Friday, May 1, 2009

शादी में दहेज नहीं, पेड़ लगाने की परंपरा हो

ग्लोबल वार्मिग के चलते पूरी दुनिया चिंतित है। जंगलों के आग के जलने से करोड़ों रुपयों की वन संपदा जलकर राख हो गई है। पर्यावरण सुरक्षा के लिए पहाड़ की हरीतिमा को पुन: लौटाने के लिए मैती नामक रचनात्मक आंदोलन को और अधिक प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। मैती आंदोलन शादी-ब्याह के साथ भावनात्मक रूप से शादी ब्याह से जुड़ा है। मैती आंदोलन के प्रणेता शिक्षक कल्याण सिंह रावत कहते है कि पहाड़ नंगे होते जा रहे है व पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है जिससे विश्व चिंतित है पर्यावरण को बचाना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। कहते है कि शादी ब्याह में जूते छिपाने व दहेज देने की परंपरा के बजाय प्रत्येक शादी में दूल्हा-दुल्हन द्वारा पेड़ लगाने व उसकी रक्षा करने को परंपरा से जोड़ना होगा। पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित श्री रावत के अनुसार मैती शब्द लड़की के मायके से जुड़ा है क्योंकि विवाहोपरांत भी लड़की ससुराल की उन्नति के साथ ही मायके की स्मृद्धि की भी आकांक्षी होती है। पर्यावरण सुरक्षा के लिए मैती संगठन बनाए गए है। संगठन से जुड़ी किसी भी कन्या के विवाह के अवसर पर कन्या द्वारा बताए गए स्थान में दूल्हे द्वारा पौधे का रोपण किया जाता है व उसकी सुरक्षा के लिए संगठन की बहनों को धनराशि दी जाती है। यह धनराशि पौधे की सुरक्षा के साथ ही गांव के जरूरत मंदों को भी उपलब्ध कराई जाती है। गढ़वाल मंडल में मैती का यह आंदोलन व्यापक स्तर पर चलन रहा है। वहां पर आमंत्रण पत्रों में भी मैती वृक्षारोपण कार्यक्रम लिखा होता है। श्री रावत बताते है कि अगर प्रत्येक नव विवाहित जोड़ा अपनी शादी में पेड़ लगाने की परम्परा डाले तो आने वाले समय में विश्व को पर्यावरण संकट से उबारा जा सकता है।

सोजन्य से जागरण न्यूज़

Monday, February 23, 2009

30 अप्रैल को खुलेंगे केदारनाथ धाम के कपाट

विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ धाम के कपाट आगामी 30 अप्रैल को श्रद्धालुओï के दर्शनार्थ खोले जाएंगे। सोमवार को महा शिवरात्रि के अवसर पर ओïकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ मेï आचार्यो और धर्माधिकारी ने विचार विमर्श के बाद यह तिथि तय की। पंचकेदारोï के शीतकालीन गद्दीस्थल ओïकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ मेï सोमवार को धर्माधिकारी उमा दत्त सेमवाल और कई आचार्यो ने पंचागोï की गणना के बाद भगवान केदारनाथ के कपाट खोलने के लिए 30 अप्रैल का मुहूर्त निकाला। 26 अप्रैल को भगवान केदारनाथ की डोली ओïकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ से विधिवत पूजा अर्चना के साथ प्रस्थान कर रात्रि विश्राम के लिए गुप्तकाशी पहुंचेगी। 27 अप्रैल को भगवान की डोली फाटा तथा 28 अप्रैल को गौरीमाई मंदिर गौरीकुण्ड मेï रात्रि विश्राम करेगी। 29 अप्रैल को बाबा केदार की डोली सुबह गौरीकुण्ड से प्रस्थान कर चौदह किमी की पद यात्रा तय कर केदारनाथ पहुंचेगी। रात्रि विश्राम के बाद 30 अप्रैल को सुबह पूजा-अर्चना एवं वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ सवा छह बजे डोली गर्भ गुहा मेï प्रवेश करने के साथ ही मंदिर के कपाट खोल दिए जाएंगे। इसके पश्चात छह माह तक भगवान यहां अपने भक्तों को दर्शन देïगे।

सोजन्य से जागरण न्यूज़

Thursday, February 12, 2009

मसूरी में जमकर बर्फबारी

बर्फबारी के लिए बेकरार स्थानीय लोगों और सैलानियों की मुराद आखिर पूरी हो ही गई। बुधवार सुबह पर्यटन नगरी मसूरी और आसपास की पहाडि़यों पर जमकर हिमपात हुआ। बर्फ का आनंद लेने यहां देहरादून और अन्य शहरों के लोगों का रेला लग गया। सैलानियों ने बर्फ में खूब अठखेलियां कीं। मसूरी के लोग व सैलानी यहां बर्फबारी का लंबे समय से इंतजार कर रहे थे। कई बार इसकी संभावना बनी, लेकिन निराशा हाथ लगी। बुधवार सुबह बारिश के बाद जमकर हिमपात हुआ। सात बजे से हिमपात का सिलसिला शुरू हुआ। 11 बजे तक रुक-रुककर हिमपात होता रहा। इतना भारी हिमपात नगर में 2002 के बाद पहली बार हुआ है। लाल टिब्बा, हाथीपांव समेत ऊंचाई वाले अन्य इलाकों में करीब नौ इंच बर्फ गिरी है। लंढौर बाजार में 6 व कुलड़ी व लाइब्रेरी बाजार में करीब तीन इंच बर्फ गिरी। उधर, धनोल्टी, सुरकंडा व नागटिब्बा की पहाडि़यों पर भारी बर्फबारी के समाचार मिले हैं। बताया गया कि धनोल्टी करीब डेढ़ फुट बर्फ गिरी है।

सोजन्य से जागरण न्यूज़

Wednesday, February 11, 2009

मौसम की पहली बर्फबारी से सैलानियों की भीड़ उमड़ी

उत्तराखण्ड में इस वर्ष जाड़े के दौरान लगातार सूखे की मार झेल रही विभिन्न जिलों की ऊंची पहाडि़यों ने देर रात पहली बार जमकर बर्फबारी हुई, जिसका आनन्द उठाने के लिये आस पास के इलाकों से सैलानियों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी।

पहाड़ों की रानी के नाम से विख्यात मसूरी में देर रात जमकर बर्फबारी हुई जिससे पूरी की पूरी मसूरी बर्फ की चादर से ढक गई। इस मौसम में बर्फ देखने के लिए तरस रहे आसपास के इलाकों के हजारों लोगा बर्फ का आनन्द उठाने के लिये मसूरी पहुंच गए। मसूरी से करीब चालीस किलोमीटर आगे धनोल्टी में भी भारी बर्फबारी का आनन्द उठाने के लिये लोगों की भीड़ उमड़ी है।

एक तरफ जहां ऊंची पहाड़ियों पर बर्फबारी हुई है वहीं देहरादून, हरिद्वार, रिषिकेश के मैदानी इलाकों में जमकर वर्षा हुई, जिससे आम जनजीवन प्रभावित हो गया।

राज्य के बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, मदमहेश्वर, औली गोपेश्वर, नैनीताल, के क्षेत्रों में भी बर्फबारी से ठंडक काफी बढ गई।

सोजन्य से जागरण न्यूज़


Thursday, February 5, 2009

अनेक रोगों की अचूक औषधि सेहुंड

उत्तराखंड हिमालय में ऐसी वनौषधियों की कोई कमी नहीं है, जो बिना किसी साइड इफेक्ट के अनेक रोगों का निदान कर देती हैं। पहाड़ में जहां-तहां पाया जाने वाला और किसी काम का न समझा जाने वाला 'सेहुंड' भी ऐसा ही औषधीष पादप है। आयुर्वेद में इसे अनेक व्याधियों की अचूक औषधि बताया गया है।

'सुरू', 'श्योण', 'सुंडु' आदि नामों से पुकारी जाने वाली वनौषधि आयुर्वेदिक एवं यूनानी चिकित्सा पद्धति में प्रयुक्त होने वाली बहुमूल्य जड़ी-बूटी 'स्नुही' या 'सेहुंड' है। पर्वतीय क्षेत्र में इसे 'स्यूण' भी कहा जाता है। सेहुंड की दो प्रजातिया 'यूफोरबिया रायलियाना' व 'नेरिफोलिया' उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में बहुतायत में पाई जाती हैं।

सेहुंड का छोटा वृक्ष करीब छह फीट तक ऊंचा होता है, जिसके मांसल एवं कांटेदार तने एवं शाखाएं गोलाकार या पंचकोणीय होती हैं। शीतकाल में इसकी पत्तियां झड़ जाती हैं और वसंत में हरे-पीले फूल एवं तत्पश्चात फल लगते हैं। राज्य औषधीय पादप बोर्ड के उपाध्यक्ष डा.आदित्य कुमार बताते हैं कि आयुर्वेद में 'वज्रक्षार', 'स्नुहयादि तैल', 'स्नुहयादि वर्ति' सहित सैकड़ों औषधियों के निर्माण में सेहुंड का प्रयोग होता है। यह औषधियां पाचन, रक्तवह व श्वसन संस्थान के रोगों समेत अनेक चर्मरोगों में उपयोगी हैं। वह बताते हैं कि घरेलू चिकित्सा में सूजन एवं दर्दयुक्त स्थानों पर सेहुंड की पत्तियां गर्म करके बांधने पर तुरंत आराम मिलता है। डा.आदित्य के अनुसार कान दर्द में सेहुंड का दूध लाभकारी माना गया है। दांत दर्द में इसके दूध को रुई के फाहे के साथ रखा जाता है। इसके अलावा अनेक चर्म रोगों की घरेलू चिकित्सा में सेहुंड का दूध प्रयोग किया जाता है। बवासीर के अंकुरों पर दूध का लेप करने से वह नष्ट हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि भगंदर की चिकित्सा में क्षार सूत्र के निर्माण में भी सेहुंड के दूध का प्रयोग किया जाता है।

सोजन्य से जागरण न्यूज़

Sunday, November 9, 2008

देवभूमि उत्तराखंड में पाए जाते हैं मक्खन के पेड़!

प्राचीन भारत की समृद्धि का बखान करने के लिए प्रसिद्ध मुहावरा है कि यहां दूध की नदियां बहती थीं। लेकिन देवभूमि उत्तराखंड में तो वास्तव में ऐसे वृक्ष हैं, जिनके फल का गूदा मक्खन की तरह डबलरोटी में लगा कर खाया जाता है। अब यह बात अलग है कि आम लोगों को इस फल की जानकारी देने में अभी तक राज्य सरकार विफल रही है।

हालांकि उत्तराखंड में इसे मक्खन वाला पेड़ ही कहते हैं। यह मधुमेह और ब्लड प्रेशर के रोगियों के लिए गुणकारी है। विदेशी इसका लुत्फ उठाते हैं, मगर राज्य में इसकी खूबियों की जानकारी बहुत कम लोगों को है। बिना खास प्रयास किए उद्यान महकमा केवल यह उम्मीद करता है कि कभी ट्रेंड बदलेगा और बटरफू्रट लोकप्रिय होगा। एवोकैडो बटरफू्रट नामक यह पौधे वर्ष 1950 में मैक्सिको से लाए गए थे। ये पौधे सबसे पहले बागेश्वर और जौलीकोट [नैनीताल] में लगाए गए। देहरादून के ज्येष्ठ उद्यान निरीक्षक वीसी मिश्र बताते हैं कि एवोकैडो तत्कालीन उद्यान विशेषज्ञ डा. विक्टर साहनी की पहल पर लाया गया और धीरे-धीरे यह राज्य के अन्य हिस्सों में पहुंचा। अल्मोड़ा में एवोकैडो काटेज रेस्ट हाउस में इसके पौधे थे। इस समय बागेश्वर, वजूला, जौलीकोट, ताकुला [अल्मोड़ा], गरुड़ वैली व उत्तरकाशी में इसके पेड़ हैं।

उद्यान विभाग के उपनिदेशक [कुमाऊं] डा. केआर जोशी बताते हैं कि 'बटरफू्रट एवोकैडो में पर्याप्त प्रोटीन होता है, जबकि कोलेस्ट्राल व शुगर नहीं होता। एवोकैडो के फल का गूदा होता है बिल्कुल मक्खन जैसा..खाने में भी और दिखने में भी। यह तीन से छह हजार फीट की ऊंचाई पर लगता है और इसमें फल पांच-छह साल में आते हैं। सूबे में जहां यह फल मिलता है, वहां आने वाले विदेशी सैलानी और भारतीय जानकार इसे बड़े चाव से खाते हैं। डायबिटीज और रक्त चाप से पीड़ित मरीजों के लिए भी यह बेहद लाभदायक है। लेकिन दुर्भाग्य से कम लोग इसके बारे में जानते हैं।

सोजन्य से जागरण न्यूज़

Friday, October 17, 2008

प्रकृति के सुन्दर नजारों का लुत्फ उठा रहे पर्यटक

इन दिनों पर्यटन सीजन में बंगाली पर्यटकों की तादात बढ़ने लगी है। दूर-दराज से आए सैलानी जाड़ों के मौसम में जमकर लुत्फ उठाया। इन दिनों देशी-विदेशी सैलानी पहाड़ों की ओर रुख कर रहे है।

नगर के मुख्य पर्यटक स्थलों गोल्फ मैदान, चौबटिया गार्डन, हैड़ाखान मंदिर, बिनसर महादेव आदि स्थानों में सैलानियों की भीड़ आसानी से देखी जा सकती है। पश्चिम बंगाल से आए पर्यटक संदीप चटर्जी ने बताया कि पहाड़ों में हम बर्फ से लदे पहाड़ देखने आते है। यहां से दिखने वाली हिमालय की विहंगम चोटियां मंत्रमुग्ध कर देती हैं। इन चोटियों को देखने हर साल पहाड़ों पर आते है। ऐसी ही कहना अन्य पर्यटकों का भी था। इन दिनों बंगाली पर्यटक सीजन अपने पीक पर है। इनके अलावा हरियाणा, गुजरात, बिहार आदि स्थानों से ही नही विदेशों से भी बड़ी संख्या में पर्यटक प्रकृति के खूबसूरत नजारों का आनंद उठाने यहां पहुंच रहे है।

सोजन्य से जागरण न्यूज़

Friday, October 10, 2008

जादुई सम्मोहन है हरसिल के सौंदर्य मे

गढवाल के अधिकांश सौंदर्य स्थल दुर्गम पर्वतों में स्थित हैं जहां पहुंचना सबके लिए आसान नहीं है। यही वजह है कि प्रकृति प्रेमी पर्यटक इन जगहों पर पहुंच नहीं पाते हैं। लेकिन ऐसे भी अनेक पर्यटक स्थल हैं जहां सभी प्राकृतिक विषमता और दुरुहता खत्म हो जाती है। वहां पहुंचना सहज और सुगम है। यही कारण है कि इन सुविधापूर्ण प्राकृतिक स्थलों पर ज्यादा पर्यटक पहुंचते हैं। प्रकृति की एक ऐसा ही एक खूबसूरत उपत्यका है हरसिल।

उत्तरकाशी-गंगोत्री मार्ग के मध्य स्थित हरसिल समुद्री सतह से 7860 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। हरसिल उत्तरकाशी से 73 किलोमीटर आगे और गंगोत्री से 25 किलोमीटर पीछे सघन हरियाली से आच्छादित है। घाटी के सीने पर भागीरथी का शांत और अविरल प्रवाह हर किसी को आनंदित करता है। पूरी घाटी में नदी-नालों और जल प्रपातों की भरमार है। जहां देखिए दूधिया जल धाराएं इस घाटी का मौन तोडने में डटी हैं। नदी झरनों के सौंदर्य के साथ-साथ इस घाटी के सघन देवदार के जंगल मन को मोहते हैं। जहां निगाह डालिए इन पेडों का जमघट लगा है। यहां पहुंचकर पर्यटक इन पेडों की छांव तले अपनी थकान को मिटाता है। जंगलों से थोडा ऊपर निगाह पडते ही आंखें खुली की खुली रह जाती है। हिमाच्छादित पर्वतों का आकर्षण तो कहने ही क्या। ढलानों पर फैले ग्लेशियरों की छटा तो दिलकश है ही।

इस स्थान की खूबसूरती का जादू अपने जमाने की सुपरहिट फिल्म राम तेरी गंगा मैली में देखा जा सकता है। बॉलीवुड के सबसे बडे शोमैन रहे राजकपूर एक बार जब गंगोत्री घूमने आए थे तो हरसिल का जादुई आकर्षण उन्हें ऐसा भाया कि उन्होंने यहां की वादियों में फिल्म ही बना डाली-राम तेरी गंगा मैली। इस फिल्म में हरसिल की वादियों का जिस सजीवता से दिखाया गया है वो देखते ही बनता है। यहीं के एक झरने में फिल्म की नायिका मंदाकिनी को नहाते हुए दिखाया गया है। तब से इस झरने का नाम मंदाकिनी फॉल है पड गया। इस घाटी से इतिहास के रोचक पहलू भी जुडे हैं। एक गोरे साहब थे फेडरिक विल्सन जो ईस्ट इंडिया कंपनी में कर्मचारी थे। वह थे तो इंग्लैंड वासी लेकिन एक बार जब वह मसूरी घूमने आए तो हरसिल की वादियों में पहुंच गए। उन्हें यह जगह इतनी भायी कि उन्होंने सरकारी नौकरी तक छोड दी और यहीं बसने का मन बना लिया। स्थानीय लोगों के साथ वह जल्द ही घुल-मिल गए और गढवाली बोली भी सीख ली। उन्होंने अपने रहने के लिए यहां एक बंगला भी बनाया। नजदीक के मुखबा गांव के एक लडकी से उन्होंने शादी भी कर डाली। विल्सन ने यहां इंग्लैंड से सेब के पौधे मंगाकर लगाए जो खूब फले-फूले। आज भी यहां सेब की एक प्रजाति विल्सन के नाम से प्रसिद्ध है।

ऋषिकेश से हरसिल की लंबी यात्रा के बाद हरसिल की वादियों का बसेरा किसी के लिए भी अविस्मरणीय यादगार बन जाता है। भोजपत्र के पेड और देवदार के खूबसूरत जंगलों की तलहटी में बसे हरसिल की सुंदरता पर बगल में बहती भागीरथी और आसपास के झरने चार चांद लगा देते हैं। गंगोत्री जाने वाले ज्यादातर तीर्थ यात्री हरसिल की इस खूबसूरती का लुत्फ उठाने के लिए यहां रुकते हैं। अप्रैल से अक्टूबर तक हरसिल आना आसान है लेकिन बर्फबारी के चलते नवंबर से मार्च तक यहां इक्के-दुक्के सैलानी ही पहुंच पाते हैं। हरसिल की वादियों का सौंदर्य इन्हीं महीनों में खिलता है। जब यहां की पहाडियां और पेड बर्फ से लकदक रहते हैं, गोमुख से निकलने वाली भागीरथी का शांत स्वभाव यहां देखने लायक है। यहां से कुछ ही दूरी पर डोडीताल है इस ताल में रंगीन मछलियां ट्राडा भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं। इन ट्राडा मछलियों को लाने का श्रेय भी विल्सन को ही जाता है। बगोरी, घराली, मुखबा, झाला और पुराली गांव इस इलाके की समृद्ध संस्कृति और इतिहास को समेटे हैं। हरसिल देश की सुरक्षा के नाम पर खींची गई इनर लाइन में रखा गया है जहां विदेशी पर्यटकों के ठहरने पर प्रतिबंध है। विदेशी पर्यटक हरसिल होकर गंगोत्री, गोमुख और तपोवन सहित हिमालय की चोटियो में तो जा सकते हैं लेकिन हरसिल में नहीं ठहर सकते हैं। हरसिल से सात किलोमीटर की दूरी पर सात तालों का दृश्य विस्मयकारी है। इन्हें साताल कहा जाता है। हिमालय की गोद मे एक श्रृखंला पर पंक्तिबद्ध फैली इन झीलों के दमकते दर्पण में पर्वत, आसमान और बादलों की परछाइयां कंपकपाती सी दिखती हैं। ये झील 9000 फीट की ऊंचाई पर फैली हैं। इन झीलों तक पहुंचने के रास्ते मे प्रकृति का आप नया ही रूप देख सकते है। यहां पहुंचकर आप प्रकृति का संगीत सुनते हुए झील के विस्तृत सुनहरे किनारों पर घूम सकते हैं।

कैसे पहुंचे

हरसिल की खूबसूरत वादियों तक पहुंचने के लिए सैलानियों को सबसे पहले ऋषिकेश पहुंचना होता है। ऋषिकेश देश के हर कोने से रेल और बस मार्ग से जुडा है। ऋषिकेश पहुंचने के बाद आप बस या टैक्सी द्वारा 218 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद यहां पहुंच सकते हैं।

अगर आप हवाई मार्ग से आना चाहें तो नजदीकी हवाईअड्डा जौलीग्रांट है। जौलीग्रांट से बस या टैक्सी द्वारा 235 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद यहां पहुंचा जा सकता है

समय और सीजन

यूं तो बरसात के बाद जब प्रकृति अपने नये रूप में खिली होती है तब यहां का लुत्फ उठाया जा सकता है। लेकिन नवंबर-दिसंबर के महीने में जब यहां बर्फ की चादर जमी होती है तो यहां का सौंदर्य और भी खिल उठता है। बर्फबारी के शौकीन इन दिनों यहां पहुंचते हैं।

पर्यटकों को यात्रा के दौरान इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि समय और जो भी हो, हरदम गरम कपडे साथ होने चाहिए। यहां पर खाने-पीने के लिए साफ और सस्ते होटल आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं जो आपके बजट के अनुरूप होते हैं।

हरसिल में ठहरने के लिए लोकनिर्माण विभाग का एक बंगला, पर्यटक आवास गृह और स्थानीय निजी होटल हैं। यहां खाने-पीने की पर्याप्त सुविधाएं हैं। गंगोत्री जाने वाले यात्री कुछ देर यहां रुककर अपनी थकान मिटाते हैं और हरसिल के सौंदर्य का लुत्फ लेते हैं।

सोजन्य से जागरण न्यूज़

Tuesday, October 7, 2008

उत्तराखंड की प्रमुख झीलें

पृथ्वी पर सबसे अधिक मात्रा में पाया जाने वाला पदार्थ जल है, जिससे पृथ्वी का 70 प्रतिशत् भाग ढका है। कुल जल की मात्रा का 97.3 प्रतिशत (135 करोड़ घन किमी0) सागर और महासागर के रूप में तथा 2.7 प्रतिशत (2.8 करोड़ घन किमी0) बर्फ से ढका है। इसके अतिरिक्त 7.7 घन किमी0 जल भूमिगत है।

पर्वतीय क्षेत्रों में भूगर्भ स्थिति के अनुसार, पर्वतों से भू-जल स्रोत बहते हैं। ऐसे स्रोत मौसमी या लगातार बहने वाले होते हैं। ऐसे ही स्रोतों में से एक झील है।

झील- एक जलाशय है जो भूमि से घिरा तथा विशालाकार होता है ।

बदानी ताल झील- यह झील पृथ्वी की सतह में श्रेणी-बद्ध दोष के कारण बनी है। यह गढ़वाल में मयाली के पास ऊपरी लक्ष्तर गाड नदी की घाटी के ढालों के बीच स्थित है।

भीमताल-- कुमाऊँ क्षेत्र की यह दूसरी बड़ी झील है।

देवरी ताल-- यह झील गढ़वाल के चमोली जिले में चोप्ता के पास हिमखण्ड के खिसकने से बनी है।

डोडीताल-- यह झील गढ़वाल में उत्तरकाशी के पास स्थित है।

गोहनाताल-- यह गढ़वाल के चमोली जिले में अलकनन्दा नदी की एक सहायक नदी में 1970 में आयी बड़ी बाढ़ के कारण भूस्खंलन से बनी है।

हेमकुण्ड लोकपाल-- यह गढ़वाल के चमोली जिले में पानी के स्रोत से बनी शुद्ध पानी की झील है।

कागभुसण्ड ताल-- यह गढ़वाल के उत्तर-पूर्वी चमोली जिले में कंकुल खाल चोटी के ढाल से निकली प्रदुषण-रहित झील है।

खुर्पाताल-- यह नैनीताल शहर के पास चट्टान खिसकने से बने गड्ढे में बनी झील है।

नैनीताल- - यह पृथ्वी की सतह के खिसकने से बने दोष के कारण बनी झील है। इसके किनारे बने नैना देवी के मंदिर के कारण इस झील का नाम नैनीताल पड़ा।

नन्दीकुण्ड-- यह गढ़वाल की चौखम्भा चोटी के दक्षिणी ढाल पर बनी झील है जो जाड़ों में जम जाती है।

नौकुचियाताल-- यह कुमाऊँ क्षेत्र में एक छोटी झील है।

रूपकुण्ड- यह गढ़वाल के चमोली जिले के उत्तर-पूर्वी भाग में बनी एक प्रदुषण रहित बड़ी झील है।

सागरियाताल -- यह भी नैनीताल क्षेत्र में एक छोटी झील है।

शास्त्रुताल-- यह गढ़वाल में घनसाली क्षेत्र के ऊपर खतलिंग हिमखण्ड के पास एक झीलों का समूह है।

सूखाताल -- यह नैनीताल के पास बनी झील है, जिसमें काफी मात्रा में अवसाद भरा है, तथा इसमें केवल वर्षा के मौसम में ही पानी एकत्र होता है।

वसूकी ताल-- यह गढ़वाल में मंदाकिनी नदी के स्रोत के पास चोर बामक हिमखण्ड के पूर्व में स्थित एक छोटी झील है।

सोजन्य से : हिन्दी वाटर पोर्टल

Thursday, August 21, 2008

मैती कार्यक्रम- पहाडों में हरियाली

पैसे दे दो, जूते ले लो लोक में इस गीत के बोल चाहे जिस तरह के भी हों, विवाह के अवसर पर जूते चुराकर नेग लेने की परंपरा बहुत पुरानी है. लेकिन उत्तराखंड की लड़कियों ने शादी के लिए आए दूल्हों के जूते चुरा कर उनसे नेग लेने के रिवाज को तिलांजलि दे दी है. वे अब दूल्हों के जूते नहीं चुराती बल्कि उनसे अपने मैत यानी मायके में पौधे लगवाती हैं. इस नई रस्म ने वन संरक्षण के साथ साथ सामाजिक समरसता और एकता की एक ऐसी परंपरा को गति दे दी है, जिसकी चर्चा देश भर में हो रही है.


अब यह आंदोलन उत्तराखंड सहित देश के आठ राज्यों में भी अपने जड़ें जमा चुका है. चार राज्यों में तो वहां की पाठ्य पुस्तकों में भी इस आंदोलन की गाथा को स्थान दिया गया है. कनाडा में मैती आंदोलन की खबर पढ़ कर वहां की पूर्व प्रधानमंत्री फ्लोरा डोनाल्ड आंदोलन के प्रवर्तक कल्याण सिंह रावत से मिलने गोचर आ गईं.

वे मैती परंपरा से इतना प्रभावित हुई कि उन्होंने इसका कनाडा में प्रचार-प्रसार शुरु कर दिया. अब वहां भी विवाह के मौके पर पेड़ लगाए जाने लगे हैं. मैती परंपरा से प्रभावित होकर कनाडा सहित अमेरिका, ऑस्ट्रिया, नार्वे, चीन, थाईलैंड और नेपाल में भी विवाह के मौके पर पेड़ लगाए जाने लगे हैं.

मैती आंदोलन की भावनाओं से अभिभूत होकर अब लोग जहां पेड़ लगा रहे हैं वहीं उनके व्यवहार भी बदल रहे हैं. पर्यावरण के प्रति उनके सोच में भी परिवर्तन आ रहा है. यही वजह है कि अब लोग अपने आसपास के जंगलों को बचाने और इनके संवर्धन में भी सहयोग करने लगे हैं. इस आंदोलन के चलते पहाड़ों पर काफी हरियाली दिखने लगी है और सरकारी स्तर पर होने वाले वृक्षारोपण की भी असलियत उजागर हुई है. गांव-गांव में मीत जंगलों की श्रृंखलाएं सजने लगी हैं.

पर्यावरण संरक्षण के लगातार बढ़ते इस अभियान को अपनी परिकल्पना और संकल्प से जन्म देने वाले कल्याण सिंह रावत ने कभी सोचा भी नहीं था कि उनके प्रेरणा से उत्तराखंड के एक गांव से शुरु हुआ यह अभियान एक विराट और स्वयं स्फूर्त आंदोलन में बदल जाएगा.

मैती की धुन

अब तो इसकी व्यापकता इतनी बढ़ गई है कि इसके लिए किसी पर्चे-पोस्टर और बैठक-सभा करने की जरूरत नहीं होती है. मायके में रहने वाली मैती बहनें शादियों के दौरान दूल्हों से पौधे लगवाने की रस्म को खुद-ब-खुद अंजाम देती हैं.

विवाह के समय ही पेड़ लगाने की इस रस्म के स्वयं स्फूर्त तरीके से फैलने की एक बारात में आए लोग भी होते हैं जो अपने गांव लौटकर इस आंदोलन की चर्चा करने और अपने यहां इसे लागू करने से नहीं चूकते. शादी कराने वाले पंडित भी इस आंदोलन का मुफ्त में प्रचार करते रहते हैं. अब तो शादी के समय छपने वाले निमंत्रण पत्रों में भी मैती कार्यक्रम का जिक्र किया जाता है.

आज की तारीख में आठ हजार गावों में यह आंदोलन फैल गया है और इसके तहत लगाए गए पेड़ों की संख्या करोड़ से भी उपर पहुँच गई है.

करीब डेढ़ दशक पहले चामोली के ग्वालदम से फैला यह आंदोलन कुमाऊं में घर-घर होते हुए अब गढ़वाल के हर घर में भी दस्तक देने लगा है. शुरुआती दौर में पर्यावरण संरक्षण के वास्ते चलाए गए इस अभियान में महिलाओं और बेटियों ने इसमें सर्वाधिक भागीदारी निभाई.

मैती का अर्थ होता है लड़की का मायका. गांव की हर अविवाहित लड़की इस संगठन से जुड़ती हैं. इसमें स्कूल जाने वाली लड़कियों के साथ, घर में रहने वाली लड़कियां भी शामिल होती हैं. इस संगठन को लड़कियों के घर परिवार के साथ गांव की महिला मंगल दल का भी समर्थन-सहयोग प्राप्त होती है. बड़ी-बूढ़ी महिलाएं भी मैती की गतिविधियों में शामिल होने से नहीं चूकती.

मैती वाली दीदी

मैती संगठन की कार्यविधि बिल्कुल साफ औऱ कदम सरल है. संगठन को मजबूत और रचनात्मक बनाने के लिए सभी लड़कियां अपने बीच की सबसे बड़ी और योग्य लड़की को अपना अध्यक्ष चुनती है, अध्यक्ष पद को बड़ी दीदी का नाम दिया गया है. बड़ी दीदी का सम्मान उनके गांव में उतना ही होता है जितना एक बड़े परिवार में सबसे बड़ी बेटी का होता है.

गांव के मैती संगठन की देखरेख और इसको आगे बढ़ाने का नेतृत्व चुनी गई बड़ी दीदी ही करती है. बाकी सभी लड़कियां इस संगठन की सदस्य होती है. जब बड़ी दीदी की शादी हो जाती है तो किसी दूसरी योग्य लड़की को बहुत सहजता के साथ संगठन की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है और यह क्रम लगातार चलता रहता है.

गांव की हरेक लड़की मायके में अपने घर के आसपास किसी सुरक्षित जगह पर अपने प्रयास से किसी वृक्ष की एक पौध तैयार करती है. यह पौध जलवायु के अनुकूल किसी भी प्रजाति की हो सकती है. कुछ लड़कियां जमीन पर पॉलिथीन की थैली पर केवल एक पौधा तैयार करती है. गांव में जितनी लड़कियां होती हैं, उतने ही पौधे तैयार किये जाते हैं.

हरेक लड़की अपने पौध को देवता मान कर या अपने जीवन साथी को शादी के समय़ देने वाला एक उपहार मान कर बड़ी सहजता, तत्परता और सुरक्षा से पालती-पोसती रहती है. इस तरह अगर गांव में सौ लड़कियां है तो सौ पौध तैयार हो रहे होते हैं.

किसी भी गांव की लड़की की शादी तय हो जाने पर बड़ी दीदी के मां-बाप से बातचीत करके उनके घर के ही आंगन में या खेत आदि में शादी के समय अपने दूल्हे के साथ पौधारोपण कर देती हैं. शादी के दिन अन्य औपचारिकताएं पूरी हो जाने पर बड़ी दीदी के नेतृत्व में गांव की सभी लड़कियां मिल कर दूल्हा-दुल्हन को पौधारोपण वाले स्थान पर ले जाती हैं. दुल्हन द्वारा तैयार पौधे को मैती बहनें दुल्हे को यह कह कर सौंपती हैं कि यह पौधा वह निशानी है या सौगात है जिसे दुल्हन ने बड़े प्रेम से तैयार किया है.

मैती कोष भी

दूल्हा मैती बहनों के नेतृत्व में पौधा रोपता है और दुल्हन उसमें पानी देती है. मंत्रोच्चार के बीच रोपित पौधा दूल्हा दुल्हन के विवाह की मधुर स्मृति के साथ एक धरोहर में तब्दील हो जाता है. पौधा रोपने के बाद बड़ी दीदी दूल्हे से कुछ पुरस्कार मांगती है. दूल्हा अपनी हैसियत के अनुसार कुछ पैसे देता है, जो मैती संगठन के कोष में जाता है. मैती बहनों दूल्हों से प्राप्त पैसों को बैंक य़ा पोस्ट ऑफिस में या गांव की ही किसी बहू के पास जमा करती रहती हैं.

इन पैसों का सदुपयोग गांव की गरीब बहनों की मदद के लिए किया जाता है. गरीब बहनों के विवाह के अलावा इन पैसों से उन बहनों के लिए चप्पल खरीदी जाती है, जो नंगे पांव जंगल में आती-जाती हैं या इन पैसों से गरीब बच्चियों के लिए किताब या बैग आदि खरीदे जाते हैं. हरेक गांव में मैती बहनों को साल भर में होने वाली दस पंद्रह शादियों से करीब तीन चार हजार से अधिक पैसे जमा हो जाते हैं. ये पैसे मैती बहनें अपने गांव में पर्यावरण संवर्धन के कार्यक्रमों पर भी खर्च करती है.

प्रसून लतांत

उत्तराखंड के इलाकों से

http://raviwar.com/news/58_maiti-uttarakhand-prasunlatant.shtml