रही है। करीब 250 वाहन गंगोत्री पहुंच रहे है। गंगोत्री में पार्किंग व्यवस्था न होने से स्थिति विकट हो गई है। पुलिस अधीक्षक ने कहा कि इसका समाधान भी तलाश लिया गया है। कोशिश की जा रही है कि भैरव घाटी से प्रति दिन 30 वाहन ही आगे जाएं। 30 के बाद जाने वाले वाहनों को भैरवघाटी में रोककर वहां से प्रीपेड टैक्सी के माध्यम से यात्रियों को गंगोत्री की रवाना किए जाने की व्यवस्था पर विचार किया जा रहा है।

सोजन्य से जागरण न्यूज़

Monday, May 12, 2008

उत्तराखंड में प्रमुख

उत्तराचंल की प्रमख नदियां
गंगा, यमुना, काली, रामगंगा, भागीरथी, अलकनन्दा, कोसी, गोमती, टौंस, मंदाकिनी, धौली गंगा, गौरीगंगा, पिंडर नयार(पू) पिंडर नयार (प) आदी प्रमुख नदीयां हैं।

उत्तराचंल के प्रमुख हिमशिखर

गंगोत्री (6614), दूनगिरि (7066), बंदरपूछ (6315), केदारनाथ (6490), चौखंवा (7138), कामेत (7756), सतोपंथ (7075), नीलकंठ (5696), नंदा देवी (7817), गोरी पर्वत (6250), हाथी पर्वत (6727), नंदा धुंटी (6309), नंदा कोट (6861) देव वन (6853), माना (7273), मृगथनी (6855), पंचाचूली (6905), गुनी (6179), यूंगटागट (6945)।

उत्तराचंल के प्रमुख ग्लेशियर

1. गंगोत्री 2. यमुनोत्री 3. पिण्डर 4. खतलिगं 5. मिलम 6. जौलिंकांग, 7. सुन्दर ढूंगा इत्यादि।

उत्तराचंल की प्रमुख झीलें (ताल)

गौरीकुण्ड, रूपकुण्ड, नंदीकुण्ड, डूयोढ़ी ताल, जराल ताल, शहस्त्रा ताल, मासर ताल, नैनीताल, भीमताल, सात ताल, नौकुचिया ताल, सूखा ताल, श्यामला ताल, सुरपा ताल, गरूड़ी ताल, हरीश ताल, लोखम ताल, पार्वती ताल, तड़ाग ताल (कुंमाऊँ क्षेत्र) इत्यादि।

उत्तराचंल के प्रमुख दर्रे

बरास- 5365मी.,(उत्तरकाशी), माणा- 6608मी. (चमोली), नोती-5300मी. (चमोली), बोल्छाधुरा-5353मी.,(पिथौरागड़), कुरंगी-वुरंगी-5564 मी.( पिथौरागड़), लोवेपुरा-5564मी. (पिथौरागड़), लमप्याधुरा-5553 मी. (पिथौरागड़), लिपुलेश-5129 मी. (पिथौरागड़), उंटाबुरा, थांगला, ट्रेलपास, मलारीपास, रालमपास, सोग चोग ला पुलिग ला, तुनजुनला, मरहीला, चिरीचुन दर्रा।

उत्तराचंल के वन अभ्यारण्य

1. गोविन्द वन जीव विहार 2. केदारनाथ वन्य जीव विहार 3. अस्कोट जीव विहार 4. सोना नदी वन्य जीव विहार 5. विनसर वन्य जीव विहार

उत्तराखण्ड के लोक गीतः

गीत और संगीत उत्तराखण्ड संस्कृति का अनादिकाल से महत्तवपूर्ण अंग रहा है। हर मौकों पर गीत गाए जाते हैं। यहाँ तक कि जब पर्वतीय महिलाएँ घास काटने जंगलों में जाती हैं वहां भी लोकगीत गाये या गुनगुनाए जाते हैं। कुछ लोक गीतों का विवरण इस प्रकार हैः-

मांगलः- यह गीत शभ कार्यों एंव शादी विवाह के मौकपर गाये जाते हैं।
जागरः- जागर देवताओं के गीत है जैसे- विनसर, नागर्जा, नरसिंह, भैरों, ऐड़ी, आछरी, जीतू, लाटू, भगवती, चण्डिका, गालू देवता आदी।
पंडोवः - पंडोव गढ़वाली लोक साहित्य के मौलिक महाकाव्य तथा खण्ड काव्य है। इन गीतों में ठाकुरी राजाओं के वीर गाथाओं को गाया जाता है। जैसे तीलूरोतेली, जोतरमाला, पत्थरमाला, नौरंगी, राजुला, राजा, जिते सिंह आदी।
चौफुलाः - यह नृत्य चांदनी रात में गोल दायरे में घूमकर पुरूष तथा महिलाएं मिलकर गाते हैं। इसमें प्रकृति तथा उत्सवों के गीत गाये जाते हैं। यह नृत्य काफी कुछ गुजरात के “ गरबा ” नृत्य से मिलता है।
खुदेड़ गीतः - करूणात्मक शैली के गीत “खुदेड़” हैं। यह गीत माँ-बाप, भाई-बहन, सखी, वन, पशु-पक्षी, नदी, फल-फलों की स्मृति ताजा कराते है और इनकी याद आ जाने पर सबसे मिलने की चाह पैदा हो जाती है तथा न मिल पाने की स्थिति में ये गीत मुखार बिन्दु पर फूट पड़ते हैं।
चौमासाः - वर्षा ऋतु में हिमालय की गोद में बसे उत्तराखण्ड का सौंदर्य निराला होता है। इस ऋतु के दिनों में अक्सर परदेश में गये साथी की ज्यादा याद सताती है तब यह गीत अपने आप मुखार बिन्दु पर फूट पड़ते हैं।
थड़याँ - यह नृत्य बसंत पंचमी से लेकर विषुवत सक्रान्ति तक नेक सामाजिक व देवताओं के नृत्य गीतों के साथ खुले मैदान में गोलाकार होकर स्त्रियों द्वारा किया जाता है।


सोजन्य से odaligaon

हिमालय की गोद में मन्दिर

गंगोत्री

गंगा के उद्गम के पास देवी गंगा का स्थान, गंगोत्री चार धाम यात्राओं में से एक तीर्थ है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में मौजूद यह मंदिर 18 वीं शताब्दी का है। हिन्दू पौराणिक कथा के अनुसार स्वर्ग की बेटी देवी गंगा ने राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर उनके पुरखों के पाप धोने के लिए नदी का रूप धारण किया था। गंगा नदी के इस तीव्र बहाव को कम करने के लिए भगवान शिव ने इस बहाव को अपनी जटाओं में ले लिया। गंगोत्री में बहने वाली भगीरथी नदी का बहाव जब कम होता है तब नदी में एक प्राकृतिक चट्टान दिखाई देती है।

कहा जाता है इसी चट्टान में बैठकर भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में समाया था। गंगोत्री से गंगा का उद्गम स्थल गौमुख, 17 किमी पैदल गंगोत्री ग्लेशियर के साथ चलकर दिखाई पड़ता है। यहां पहुंचने के लिए नजदीकी एयरपोर्ट जॉली ग्रांट और देहरादून है। अगर ट्रेन से जाना हो तो हरिद्वार या ऋषिकेश जाना होगा। हरिद्वार से गंगोत्री 277 किमी दूर है। ठहरने के लिए होटल से लेकर आश्रम तक की व्यवस्था है। यहां जाने का सही वक्त मई से अक्टूबर तक है।

ज्वालादेवी

हिमाचल प्रदेश की अलौकिक खूबसूरती में बसा ज्वालादेवी मंदिर बड़ी संख्या में सैलानियों को अपनी ओर खींचता है। कांगड़ा जिले की घाटी से दक्षिण में 34 किमी दूर ज्वालादेवी 51 शक्तिपीठों में से एक है। मंदिर ज्वालादेवी के उग्र रूप को समर्पित है। माना जाता है कि सती की जीभ, जो पवित्र ज्वाला का चित्रण करती है इसी जगह गिरी थी। मंदिर में विशालकाय फोल्डिंग चांदी के दरवाजे हैं। मंदिर का गुंबद सोने की तरह चमकने वाले पदार्थ की प्लेटों से बना है। पूजा के लिए मंदिर का आंतरिक हिस्सा चौकोर आकार में बना है। प्रांगण में एक चट्टान है जो कि देवी महाकाली के उग्र मुख का संकेत देती है।

यहां पहुंचने के लिए नजदीकी एयरपोर्ट कुल्लू और रेलवे स्टेशन कालका है। कुल्लू से ज्वालादेवी 23 किमी और कालका से 90 किमी दूर है। दिल्ली से ज्वाला देवी की दूरी 343 किमी है। ठहरने के लिए होटल, आश्रम और धर्मशालाएं उपलब्ध हैं। यहां साल में कभी भी जाया जा सकता है।

पाताल भुवनेश्वर

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट तहसील से 14 किमी दूर पाताल भुवनेश्वर का मंदिर धार्मिक आस्था के साथ ही कौतूहल का भी केंद्र है। गुफा में मौजूद मंदिर भगवान शिव का है। कहा जाता है ब्रह्मा स्वर्ग के दूसरे देवताओं के साथ यहां शिव अराधना के लिए आते हैं। मंदिर के अंदर संकरे पानी की धारा से होते हुए गुफा में जाना होता है। गुफा के अंदर जाने का मुख्य रास्ता भी कई छोटी गुफाओं का रास्ता दिखाता है। गुफा में घुसते ही शुरुआत में नरसिम्हा भगवान के दर्शन होते हैं। कुछ नीचे जाते ही चट्टान से बने शेषनाग नजर आते हैं।

शेषनाग की रीढ़ से होते हुए गुफा के मध्य तक जाया जा सकता है, जहां गणेश जी मिलते हैं। उनके ऊपर गुफा की छत में चट्टान से बना कमल का फूल है, जिससे पानी टपकते हुए मूर्ति पर पड़ता है। ये गुफाएं चूना पत्थर की चट्टानों से बनी हैं। इनसे टपकता पानी कई तरह के आकार बनाता है। कहा जाता है कि ये आकार देवी-देवताओं को प्रतिरूपित करते हैं। यहां जाने के लिए ट्रेन से काठगोदाम या टनकपुर जाना होगा। उसके आगे सड़क के रास्ते ही सफर करना होगा। दिल्ली से यह 550 किमी दूर है। रहने के लिए गंगोलीहाट में होटल और धर्मशालाएं हैं। साल में जब भी मन करे यहां जाया जा सकता है।

तुंगनाथ

उत्तराखंड के चमोली जिले का करीब हजार साल पुराना तुंगनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। समुदतल से 3600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित तुंगनाथ सबसे ऊंचाई में बसा मंदिर माना जाता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए चोपता गांव से 3-4 किमी की पैदल जाना होता है। यह रास्ता घने और ऊंचे जंगलों से गुजरता है। गर्मियों में यहां रास्ते भर खूबसूरत जंगली फूल फैले रहते हैं।

कहा जाता है कि केदारनाथ में भगवान शिव से मिलने के इच्छुक पांडव और इस भेंट से बचते भगवान शिव के बीच संघर्ष के दौरान भगवान शिव की भुजाएं तुंगनाथ में गिरी, इसीलिए यहां यह पवित्र मंदिर बना। मंदिर के प्रांगण में भगवान शिव का मुख्य मंदिर है। साथ ही, हिमालय पुत्री और शिव अर्धान्गिनी पार्वती का भी मंदिर यहां मौजूद है। यहां से चौखम्बा, त्रिशूल, नंदादेवी चोटी अलौकिक दिखती हैं। यहां पहुंचने के लिए नजदीकी रेलवे स्टेशन हरिद्वार और ऋषिकेश है।

दिल्ली से तुंगनाथ की दूरी 455 किमी है। ठहरने के लिए तुंगनाथ में ही व्यवस्था है या फिर आप चाहें तो नजदीकी चोपता में भी रुक सकते हैं। यहां जाने का सबसे सही वक्त मई से अक्टूबर के बीच का है। बरसात में यहां जाने से बचें।

सोजन्य सनवभारत टाइम्स

Thursday, May 8, 2008

खुल गये बदरी विशाल के कपाट

हिंदू आस्था के केंद्र भगवान बदरी विशाल के कपाट शुक्रवार से श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गये है. आज ठीक सुबह ८:१५ मिनट पर भगवान् बद्रिशाल के कपाट मन्दिर के रावल द्वारा वैदिक मंत्रोचार के साथ सभी श्रधालों के लिए लगभग ६ महीने के लिए द्रशनार्थ के लिए खोल दिए है. अखंड ज्योति के प्रथम दर्शन के लिए बदरी विशाल के प्रांगन में हजारों की संख्यां में श्रद्धालु पड़ाव डाले हुए थे. विभिन टीवी समाचार चैनलों द्वारा भगवान् बद्रीविशाल के प्रथम दर्शन का सीधा प्रसारण भी किया गया.

अपनी भक्ति को करायें पहाडों (उत्तराखंड) की सैर

अगर आप गर्मियों की छुट्टियों का आनंद लेना चाहते हैं तो पहाड़ चले आइए। इन पहाड़ों में आपको प्रकृति का रोमांच और भक्ति का अध्यात्म दोनों मिलेंगे। मैदान की चिलचिलाती गर्मी से दूर आपको और आपके परिवार को सुहावने मौसम के बीच पहाड़ों में बसे मंदिरों की सैर जरूर रास आएगी। देवभूमि कहे जाने वाले पहाड़ के कुछ जाने-अनजाने मंदिरों के दर्शन आपके जीवन में कई यादगार लम्हे जोड़ देंगे। मनोरम पहाड़ों में बसे कुछ गौरवशाली मंदिरों की जानकारी आपके सामने है।

केदारनाथ

भारत के उत्तर-पश्चिम में हिमालय की चोटी में बसे केदारनाथ मंदिर की अपनी अलग ही गरिमा है। केदारनाथ शिव के 12 ज्योतिर्लिन्गों में से एक है। मंदाकिनी नदी के शीर्ष के नजदीक 3584 मीटर की उंचाई पर बसा ये मंदिर एक पवित्र तीर्थस्थान है। हर साल भारी संख्या में तीर्थयात्री और संसार के पर्यटक भक्ति-भाव और रोमांच लिए यहां घूमने आते हैं।

महाभारत के अनुसार, कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद अपनी हिमालय यात्रा के दौरान पांडव भगवान शिव से मिलना चाहते थे। पर भगवान शिव इस भेंट के इच्छुक नहीं थे, क्योंकि पांडव गोत्र हत्या के दोषी थे। उन्हें आते देख शिव ने बैल का भेष धारण कर लिया। पर जब उन्हें लगा कि उनके बदले भेष ने कोई काम नहीं किया, तो बैल जमीन के नीचे कूदने की कोशिश करने लगा।

भीम ने फुर्ती से बैल के पीछे के पैर पकड़ लिए। इस जद्दोजहद में भगवान शिव के शरीर के विभिन्न हिस्से केदारनाथ में अलग-अलग जगह फैल गए। नाभि सहित धड़ मद्महेश्वर में, भुजाऐं तुंगनाथ में, चेहरा रुद्रनाथ में और जटाऐं कप्लेश्वर में। भारत पंच केदार ट्रैक इन पांचों तीर्थस्थानों का ही भ्रमण है।

केदारनाथ की यात्रा गौरीकुंड से 14 किमी की पैदल यात्रा है। जंगलचट्टी, रामबाड़ा और गरुड़ की खूबसूरती से होते हुए यहां पहुंचा जाता है। यात्रा में रामबाड़ा से 1 किमी पहले एक अनुपम भव्य झरना भी मिलता है।

मंदिर का ऐश्वर्य उसकी वास्तुकला में दिखता है। 8 वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा निर्मित वर्तमान मंदिर पांडवों द्वारा बनाए गए मंदिर के पास ही है। मंदिर के पूजागृह में कई देवी-देवताओं और भारतीय पौराणिक दृष्य दिखते हैं। मंदिर के दरवाजे के बाहर नंदी बैल की प्रतिमा भी है।

यात्रा का समय- भारी बर्फबारी की वजह से मंदिर नवम्बर से अप्रैल तक बंद रहता है। मंदिर के पट मई में खुलते हैं।

निकटतम हवाईअड्डा- जॉली गांट, देहरादून, रेलवे स्टेथन- ऋषिकेथ, कोटद्वार, देहरादून।

दूरी- देहरादून से केदारनाथ- 239 किमी, कोटद्वार से केदारनाथ- 250 किमी, ऋषिकेथ से केदारनाथ- 221 किमी।

यात्रा शुरू करने का स्थान गौरीकुंड ऋषिकेश, कोटद्वार, देहरादून से सड़क से जुड़ा हुआ है। बस सेवा और प्राइवेट टैक्सी सेवा यात्रा के लिए उपलब्ध है। गौरीकुंड से या़त्रा के लिए घोड़े, डांडी उपलब्ध है।

ठहराव- जंगलचट्टी में धर्मशालायें, प्राइवेट होटल; केदारनाथ में धर्मशालायें

बद्रीनाथ

नर नारायण की गोद में बसा बद्रीनाथ नीलकण्ड पर्वत का पार्श्व लिए पर्यटकों को बहुत सुहाता है। विशाल बद्री के नाम से जाने वाला बद्रीनाथ पंच बद्री में सबसे बड़ा है। भगवाल विष्णु का ये स्थल आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा बनाया गया। देश को एक सूत्र में बांधने के लिए शंकराचार्य ने चारों दिशाओं में चार तीर्थस्थल बनाए- उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम, पूर्व में जगन्नाथपुरी और पश्चिम में द्वारिकापुरी ।

माना जाता है, पाण्डव अपनी स्वर्ग की यात्रा में जाते समय यहां से और बॉर्डर के अन्तिम गांव माणा से गुजरे थे। यह भी माना जाता है कि माणा में मौजूद एक गुफा में व्यास ने महाभारत लिखी थी।

बद्रीनाथ में 130 डिग्री सैल्सियस खौलता तप्त कुंड और सूर्य कुंड है जहां पूजा से पूर्व स्नान आवश्यक समझा जाता है।

यात्रा का समय- मई से अक्टूबर,।

रेलवे स्टेथन- ऋषिकेथ, देहरादून।

यात्रा का रूट- हरिद्वार से देवप्रयाग, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, चमोली होते हुए जोशीमठ।

दिल्ली से बद्रीनाथ नेशनल हाईवे की कुल दूरी- 538 किमी।

ठहराव- बद्रीनाथ में सरकारी और कई प्राइवेट होटल, आश्रम और धर्मशालायें मौजूद।

यमुनोत्री

उत्तरकाथी जिले में समुद्रतल से 3235 मी. ऊंचाई पर स्थित है, देवी यमुना का मंदिर- यमुनोत्री। यमुनोत्री मंदिर का निर्माण 19 वीं शताब्दी में जयपुर की महारानी गुलारिया ने कराया था। चार धामों में से एक धाम यमुनोत्री से यमुना का उद्गम मात्र एक किमी की दूरी पर है। यहां बंदरपूंछ चोटी (6315 मी ) के पश्चिमी अंत में फैले यमुनोत्री ग्लेशियर को देखना अत्यंत रोमांचक है।

हिन्दू मान्यता के अनुसार, सूर्य की बेटे यामा ने कहा था कि जो व्यक्ति उसकी बहिन यमुना के नदी स्वरूप में स्नान करेगा, उसे वह कभी परेथान नहीं करेगा।

हनुमानचट्टी से 13 किमी पैदल चलकर मंदिर तक पहुंचा जाता है। मंदिर के दर्शन से पहले चट्टान से बनी दिव्य शिला की पूजा होती है। मुख्य पूजा से पहले जमुनाबाई कुंड में पवित्र स्नान होता है।

यमुनोत्री में बर्फीले ग्लेशियर के पास ही खौलते कुंड भी हैं, जिनमें प्रमुख सूर्य कुण्ड है। इस कुण्ड में पोटली में चावल या आलू बांधकर पानी में डालकर पकाया जाता है। ये ही मंदिर का प्रसाद माना जाता है।

यात्रा का रूट- हरिद्वार से चम्बा, टिहरी, उत्तरकाशी होते हुए चार धाम कैम्प गंगोत्री।

कुल दूरी- हरिद्वार से 295 किमी।

ठहराव- जंगलचट्टी हनुमानचट्टी में निगम रेस्ट हाउस, धर्मशालाऐं।

चार धाम यात्रा यानी बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री यात्रा के लिए कई प्राइवेट टूर पैकेज मौजूद हैं। इन यात्राओं का खर्चा हर टूर एजेन्सी का अलग-अलग है, जैसे 12 दिन का एक व्यक्ति का टूर चार्ज लगभग 25000 रुपये।

सोजन्य से नवभारत टाईम्स

Wednesday, May 7, 2008

अठ्ठारह मई को खुलेंगे चतुर्थ केदार के कपाट

चतुर्थ केदार श्री रूद्रनाथ धाम में कपाट खुलने की धार्मिक तैयारियां आरंभ हो चुकी हैं लेकिन अभी तक यात्रा मार्ग पर न तो पानी के पुख्ता इंतजाम हैं और न ही पैदल मार्ग का निर्माण पूर्ण हो पाया है। स्थानीय लोगों ने जिलाधिकारी को ज्ञापन देकर तत्काल सुविधाएं मुहैया कराने की मांग की है। 18 मई को श्री रूद्रनाथ के कपाट खुलने हैं। 14 मई को भगवान की डोली गोपीनाथ मंदिर से बाहर निकाली जाएगी। पुजारी, मंदिर समिति सहित स्थानीय लोग धार्मिक तैयारियों में जुटे हुए हैं। लेकिन रूद्रनाथ में पानी व पैदल रास्ते की समस्या बनी हुई है। पनार तक पैदल मार्ग पूर्ण हो चुका है लेकिन वहां से आगे के रास्ते चट्टानी हैं। हर बार लोग पौराणिक नारद कुंड से एक-एक बूंद पानी मंदिर तक पहुंचाकर जलाभिषेक करते हैं।

सिद्धनाथ मंदिर में भी श्रद्धालु उमड़


टनकपुर (चम्पावत)। इन दिनों उत्तर भारत के सुप्रसिद्ध मां पूर्णागिरि धाम में भारी संख्या में श्रद्धालु उमड़ रहे है। गर्मी के चलते दिन की अपेक्षा रात्रि के समय अधिक संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे है। इधर नेपाल के सिद्धनाथ मंदिर में भी काफी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे है।

पिछले चार दिनों से मां पूर्णागिरि धाम में श्रद्धालुओं की संख्या में इजाफा हुआ है। शारदा नदी में भी इन दिनों स्नान के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु उमड़ रहे है। शारदा घाट में किसी अप्रिय घटना को देखते हुए पीएसी की तैराक टीम भी तैनात की गई है। इधर नेपाल के महेन्द्र नगर व ब्रह्मदेव मंडी स्थित सिद्धनाथ मंदिर में भी भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे है। जिसके कारण नेपाल के दोनों बाजारों में चहल- पहल भी बढ़ गई है। मेला क्षेत्र में जगह-जगह भंडारे का भी आयोजन किया जा रहा है।



अखिलतारिणी में देवी भक्तों का जमावड़ा


लोहाघाट (चम्पावत)। मां अखिलतारिणी धाम में चल रहे 108 दिवसीय महायज्ञ के पारायण की तैयारियां शुरू हो चुकी है। यज्ञ स्थल पर यज्ञ वेदियों की स्थापना के साथ धार्मिक महत्व के पौधों को रोपा जा रहा है। 8 मई गुरुवार को अक्षय तृतीय के दिन यहां यज्ञ का पारायण हो जायेगा। इन दिनों महायज्ञ आयोजन समिति की ओर से लक्ष्य रुद्री पाठ का आयोजन कर आहुतियां दी जा रही है। इसके अलावा द्वादशाक्षरी मंत्र, गायत्री मंत्र व मृत्युंजय महामंत्रों की आहुतियां 71 यज्ञ आचार्यो द्वारा दी जा रही है।

वेद मंत्रोच्चार के साथ खुले श्रद्धा व आस्था के कपाट

करोड़ों हिंदुओं की आस्था के केंद्र केदारनाथ धाम के साथ ही बुधवार को गंगोत्री व यमुनोत्री धाम के कपाट श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए गए। कपाट खुलने के शुभ अवसर पर जय बाबा केदार के उद्घोषों से संपूर्ण केदारपुरी गूंज उठी तो दूसरी तरफ, गंगोत्री व यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने से पूर्व हजारों श्रद्धालुओं ने गंगा व यमुना में डुबकियां लगाकर पुण्य अर्जित किया। बद्री-केदार मंदिर समिति के उप मुख्य कार्याधिकारी जेपी नंबूरी ने बताया कि पहले दिन केदारपुरी में भोले के दर्शन के लिए पांच हजार चार सौ चौबीस यात्री पहुंचे।

रुद्रप्रयाग जिले में स्थित शिव के ग्यारहवें ज्योर्तिलिंग भगवान केदारनाथ के कपाट वैदिक पूजा-अर्चना एवं मंत्रोच्चार के साथ सुबह आठ बजे भक्तों के दर्शनार्थ खोल दिए गए। कपाट खुलने के समय केदारपुरी का मौसम सर्द बना रहा और हल्की बूंदा-बांदी भी हुई। इसके बावजूद यहां सुबह से ही हजारों भक्तों की भीड़ भोले के प्रथम दर्शनों के लिए कतार में लगी रही। निर्धारित समय आठ बजते ही केदारनाथ के रावल 1008 भीमा शंकरलिंग मंदिर प्रांगण में पहुंचे और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ ग्रीष्म काल के लिए भगवान केदारनाथ के कपाट भक्तों के लिए खोल दिए गए। कपाट खुलने के अवसर पर सूबे के पर्यटन मंत्री प्रकाश पंत, सचिव राकेश कुमार, पतंजलि योगपीठ के आचार्य बालकृष्ण, मुनि चिदानंद महाराज, केदारनाथ क्षेत्र की विधायक आशा नौटियाल, मंदिर समिति की उपाध्यक्ष दर्शनी देवी, उप मुख्य कार्याधिकारी जेपी नंबूरी, जिलाधिकारी सचिन कुर्वे, एसपी नीरु गर्ग, मंदिर के पुजारी राजशेखर लिंग सहित हजारों की संख्या में भक्त मौजूद थे। उत्तारकाशी जिले के अंतर्गत विश्व प्रसिद्ध गंगोत्री व यमुनोत्री धाम के कपाट आज वेद मंत्रोच्चार के साथ पूर्वाह्न साढ़े ग्यारह बजे भक्तों के दर्शनार्थ खोले गए। मंगलवार को गंगोत्री की डोली मुखवा गांव से गंगोत्री की ओर चली। भैरवघाटी स्थित भैरव मंदिर में रात्रि विश्राम के बाद सुबह डोली का गंगोत्री की ओर प्रस्थान हुआ। परंपरागत वाद्य यंत्र ढोल दमाऊ व सैकड़ों भक्तों के साथ गंगा की डोली सुबह गंगोत्री पहुंची। यहां विधिवत पूजा-अर्चना के बाद गर्भगृह के कपाट खोले गए। बुधवार की सुबह यमुनोत्री की डोली शीतकालीन वास खरसाली से रीति-रिवाज व पौराणिक परंपरा के साथ रवाना हुई। सैकड़ों श्रद्धालुओं व परंपरागत वाद्य यंत्रों के साथ मां यमुना की डोली यमुनोत्री मंदिर पहुंची। वैदिक मंत्रों व पूजा अर्चना के बाद यमुनोत्री के कपाट खोले गए। गंगोत्री व यमुनोत्री के कपाट खुलने पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु मंदिरों में पहुंचे। स्नान के बाद श्रद्धालुओं ने कपाटोत्सव में भाग लेकर पुण्य अर्जित किया।

सोजन्य से जागरण न्यूज़

समय की करवट और आधुनिकता ने बदल दिए हमारे नाम

दोस्तो जैसे आप लोग जानते है कि उत्तराखंड की अपनी एक अलग पहिचान है, अपनी एक अलग संस्कृति सभ्यता,भाषा-बोली है और इसी के आधार पर उत्तराखंडी लोगों की पहिचान की जा सकती है. कहते है कि किसी ब्यक्ति विशेष के नाम से ही उसकी पहिचान की जा सकती है, जैसे कि वो किस मुल्क का रहने वाला है, कोन सी भाषा को बोलने वाला है, उसका धर्म क्या है, समाज क्या है, ये सब उसके नाम से पता लगाया जा सकता है. पहले उत्तराखंडियों लोगों के नाम से ही उनकी पहिचान हो जाती थी, ऐसे नाम जो दुनिया के किसी भी कोने में नही पाये जाते थे, वो नाम होते थे उत्तराखंडियों के, जो कि अपने आप में अदुतीय थे. लेकिन समय के साथ हमसे ये नाम दूर होते चले गए और आज ये आलम है कि अब ये नाम सुनने को भी नही रह गए. मैं इस लेख के माध्यम से अपने उन पूर्वजों के नामों को समेटने की कोशिश कर रहा हूँ , ताकि हमारे आने वाली पीड़ी को भी ये पता चले कि हमारे पूर्वजों के क्या नाम होते थे और आज हमारे क्या नाम है, समय ने कितनी करवट बदल दी, उन नामों की क्या पहिचान थी, क्या मह्त्वा था और आज के हमारे नामों की क्या पहिचान है?.

आप लोगों में बहुत को पढने के बाद कुछ अटपट्टा जरूर लगेगा, लेकिन ये वो नाम है जो शायद अब हमको कभी सुनने को नही मिलेंगे. ये मेरी तरफ़ से अपने पूर्वजों को एक श्रधांजलि है . इसमे पुरूष और महिला दोनों के नाम सम्मलित हैं, मैंने पुरूष महिला का उल्लेख नही किया है.

चतरु
छौन्दाडू
बणी
काल्या
भुरया
सुरतू
मशान्तु
अत्ति
सौणु
मंग्शीरू
चैतू
दुन्ना
झोंती
फप्फा
बैसाखू
अषाडू
सुरि
धनुली
रज्मा
गुड्डी
फागुणी
छौन्दाड़ी
एकादशी
फुल्मुंडया
तीलू
जीत्तू
मोरू
सब्लू
अतरु
बंडवारी
मशंती
गैणा
सुन्दुरु
भंग्ल्या
बौल्या
मंगतु
लाटा
चेपड़
माघी
देवी
छिल्की देवी
घुंगरा देवी
सोणी देवी
नीलकंठी देवी
लूली देवी
बबनी देवी
होशियारू
तोंगी
चैतू
प्राणी
बालक
सिंह
रेवती देवी
दरबान
चिंता
मणि
मूसा
अथरु
गुमान
छोट्या
गोल्या
फंग्नु
फरशा
पंछी
फतूरी
डोखल्या
कानबाई
भ्योंराज
स्यूराज
राडी
बिछना

नाम तो बहुत है लेकिन अभी याद इतने ही आये है

Wednesday, April 30, 2008

तुंगनाथ:यहां होती है भोले के हृदय व बाहों की पूजा

पंचकेदारों का संपूर्ण विश्व में धार्मिकता की दृष्टि से अलग ही पहचान है। यही कारण है कि देश-विदेश के श्रद्धालु यहां पहुंचकर भगवान के साक्षात दर्शनों के लिए लालायित रहते है।

हिमालय की गोद में बसे पंचकेदारों में से एक तुंगनाथ भी है, यहां शिव की हृदय और बाहों की पूजा होती है। समुद्रतल से करीब 12,772 फिट की ऊंचाई पर पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित भगवान तुंगनाथ का प्राचीन मंदिर धार्मिकता के साथ ही प्राकृतिक सौंदर्य से भी लबालब है। हर साल यहां हजारों की संख्या में तीर्थयात्री पहुंचकर मन्नतें मांगते है। मान्यता है कि जब भगवान राम ने रावण का वध किया था, तो ब्रह्म हत्या शाप से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने ने यहां पर शिव की तपस्या की थी, इसलिए यहां का नाम चंद्रशिला पड़ा। चंद्रशिला से बद्रीनाथ, नीलकंठ पंचचूली, सप्तचूली, बंदरपूंछ, हाथी पर्वत, गंगोत्री व यमनोत्री के ऊपरी बुग्यालों के दर्शन होते है। प्रतिवर्ष तृतीय केदार तुंगनाथ की डोली शीतकाल गद्दी स्थल मक्कूमठ से ग्रीष्मकालीन पूजा के लिए तुंगनाथ पहुंचती है। मान्यता है कि तृतीय तुंगनाथ की शीतकालीन गद्दीस्थल मक्कूमठ में मारकंडी ऋषि द्वारा तपस्या की गयी थी, इसलिए यहां का नाम मक्कूमठ पड़ा। ग्रीष्मकालीन पूजा के लिए मक्कूमठ से प्रस्थान कर भगवान तुंगनाथ डोली पहले दिन भूतनाथ मंदिर, दूसरे दिन चोपता तथा तीसरे दिन चोपता से प्रस्थान कर तुंगनाथ पहुंची। जहां अगले दिन प्रात: ब्राह्मणों के वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ ही भगवान तुंगनाथ के कपाट खुलते हैं। यहां की एक पौराणिक कथा महाभारत काल से भी जुड़ी है। युद्ध में पांडवों ने कौरवों एवं गुरु द्रोणाचार्य का वध करने के बाद शाप से बचने के लिए शिव दर्शनों के लिए यहां पहुंचकर तपस्या की थी। वहीं आदि गुरु शंकराचार्य ने इन पंचकेदारों की खोज सनातन धर्म का जीर्णोद्धार के लिए किया था, तभी से आज तक यह प्रथा चली आ रही है।

सोजन्य से जागरण न्यूज़

Thursday, April 24, 2008

उत्तराखंड में एक ऐसा भी गाँव है जहा नही होते है पंचायत चुनाव

हिमाच्छादित गगनचुम्बी पर्वत श्रृंखलाओं से बीच चीन की सीमा से सटा भारत का एक गांव माणा आज भी अपनी पारंपरिक ओर प्राकृतिक विरासत को संजोए हुए है। समूचे देश में भले ही छोटे-छोटे चुनाव में प्रत्याशियों के बीच कांटे की टक्कर होती हो मगर यहां आज तक ग्राम पंचायत के लिए वोट नहीं डाले गए। सुनने में जरूर अटपटा लगता है कि विगत 100 साल से यहां ग्राम के मु